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आज ही के दिन लॉर्ड्स में जब गांगुली ने टीशर्ट उतारी थी, वजह एक बस ड्राइवर था

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टीम इंडिया खुद के साथ एक उलझन ले के चल रही थी. अच्छा होकर भी उतना अच्छा न होने की कि आप ट्रॉफी उठा पाएं. बात है आज ही के दिन, 2002 की. 13 जुलाई 2002. सौरव गांगुली के ‘मेन इन ब्लू’ एक और फाइनल खेलने जा रहे थे. उनके रजिस्टर में पिछली लगातार 9 फाइनलों की हार दर्ज थी.

इंडिया के दसवीं फाइनल की हार को रोकने का सपना भी काफ़ूर होता दिख रहा था. नेटवेस्ट फाइनल. ट्रेस्कोथिक और नासिर हुसैन की 185 रन की पार्टनरशिप. इंग्लैण्ड के 325 रन की रीढ़. नासिर हुसैन लगातार टीवी और रेडियो और अख़बारों में अपने क्रिटिसिज़म को देखते-सुनते-पढ़ते आ रहे थे. टीवी पर इयान बॉथम और बॉब विलिस लगातार इस बारे में बात कर रहे थे कि नासिर हुसैन किसी भी हाल में इंग्लैण्ड के लिए तीसरे नम्बर पर बैटिंग करने लायक नहीं थे. नासिर हुसैन उस वक़्त को याद करते हुए कहते हैं, “मैंने सोच लिया था कि मैं सौ रन बनाऊंगा. और सौ रन बनाते ही तीन उंगलियां उठाकर पूरे कमेंट्री बॉक्स को दिखाऊंगा.”

इंग्लैण्ड की टीम ने निक नाइट को बहुत जल्दी ही खो दिया. ज़हीर खान ने उन्हें बोल्ड किया. और उसके बाद तमाम भला-बुरा सुनने वाले तीसरे नम्बर पे पहुंचे नासिर हुसैन. इंडियन बॉलिंग को धो दिया. ट्रेस्कोथिक के साथ बड़ी पार्टनरशिप खेली. इस बीच इंडियन कैप्टन गांगुली ने कुल सात बॉलर्स को इस्तेमाल किया. खुद को भी. कुछ हासिल नहीं हुआ. 175 गेंदों में 185 रन की पार्टनरशिप. राहत दिलाई तो कुम्बले ने. ट्रेस्कोथिक सेंचुरी मारने के ठीक बाद कुम्बले की गुगली पर बोल्ड हो गए. उस वक़्त तक इंग्लैंड का स्कोर था 227 रन. साथ ही 13 ओवर और फेंके जाने बाकी थे. इसके बाद क्रीज़ पर आये फ़्लिंटॉफ़. और उन्होंने गांगुली के इंग्लैण्ड को 250 रन के अन्दर रोकने के मंसूबों को किनारे कर दिया. फ़्लिंटॉफ़ ने 32 गेंदों में 40 रन बनाये. ट्रेस्कोथिक के विकेट के बाद हालांकि विकेट गिरते रहे लेकिन इंग्लैण्ड ने 325 रन का स्कोर बोर्ड पर चढ़ा दिया.

इनिंग्स ब्रेक में सौरव गांगुली अपनी टीम को लेकर ड्रेसिंग रूम में आये. गांगुली के मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ गुस्सा भरा हुआ था. साथ ही निराशा भी. निराशा इसलिए क्यूंकि वो इंग्लैण्ड को 260-270 पर रोकना चाहते थे. गुस्सा इसलिए क्यूंकि उन्हें एक और हार सामने खड़ी दिख रही थी. इसी बीच टीम इंडिया में एक आंतरिक घमासान चल रहा था. कोच जॉन राइट और कैप्टन सौरव गांगुली के बीच. दोनों बेहद अच्छे दोस्त थे. लेकिन इस मैच से ठीक पहले दोनों के बीच झगड़ा हुआ था. दोनों ने एक दूसरे से कभी बात न करने की कसमें खाई हुई थीं. लिहाज़ा ब्रेक में दोनों के बीच टार्गेट चेज़ करने पर कोई भी बात नहीं हुई. सभी प्लेयर्स चुपचाप लंच कर रहे थे. शायद हर किसी को हार साफ़ दिखाई दे रही थी. गांगुली के शब्दों में कहें तो लॉर्ड्स में दुनिया का सबसे अच्छा खाना मिलता है. लेकिन उस दिन गांगुली ने टीम के ट्वेल्व्थ मैन से मात्र एक बाउल सूप मंगवाया. गांगुली और सहवाग ओपेनिंग पर उतरने वाले थे.

लॉर्ड्स के बेहद संजीदा और भव्य लॉन्ग रूम की सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त गांगुली ने सहवाग से कहा, “हमें पंद्रह ओवर में सौ पहुंचना है, उसके बाद देखी जाएगी.” सहवाग अपनी आदत से मजबूर, सर हिलाकर हां में हां मिलाते पाए गए. उनके दिमाग में क्या चल रहा था, मालूम नहीं. हालांकि सौरव इस गफ़लत में थे कि उन्हें सब कुछ समझ में आ गया था.

सहवाग ने इनिंग्स की दसवीं गेंद पर एलेक्स ट्यूडर को एक स्ट्रेट ड्राइव मारी. मारी क्या, बस गेंद को बल्ले से मिलाया. कवर्स में खड़ा फील्डर गेंद के पीछे भगा. लेकिन इसलिए कि जल्दी से बॉल को बाउंड्री से उठाकर वापस ला सके. इधर गांगुली भी जमने लगे. चौथे ओवर की तीसरी गेंद पर सौरव के फुटवर्क ने जता दिया कि उस दिन वो ‘जस्ट-अनदर-क्रिकेट-मैच’ नहीं खेल रहे थे. जिसे इस बात पे रत्ती भर भी शक था, दादा ने उसे उसी ओवर की पांचवीं गेंद पर वही शॉट खेलकर इस बात में यकीन दिला ही दिया.

सहवाग रूम बनाकर ऑफ साइड में गेंदों को भेज रहे थे तो गांगुली फ़्लिंटॉफ़ को ऑन-द-राइज़, कवर्स के ऊपर से छक्का मार रहे थे. बारहवें ओवर की तीसरी गेंद पर गांगुली ने ऑफ स्टम्प के काफ़ी बाहर गिरी फुल लेंथ गेंद पर बल्ला अड़ाकर कवर और पॉइंट के बीच बाउंड्री पहुंचाकर अपनी फिफ्टी पूरी की. गेंदें खेली थीं 35. स्कोर था 78 रन पर एक भी विकेट नहीं. पंद्रह ओवर में सौ रन का प्लान अपनी राह पकड़े हुआ था.

रॉनी ईरानी का पहला ओवर. सहवाग स्ट्राइक पर. पहली गेंद. ऑफ स्टम्प की लाइन में बल्ले के मुंह पर. सहवाग की आंखें चमक गयीं. बल्ला फेंक दिया. बल्ले का फ़ेस लॉन्ग ऑन की तरफ. गेंद भी वहीं. दो टप्पे खाकर गेंद सीधे बाउंड्री के बाहर. दूसरी गेंद. ऑफ़ स्टम्प के काफी बाहर. सहवाग पहले तो गेंद को लेग साइड में विकेट के पीछे मारने वाले थे, लिहाज़ा ऑफ स्टम्प के बाहर निकल आये थे. गेंद और भी बाहर मिलने पर कलाइयां खोल दीं. गेंद सर्किल पर खड़े थर्ड मैन को मुंह चिढ़ाते हुए बाउंड्री के पार. इस शॉट के बाद सौरव चलते हुए सहवाग के पास पहुंचे. उनसे संभल के खेलने को कहा. सहवाग ने फिर सर हिला दिया. ओवर की तीसरी गेंद. गेंद लेग स्टम्प पर. ऐसा लग रहा था जैसे सहवाग बॉलर का दिमाग पढ़ रहे थे. मानो वो खुद ईरानी को गेंद फेंकने की जगह बता रहे हों. सहवाग जो पिछली गेंद पर करना चाहते थे, इस गेंद पर कर दिया. अगला पैर ऑफ स्टम्प के बाहर, शरीर का वजन अगले पैर पर, और बल्ले का चेहरा विकेट के पीछे. फिर से चार रन. इस बार सहवाग चलकर गांगुली के पास पहुंचे. उनके ग्लव्स पर ज़ोर से चोट की. सौरव ने कहा, “भाई तुझे जैसे खेलना है खेल ले.”ओवर की चौथी गेंद. ऑफ स्टम्प के काफी बाहर. लेकिन कम स्पीड और गुड लेंथ से पीछे टप्पा खाने वाली गेंद को खेलने के लिए सहवाग बाहर निकल आये. ऑफ स्टम्प के बाहर खड़े होकर गेंद पर बल्ला यूं चलाया जैसे हाथ में बल्ला नहीं चाबुक हो. कलाई का पूरा इस्तेमाल. गेंद ऑफ स्टम्प से लेग अम्पायर के सामने से होती हुई चार रन के लिए दौड़ पड़ी. ओवर में कुल 16 रन. पूरा स्कोर 13 ओवर में 98 रन. गांगुली का प्लान चल चुका था.

एलेक्स ट्यूडर ने गांगुली को बोल्ड कर दिया. गांगुली स्लॉग के लिए गए और बोल्ड हो गए. 43 गेंद पर 60 रन. गांगुली ने जीत की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू कर दी थी. टीम का स्कोर 106 रन पर 1 विकेट. थोड़ी ही देर में बेमिसाल स्पिनर एश्ले जाइल्स की गेंद पर लेट खेलने के चक्कर में सहवाग बोल्ड हो गए. दिनेश मोंगिया को ईरानी ने कीपर के हाथों कैच करा दिया. राहुल द्रविड़ फ्लिक करने के चक्कर में मिड विकेट पर सर्किल पर पकड़ लिए गए. लेकिन टीम पर सबसे भारी संकट तब आया जब जाइल्स की गेंद को रूम बनाकर पॉइंट और कवर्स के बीच में मारने के चक्कर में सचिन बोल्ड हो गए. कमेंट्री बॉक्स से आवाज़ आ रही थी: “This might be the death now for India in this Natwest series final.” टीम का स्कोर 146 रन पर 5 विकेट.

बैटिंग करने के लिए आये मोहम्मद कैफ़. इंग्लैण्ड की टीम अपनी जीत को लेकर सुनिश्चित हो चुकी थी. नासिर हुसैन अपनी सेंचुरी के मद में अब भी चूर पवेलियन से आते मुहम्मद कैफ़ को देखते हैं और अपनी टीम को संबोधित करते हुए कहते हैं, “चलो दोस्तों! उन्होंने बस ड्राइवर को भेज दिया है. हमारा चांस तो बनता है.” नासिर उस बस की बात कर रहे थे जिसमें बैठ के इंडियन टीम हारकर वापस जाने वाली थी. कैफ़ उन्हें उस बस के ड्राइवर लग रहे थे.


33 ओवर के आस-पास, जब युवराज और कैफ़ बैटिंग कर रहे थे, गेंद रिवर्स स्विंग होने लगी थी. ये वो वक़्त नहीं था जब दोनों छोरों से अलग-अलग गेंदे इस्तेमाल की जाती थीं. ऐसे में नासिर ने अपने रिवर्स स्विंग के उस्ताद बॉलर्स ईरानी और फ़्लिंटॉफ़ को अटैक पर भेजा. लेकिन तभी अंपायर स्टीव बकनर ने गेंद अपने हाथों में थामी और नासिर से कहा कि गेंद बहुत पुरानी हो चुकी है और उसका रंग भी ख़राब हो चुका है.


नासिर अम्पायर से 1-2 ओवेरों की मोहलत मांगते रहे लेकिन बकनर नहीं माने. उन्होंने बॉलर्स को नयी, कड़ी गेंद थमा दी. कैफ़ और युवराज ने जी भर उस गेंद को ठोंका. उस दिन दोनों बल्ले से नहीं दिमाग से खेल रहे थे. सनद रहे कि ये दोनों प्लेयर्स अब तक फिनिशर्स का रोल अदा करते थे. और ये टीम में नए भी थे. जैसा खेल ये खेल रहे थे, सच कहा जाए तो शायद किसी को भी उनसे ये उम्मीद नहीं थी. उन्होंने अपने खेल में सावधानी और अग्रेशन का एक बेहतरीन कॉकटेल बनाया. युवराज ने उस रोज़ ऑन साइड पर कुछ ऐसे शॉट्स लगाये जिन्हें याद कर आज भी एनर्जी भर आती है.

80 गेंद में 121 रन की पार्टनरशिप की बदौलत टीम इंडिया फिर से पटरी पर वापस आती दिख रही थी. लेकिन कॉलिंगवुड ने युवराज को उनकी हाफ़ सेंचुरी के कुछ देर बाद ही कैच आउट करवा दिया. टीम को चाहिए थे 59 रन. 50 गेंदों में.बैटिंग करने आये हरभजन सिंह.


कैफ़ ने अब ड्राइवर की सीट सम्हाल ली. वो ड्राइवर जिसके हॉर्न की आवाज़ अब नासिर हुसैन के कानों में चुभ रही थी.


हुसैन अपने फील्डर्स और बॉलर्स से लगातार बतियाते दिख रहे थे. उधर किसी तरह स्कोर को 300 पार पहुंचवाने के बाद हरभजन चल बसे. और 314 के स्कोर पर कुम्बले भी. इंडिया आठवां विकेट खो चुकी थी. 13 गेंद में 12 रन.

49वें ओवर की पहली पांच गेंदों में मात्र पांच रन आये. स्कोर के हिसाब से ये अच्छा था. मगर हाथ में मात्र दो विकेट होने के कारण ये चिंता की बात थी. लेकिन कमाल दिखाया कैफ़ के बल्ले से लगे खोंचे ने. 7 गेंदों में 6 रन का टार्गेट, कैफ़ के एज की बदौलत 6 गेंदों में 2 रन पर पहुंच गया था.

आखिरी ओवर. इंग्लैण्ड का सबसे शातिर गेंदबाज. एंड्रू फ़्लिंटॉफ़. गांगुली लॉर्ड्स की पवेलियन में रेलिंग पर पैर रखे हुए अपने हाथों से अपने दिल की धड़कनों को महसूस कर रहे थे. स्ट्राइक पर ज़हीर खान. गांगुली को रह-रह कर 3 फ़रवरी 2002 का मैच याद आ रहा था. वानखेड़े स्टेडियम, मुंबई. यही फ़्लिंटॉफ़ बॉलिंग कर रहा था और इंडिया को जीतने के लिए दस रन चाहिए थे. उस दिन भी विकेट बचे थे 2. और फ़्लिंटॉफ़ ने इंडिया को ऑल आउट कर दिया था. जिसके बाद उसने अपनी टीशर्ट उतार मैदान में दौड़ लगायी थी. गांगुली चाह कर भी उस ज़िल्लत को भूल नहीं पा रहे थे.

पहली गेंद. ज़हीर ने आगे बढ़के गेंद को रूम बनाकर मारने की कोशिश की मगर सफल नहीं हो पाए. कोई रन नहीं. दूसरी गेंद. पटकी हुई. लेग स्टम्प के बाहर. ज़हीर ऑफ स्टम्प के बाहर आ गए थे. इस उम्मीद में कि गेंद और बाहर आएगी. ज़हीर ने अंपायर से वाइड देने को कहा. फ़्लिंटॉफ़ और कीपर एलेक स्टीवर्ट पीछे कैच लिए जाने की अपील कर रहे थे. अंपायर ने वाइड बॉल नहीं दी. सौरव गांगुली पवेलियन में चिल्ला पड़े. नाराज़गी साफ़ दिख रही थी. वाइड का मतलब था मैच का टाई होना. इंडिया वहां से हार नहीं सकता था. लेकिन एक ग़लत फैसले की वजह से वैसा नहीं हुआ.

तीसरी गेंद. फुलटॉस. सीधे कवर्स की ओर. लेकिन ज़हीर चूंकि क्रीज़ से बाहर आकर खेल रहे थे, रन के लिए दौड़ पड़े. उधर कैफ़ भी खासे बैकअप के साथ थे. फील्डर ने थ्रो किया. कैफ़ ने डाइव मारी. घास पर लोट गए. लेकिन थ्रो विकेट पर नहीं लगा. कैफ़ दूसरे रन के लिए दौड़ पड़े. ओवरथ्रो. फ़्लिंटॉफ़ अपने घुटने पकड़ के सर झुकाकर पिच के बीचों-बीच खड़े थे. कैफ़ और ज़हीर अब दौड़ नहीं कूद रहे थे. मानों जूतों में स्पाइक्स की जगह स्प्रिंग लग गई हों. 

और अब वो हुआ जिसकी तस्वीर अमर हो चुकी है. वो तस्वीर जो शायद उन्माद का पैमाना बन चुकी है. वो तस्वीर जो हमें एक खिलाड़ी और एक कप्तान के अन्दर दौड़ रहे जूनून की एक झलक दिखलाती है. वो तस्वीर जो हमें कभी हार न मानने का सबक सिखाती है. वो तस्वीर शायद जो सौरव गांगुली का पर्याय बन चुकी है. दादा ने अपनी टीशर्ट निकाली और हवा में घुमानी शुरू कर दी. मुझे नहीं मालूम कि हिन्दुस्तानी क्रिकेट में इससे ज़्यादा जोश से भर देने वाला कोई और पल हो सकता है. इस पल को खुद दादा ने कमाया था. पूरी टीम झूम उठी थी. लॉर्ड्स पागलों की तरह चीख रहा था. देश में टीवी सेट पे अटके लोग अब भी विश्वास करने की कोशिश कर रहे थे कि हम सचमुच नेटवेस्ट सीरीज़ अपने नाम कर चुके थे. और इसी बीच मोहम्मद कैफ़ नासिर हुसैन के बगल से निकले. उन्हें देखा और कहा:

“एक बस ड्राइवर के हिसाब से तो ये बुरा नहीं है.”

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