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किताबें खरीदने के लिए पैसा नहीं, बंद हो गयी बिहार की पांच सौ पब्लिक लाइब्रेरी

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इन दिनों

सोशल मीडिया पर हर जगह किताबें ही किताबें नजर आ रही हैं. इस कड़ाके की ठंड में भी लोग दिल्ली के पुस्तक मेला में किताबें खरीदने के लिए उमड़ रहे हैं. पटना का पुस्तक मेला पिछले दिनों ही गुजरा है. इन दोनों पुस्तक मेले में बिहार के लेखकों और पाठकों की मौजूदगी सबसे अधिक रही है. दिख रही है. मगर किताबों के इस जलसे के बीच यह खबर आहत कर रही है कि पिछले 60 सालों में बिहार की 497 पब्लिक लाइब्रेरी बंद हो गयीं. अब जो 38 पब्लिक लाइब्रेरी बची हुई हैं, उनके पास चार साल से किताबें खरीदने का फंड नहीं है.

यह अपने आप में अजीबोगरीब तथ्य है. बिहार राज्य जो देश भर में किताबें और साहित्य पढ़ने के लिए जाना जाता है. लघु पत्रिकाओं की बिक्री इस राज्य में सबसे अधिक होती है. बाहर इस राज्य की छवि एक पढ़ाकू सूबे की तौर पर है. मगर राज्य की 38 पब्लिक लाइब्रेरियों में पिछले चार सालों से कोई नयी किताब खरीदी नहीं गयी है. वजह क्या है…

वजह है इन पुस्तकालयों के पास किताबें खरीदने का पैसा नहीं है. यह पैसा इन्हें दो तरीके से मिलता था. पहला राज्य सरकार से सीधे मिलने वाला ग्रांट, दूसरा राजा राममोहन राय ग्रांट का पैसा, जिसमें राज्य सरकार को 40 फीसदी अंशदान देना था. एक जमाने में राज्य सरकार राज्य के सभी पुस्तकालयों को सालाना तीन सौ रुपये का ग्रांट देती थी. 1985-86 तक राज्य की 535 पब्लिक लाइब्रेरीज को प्रति पुस्तकालय इसी दर से ग्रांट दिया जाता रहा. जाहिर सी बात है कि इससे काम चलने वाला नहीं था. धीरे-धीरे पुस्तकालयों के बंद होने का सिलसिला शुरू हो गया. और अंत में यह संख्या 38 पर पहुंच गयी.

2012 में दर में सुधार किया गया और राज्य के सभी पुस्तकालयों को किताबें खरीदने के लिए एक करोड़ रुपये सालाना का फंड जारी करने का फैसला लिया गया. यह भी ऊंट के मुंह में जीरा जैसा ही था. यानी दो से ढाई लाख प्रति पुस्तकालय. क्योंकि आज के वक्त में हार्ड बांड की कोई किताब तीन-चार सौ से कम में मिलती नहीं. ऐसे में हर पुस्तकालय पांच-सात सौ नयी किताबें खरीद पा रहा था. मगर 2014 से यह ग्रांट भी बंद हो गया. लिहाजा चार साल से बिहार के सभी पब्लिक लाइब्रेरी में किताबें खरीदने का काम बंद है.

राज्य में इस वक्त 20 जिला स्तरीय, 6 प्रमंडल स्तरीय, 10 अनुमंडल स्तरीय और दो सरकारी लाइब्रेरी हैं. इनमें से तीन चार लाइब्रेरी तो ऐसी है जिनका पूरे देश में नाम है. चाहे भागलपुर का भगवान पुस्तकालय हो, जहां एक लाख से अधिक किताबें हैं. मगर उन किताबों के रखरखाव तक का इंतजाम नहीं है. वैशाली के लालगंज का शारदा सदन पुस्तकालय हो, जो पिछले सौ से अधिक सालों से संचालित हो रहा है. जहां खुद गांधी जी 1917 में पहुंचे थे. मुझे मेहसी कस्बे में भी एक सौ साल से अधिक पुराना पुस्तकालय मिला था. मगर ये ऐतिहासिक पुस्तकालय भी जैसे तैसे चल रहे हैं. पूर्णिया में तो सरकारी पुस्तकालय है, मगर उसे भी कोई ग्रांट नहीं दिया जा रहा है.

ग्रांट तो इन पुस्तकालयों को कर्मियों के सैलरी के लिए भी नहीं दिया जा रहा है. लोग उम्मीदों के सहारे हैं. कला, संस्कृति और पुरातत्व के नाम पर हर साल अरबों खर्च कर देने वाली बिहार सरकार इन पुस्तकालयों के लिए हर साल एक करोड़ भी क्यों खर्च नहीं कर पा रही, यह समझ से परे बात है. जबकि पड़ोस में पश्चिम बंगाल सरकार अपने पुस्तकालयों को किताबें खरीदने के लिए हर साल 64 करोड़ का ग्रांट देती है. तमिलनाडु सरकार इस मद में 50 करोड़ खर्च करती है. यहां भी इस बजट को सालाना 25 करोड़ करने की योजना बन रही है और कई सालों से बन रही है. मगर एक ऐसी सरकार जो किताबों के नाम पर एक करोड़ खर्च करने के लिए तैयार नहीं है, वह 25 करोड़ खर्च करने लगे यह बात असंभव लगती है.

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