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आजादी: कम उम्र में फांसी पर झूलने वाले इस अमर शहीद की श्रद्धांजलि के लिए लोग करते हैं जेल यात्रा

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जीवन को भरपूर जीने की उत्कंठा, अभिलाषा और जिजीविषा सबमें होती है. जिंदगी जीने की  कामना हमेशा नयी कहानी गढ़ती है, लेकिन यह कुछ लोगों पर लागू नहीं होती. कुछ लोग ऐसे मिट्टी के बने होते हैं, जिनके लिए राष्ट्र, समाज और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि होती है. उन्हीं में से एक थे अमर शहीद बलिदानी खुदीराम बोस. जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने जेल की दीवारों पर लिखा था- एक बार विदाई दे मां घुरे आसी, हांसी-हांसी परिबो फांसी देखबे जोगोतवासी. जी हां, उन्होंने सबसे कम उम्र में ही हंस-हंस कर इसलिए फांसी के फंदे को चूम लिया, ताकि देश आजादी की आहट से जागने लगे. मुजफ्फरपुर के खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में उनके फांसी की तारीख के दिन प्रति वर्ष 11 अगस्त को श्रद्धांजलि दी जाती है. जेल के अंदर दी जाने वाली यह श्रद्धांजलि देखकर, उस क्रांतिकारी की रूह हर किसी की आत्मा को बेध देती है.

जी हां, अंग्रेज अफसर को सबक सिखाने के लिए बिहार के तिरहुत की धरती पर खुदीराम बोस ने अपने क्रांति की कहानी का एक अध्याय लिख डाला. कम उम्र में ही अपने सपनों को राष्ट्र के लिए कुर्बान करने वाले इस सपूत ने अभी गांव की गलियों को भी ठीक से देखा नहीं था, लेकिन देशभक्ति का जुनून इस कदर सिर पर सवार था कि जनाजा निकलने से पहले जेल की दीवारों पर झकझोर देने वाली कविता लिख डाली. मुजफ्फरपुर जेल में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी प्रशासनिक अधिकारियों का अमला आधी रात को ही जेल पहुंच गया. मौका था, खुदीराम बोस के 110वें शहादत दिवस का. इस बार शहादत दिवस पर मुजफ्फरपुर पहुंचने वाले मिदनापुर के प्रकाश हलदर ने बताया कि वह 22 सालों से शहीद को सलाम करने आते हैं. इस बार बेटे को भी साथ लाये हैं. उन्होंने जेल में पुष्पांजलि अर्पित करने पहुंचे लोगों को बताया कि अब गांव में खुदीराम का कोई वारिस नहीं है. बचा हुआ ट्रस्ट जैसे-तैसे चल रहा है. हालांकि, गांव में कुछ लोगों के प्रयास से उनके नाम पर स्कूल जरूर चल रहा है.

मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा में खुदीराम को श्रद्धांजलि दी गयी. पुष्प अर्पित करने के साथ, खुदीराम के सेल में भी पुष्पांजलि अर्पित की गयी. सभी लोगों ने माला चढ़ाने के बाद अगरबती दिखायी. इसी जेल के सेल में खुदीराम ने अपने यातना के दिन देश के लिए काटे थे. 11 अगस्त 1908 को इस क्रांतिकारी को अंग्रेजी सरकार ने इसी जेल में फांसी दे दी थी. जेल के अंदर काफी भावपूर्ण दृश्य था, हर साल की भांति इस साल भी लोगों के चेहरे पर शहीद खुदीराम के लिए श्रद्धा झलक रही थी. गमगीन से माहौल में लोग, खुदीराम की उस खिदमत को याद कर रहे थे, जो उन्होंने देश में आजादी की लौ जलाने की लिए की थी.

ज्ञात हो कि 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी खुदीराम ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वह कैद से भाग निकले. लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गये. 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया. छह दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायण गढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया. सन 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन वे भी बच निकले. खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे, जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी. उन्होंने अपने साथी प्रफुल्ल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी. दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया, लेकिन उस गाड़ी में उस समय सेशन जज की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं. किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं, जिसका खुदीराम और प्रफुल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ.

 

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