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किस्सा कोना : “तभी से ई कहावात बन गया कि… गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!”

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राम राम. कैसे हो हुजुर. सब बढ़िया. साल का पहला हप्ता देखते ही देखते केतना बढ़िया से बित गया  न.  पटना में प्रकाश पर्व और उधर बोध गया में कल्ल्चाक्र पूजा. साल का सुरुआत तो एकदम चक चक रहा. बाकि इ सब के बाद भी सब मस्त रहे एह लिए YESIMBIHARI.in आपने भाई भौजाई, चच्चा चाची, भाई बहिन, दोस्त मित्र लोगन के लिए वेबसाइट पर  एगो कोना विकसित किया है. जहाँ हफ्ता के हर सनीचर के एगो अइसन कहानी पढाया जायेगा, जो आपका आप सबे के हंसायेगा, गुदगुदाएगा. और थोडा इमोशनल भी करेगा. ताकि आपका हर हफ्ता मस्त बीते साल के पहले हफ्ते के जईसन.

आप आप सब लोगन के लिए बिहार के एगो बहुते बम्पर आदमी के किस्सा लाये हैं. गोनू झा का किस्सा. अरे, गोनू झा का किस्सा याद है न ?? नहियो याद है तो कौनो बात नहीं। हम फेर से कह देते हैं। वही कमला-बलान के किनारे मिथिला का प्रसिद्द गाँव है, भरवारा। ई बड़की पोखर के भीर पर उंचका डीह जो देखते हैं न…. उ गोनुए झा का न है। गोनू झा के चालाकी का किस्सा तो मिथिलांचल क्या अगल-बगल के एरिया में भी एक युग से प्रचलित है। गोनू झा कौनो इस्कूल-कॉलेज के पढ़े नहीं… उ तो मिथिला के एगो सीधा-सादा किसान थे। लेकिन हाज़िरजवाबी और चतुराई में बड़े-बड़े विद्वान को धूल चटा देते थे।

अब तो गाँव की बात पता ही है। उनकी चालाकी से भी सभी गाँव वाले जलते थे मगर मुंह पर उनका ‘फैन’ बने फिरते थे। लेकिन गोनू झा की छट्ठी बुद्धि को शक था कि ई लोगो के प्यार में कुछ झूठ मिश्रित है। उ बहुत दिन से गाँव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का पिलान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गाँव वालों की ही होती तब तो गोनू झा अपने जोगार टेक्नोलोजी से उनको तुरत फिट कर देते। मगर उनको तो अपने घर के लोगों की बातों में भी मिलाबट की महक आती थी। सो उन्होंने सोचा कि क्यूँ न सबका एक ही ‘कॉमन टेस्ट एग्जाम’ ले लिया जाय।
 
बहुत सोच-विचार के झा जी एक दिन सुबह में उठबे नहीं किये। सूरुज चढ़ गया छप्पर पर मगर गोनू झा बिछौना नहीं छोड़े। तब ओझाइन को जरा अंदेशा हुआ। गयी जगाये तो ई का…. आहि रे दैय्या…. रे बाप रे बाप…!!! झा जी के मुंह से तो गाज-पोटा निकला हुआ था और बेचारे बिछौना से नीचा एगो कोना में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगी कलेजा पीट के वहीं चिल्लाए। बेटा भी माँ की आवाज़ सुन कर बाबू के कमरे में आया। उहाँ का नजारा देख कर उका कलेजा भी दहल गया। उहो लगा फफक-फफक कर रोये।
 
इधर ओझाइन कलेजा पर दुहत्थी मार-मार कर चिग्घार रही हैं,…. उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई लेले बस हमरे बाबूजी को लौटा दे। ई महा दुखद खबर सुन के गोनू झा से उनको मरणोपरांत अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया जी भी पहुँच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी। लगे दुन्नु जने झा जी के बेटा को समझाए। “आ..हा…हा… ! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।”
 
उधर जिनगी भर झा जी का चिलमची रहा अकलू हजाम औरत महाल में ज्ञान बाँट रहा है। ‘करनी देखो मरनी बेला !’ देखा गोनू झा जैसे उमिर भर सब को बुरबक बनाते रहे वैसा ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांकिये रह गया।’ सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, ‘झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे। सीधे सरंग गए। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कौनो काम नहीं है। कुछ रुपैय्या पैसा रखे हैं तो गौदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।’
 
उधर मुखिया जी उ का बेटा को बोले, जल्दी करो भाई, घर में लाश ज्यादे देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हरे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने। जल्दी से ले के चलो। फिर दू आदमी से पकड़ के झा जी को कमरे से बाहर निकालने लगे। लेकिन गोनू झा कद काठी के जितना ही बड़े थे उनका घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपना जिनगी में तो झा जी झुक कर निकल जाते थे। लेकिन अभी लोग बाहर करिए नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़क कर बोले, अरे सुरजा बढई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।
 
सुरुज तुरत औजार-पाती लेके हाज़िर भी हो गयातभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, ‘रुको हो सुरुज भाई ! बाबू जी तो अब रहे नहीं। उ बड़ा शौक से ई दरवाजा बनवाये रहे। ई का काटे से उ का आत्मा को भी तकलीफ होगी। अब तो उ दिवंगत होय गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। सो उनका पैरे को बीच से काट कर छोटा कर देयो। फिर आराम से निकल जायेंगे।’
 
हूँ कर के सुरुज बढई जैसे ही झा जी के घुटना पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठ कर बैठ गए…. और बोले रुको! अभी हम मरे नहीं हैं। उ तो हम तुम सब लोगों का परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरे के बाद भी। अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हजाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा… सब का मुंह बसिया जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सब की कलई जो खुल गयी थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए लेकिन तभी से ई कहावात बन गया कि “गोनू झा मरे ! गाँव को पढ़े !!” मतलब बुरे वक़्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।
ये कहानी हमारे लिए  करण समस्तीपुरी ने लिखी है. अगर आपके पास भी है ऐसी ही कहानी तो हमें भेजें.  click here SUBMIT NOW

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