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इस साल आए पांच गाने जिन्हें उनके बोल ही अनूठा बना देते हैं

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आमतौर पर बॉलीवुड में दो ही तरह की चीजें सबसे ज्यादा चलती हैं – स्टीरियोटाइप या फिर एकदम नई. बीच की चीजों को यहां ठौर मिल पाए ऐसा होना जरा मुश्किल होता है. यहां पर जिन पांच गानों का जिक्र हम करने जा रहे हैं वे इन तीनों ही श्रेणियों से बाहर लग सकते हैं. इनकी सिर्फ एक छोटी सी खासियत ही इन्हें बाकियों से अलग खड़ा कर देती है. इनमें से कुछ की भाषा अलग है तो किसी का मिजाज, कोई ऐतिहासिक तथ्यों को बड़ा करीने से हमारे सामने रखता है तो कोई सामाजिक समस्या की बात करता है –

दिल उल्लू का पट्ठा है – जग्गा जासूस – अमिताभ भट्टाचार्य

उलू ले -उलू ले जैसे ऊटपटांग लेकिन मासूम लगने वाले बोलों से शुरू हुआ यह गाना दिल को उल्लू का पट्ठा बताता है. सोशल मीडिया पर किसी ने इस गाने पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘एक वक्त था जब दिल, दिल हुआ करता था. उसके बाद पहले तो यह दीवाना हुआ फिर पागल कहलाया और अब उल्लू का पट्ठा साबित हो गया है.’ अमिताभ भट्टाचार्य ने दिल की शिकायत बड़े मजेदार बोलों में की हैं. गाने में शामिल एक लाइन ‘जैसे आता है चुटकी में जाता है, दिल सौ-सौ का छुट्टा है’ आपको मोह लेती है. आपको भी पता है कि सौ-सौ में बदलने के बाद बड़ी रकम भी कितनी तेजी से खर्च हो जाती है. यह एक लाइन हर सुनने वाले को गाने से कनेक्ट होने का मौका दे देती है. आम बातचीत में शामिल बातों वाले बोलों को लिखने में भट्टाचार्य कुशल माने जा सकते हैं. इसी फिल्म का ‘गलती से मिस्टेक’ इसका एक और उदाहरण हैं.

कोई भी मस्ती भरा गाना इन्हीं खासियतों के साथ लिखा जाता है. लेकिन इस गाने को खास बनाने वाला सिर्फ वर्ड प्ले नहीं, कोई और चीज है. दूसरी लाइन जो इसे सबसे खास बनाती है वह है – ‘संगेमरमर के बंगले बनाता है, दिल अकबर का पोता है.’ तुकबंदी में कही गई यह बात एकदम सही-सही ऐतिहासिक तथ्य बताती है. अकबर, अकबर का बेटा जहांगीर और उसका बेटा शाहजहां जिसने ताजमहल बनवाया था. बेशक शाहजहां के ताजमहल बनवाने पर और भी गाने लिखे गए हैं लेकिन वे शुरू से आखिर तक उसी पर केंद्रित रहे. गाने के बीच में बस एक लाइन में इस तरह का प्रयोग इस गाने को खास बना देता है. भले ही यह बड़े ध्यान से सुनने पर ही हमें समझ में आता हो

नाच मेरी जां – ट्यूबलाइट – अमिताभ भट्टाचार्य

ट्यूबलाइट भले ही लोगों की उम्मीदों पर उतनी खरी न उतर पर पाई हो लेकिन फिल्म की शुरूआत में बजने वाला यह गाना लोगों की जुबान पर भली तरह चढ़ गया था. गाने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके मुखड़े में हिंदी के किंतु-परंतु जैसे शब्द शामिल हैं जो आजकल गाना या आम बोलचाल तो छोड़िए हिंदी अखबारों और साहित्यिक रचनाओं में भी पढ़ने को नहीं मिलते हैं. यह प्रयोग इस गाने को कई मायनों में विशेष बना देता है. खासतौर पर शुद्ध हिंदी के मामले में जो अक्सर फिल्मों में सिर्फ हंसी-मजाक के लिए इस्तेमाल की जाती है.

सिचुएशनल सॉन्ग होने के कारण गाने में बहुत सारी ऐसी बातें शामिल हैं जो उन पात्रों पर ही फिट बैठती हैं. फिर भी ‘तू मेरा हुकुम का इक्का, तू मेरा क्रिकेट का छक्का’ या ‘तू अलादिन मैं तेरा जिन’ जैसी मासूमियत भरी बातें भी इसमें शामिल है. ढिशकाओं-ढूम-ढूम टाइप गानों के बीच इतनी सारी खासियतों वाला यह किंतु-परंतु हमें एक अलग तरह से थिरकने का बुलावा देने वाला लगता है.

मैं बनी तेरी राधा – जब हैरी मेट सेजल – इरशाद कामिल

आम तौर पर राधा बनने-बनाने का ख्याल भजननुमा गानों में ही इस्तेमाल किया जाता है. बहुत दिनों बाद किसी रोमांटिक गाने में राधा का जिक्र आ रहा है. पिछली बार जब राधा किसी गीत के बोलों में शामिल हुई थी तो उस समय नेता विपक्ष सुषमा स्वराज को भी इस पर आपत्ति हो गई थी. उनका कहना था कि राधा और सेक्सी शब्द एक साथ नहीं आ सकते है और साथ ही उनका कहना था कि ‘राधा कान्ट रॉक ऑन डांस फ्लोर.’ यह किस्सा साल 2012 में आई फिल्म स्टूडेंट ऑफ द इयर के पार्टी सांग ‘राधा ऑन द डांस फ्लोर’ से जुड़ा है.

इम्तियाज अली की प्रेम-यात्रा-कथा में शामिल इस गाने में इरशाद कामिल ने ढेर सारे मसाले डाले हैं. उन्होंने गाने में राधा के साथ अक्सर नजर आने वाले सखियों-अंखियों जैसे शब्द तो रखे ही हैं, साथ ही दो किरदारों के बीच की खींचतान भी भली तरह से पिरोई है. गाने की शुरूआत में सुनाई देने वाला हिस्सा किसी पंजाबी लोकगीत से लिया गया लगता है जिसके साथ इरशाद ने आशिक दिल के टशन की बात की है. गाने में इस दौर की सारे खासियतें मौजूद होने के बावजूद मुखड़े में राधा डांस फ्लोर पर नाचने के साथ-साथ रास रचाने वाले जमाने की भाषा की भी याद दिलाती है. इस तरह यह गाना साल के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले गानों में अपनी जगह बना चुका है, इसमें अब कोई शक नहीं है.

 

हंस मत पगली – टॉयलेट एक प्रेमकथा – सिद्धार्थ सिंह और गरिमा वहल

हंस मत पगली गाने को इस लिस्ट में जगह देने की इकलौती वजह इस गाने में उस जुमले का इस्तेमाल करना है जो अब तक आपको ऑटो या ट्रकों के पीछे ही लिखा दिखाई देता था. सबसे तुच्छ स्तर का समझा जाने वाला साहित्य सड़कों पर इस तरह सफर करता तो दिखता है लेकिन कभी किसी से कहा-सुना नहीं जाता, फिर गुनगुनाना तो दूर की बात है. अब तक सिर्फ सड़क साहित्य के हमारे सामान्य ज्ञान का हिस्सा रही इन लाइनों को लोगों की जुबान पर चढ़ाने का काम सिद्धार्थ-गरिमा की गीतकार जोड़ी ने किया है. यह वही जोड़ी है जिसने पिछले दिनों रामलीला और बाजीराव मस्तानी के नशे में भर देने वाले गाने लिखे थे. हालांकि यह और बात है कि हाल ही में इनकी लिखी फिल्म राब्ता दर्शकों को उतनी पसंद नहीं आई.

सा रा रा… – अनारकली ऑफ आरा – रविंदर रंधावा

रविंदर रंधावा का लिखा यह गाना फिल्म के क्लाइमैक्स में देखने को मिलता है. इसके जरिए नाच-गाना करने वाली एक लड़की जब अपनी सहमति का मोल बताती है तो लगता है मानो शब्दों के जरिए कोई तांडव रचा गया हो. गाने का आधा हिस्सा फिल्म के बाकी गानों की तरह द्विअर्थी है. लेकिन जब आप दूसरा हिस्सा सुनते हैं तो यह उस ऊंचाई तक पहुंचने का रास्ता लगता है जहां पर आपको ‘अबला बवाल देख, डायन-छिनाल देख, कुल्टा कमाल देख’ जैसे शब्द रोंगटे खड़े करने वाली ठंडक का एहसास करवाते हैं.‘छुएगा जो हमका बिन हां-हां’ या ‘हमरे बदनवा की हम महरनिया’ का उद्घोष अनारकली जैसे किरदार की ही नहीं हर औरत की आवाज होने की ताब रखता है. एक आम महिला जो बात बहुत बार नहीं कह पाती वह रंधावा इस गाने के जरिए एक नाचने वाली से कहलवा देते हैं और वह भी पूरी गरिमा के साथ.

ये हिलाने वाले बोल लिखने वाले रविंदर रंधावा फिल्म के एसोसिएट डायरेक्टर भी थे. वे अपनी शर्तों पर काम करने के लिए जाने जाते हैं शायद इसीलिए इनका गिना-चुना काम ही देखने को मिलता है. रंधावा का ताल्लुक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी दिल्ली से रहा है, इसलिए भी उनसे अनोखा काम मिलने की उम्मीद थोड़ी बढ़ जाती है. अनारकली ऑफ अारा से पहले उनके लिखे गीत साल 2012 में आई फिल्मिस्तान में लिए गए थे जो किन्हीं वजहों से उतनी चर्चा नहीं बटोर पाई.

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