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अब संवैधानिक पीठ तय करेगी कि मंत्रियों या लोक सेवकों को अभिव्यक्ति की कितनी आजादी मिलनी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल बुलंदशहर गैंगरेप के बारे में सपा नेता आजम खान के आपत्तिजनक बयान से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह मामला संवैधानिक पीठ को सौंपा है

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सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवकों या मंत्रियों की अभिव्यक्ति की आजादी का मामला पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंप दिया है. समाचार एजेंसी पीटीआई के   अनुसार       संवैधानिक पीठ इस सवाल पर विचार करेगी कि क्या कोई लोक सेवक या मंत्री अभिव्यक्ति की आजादी के तहत उन संवेदनशील मामलों में टिप्पणी कर सकता है, जिनमें अभी जांच चल रही है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि लोग इसके जरिए अदालती कार्यवाही तक के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं. शीर्ष अदालत की बात का समर्थन करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने कहा कि सोशल मीडिया से ढेर सारी गलत सूचनाएं फैलाई जाती हैं, इसलिए उन्होंने इसे देखना ही बंद कर दिया है. वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि उन्होंने अपना ट्विटर अकाउंट ही डिलीट कर दिया है. उन्होंने आगे कहा कि अब यह मामला केवल सरकार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे जरिए लोग निजता के अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को पिछले साल जुलाई में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में राजमार्ग के किनारे मां-बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इसमें याचिकाकर्ता ने मामले को दिल्ली लाने और इस घटना को राजनीतिक साजिश बताने के लिए तत्कालीन सपा सरकार के मंत्री आजम खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की मांग की थी. इस बारे में हरीश साल्वे ने कहा कि सार्वजनिक मामलों में कोई भी मंत्री निजी राय नहीं रख सकता, क्योंकि वह जो भी बात कहे उसमें सरकारी नीति की झलक होनी ही चाहिए. हालांकि, इस मामले में आजम खान ने बीते साल 15 दिसंबर को बिना शर्त माफी मांग ली थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया था.

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