THE BIHARI

कुंदन रंग को साफ नहीं देख पाता, फिर भी छठ पर्व का यह पेंटिंग देख आप इनके फैन हो जायेंगे

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कलर ब्लाइंडनेस भी नहीं रोक सकी कुंदन के हुनर को। कुंदन ने इतनी सुंदर ईको फ्रेंडली प्रतिमा बना कर सभी को अपनी ओर आकर्षित किया। उनका पेशा मुर्ति बनाना नहीं फिर भी वह रूचि के तौर पर इसे बनाते हैं। वह सन् 2011 से नागपुर में जाॅब कर रहे हैं साथ ही साथ आकाशवाणी नागपुर में एंकरिंग के तौर पर भी उन्होंने काम किया है। इसके बावजूद उन्होंने अपने हुनर को जिंदा रखा।

इस पेंटिंग में छठ महापर्व के प्रशिद्ध गीत “सुगा गिरे मूरछाय ” को प्रदर्शित किया गया है। और पेंटिंग के मध्य में सुर कोकिला शारदा सिंन्हा जी को दिखाया गया है।

कुंदन ने  बातचीत में बताया कि जब वह सिर्फ छह वर्ष के थे तभी अपने शौक के तौर पर यह शुरू किया। शुरू में मेरे माता-पिता और रिस्तेदारों ने मुझे इन सब चीजों में समय बर्बाद ना करने की नसीहत दी। उन्होंने इन सब कारीगरी को छोड़ पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। लेकिन कुंदन उस समय सुर्खियों में आए जब बिहार के एक क्षेत्रीय टीवी चैनल ने प्रमुखता के साथ उनके कारीगरी के बारे में बताया। तब कुंदन के माता-पिता ने भी उन्हें मुर्ति बनाने की सहमति दे दी पर सिर्फ शौक के तौर पर। जब पढ़ाई से समय बचे तभी यह सब करने को कहा। आज कुंदन एक सफल नौकरी कर रहे हैं पर आज भी उनका यह शौक बरकरार है।

कुंदन ने बताया कि वो इको फ्रेंडली मुर्ति 2011 से बना रहे हैं। यह एक खास तरह के मिट्टी साधु क्ले से बनती है, जिनके विसर्जन के बाद हमारे वातावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। यह मिट्टी ज्यादातर राजस्थान, गुजरात और कोणकंण क्षेत्र के नदी किनारे पाया जाता है।

अपनी बनाई गयी मूर्ति को उन्होंने बिहार की कोकीला नाम से मशहूर और पद्मश्री शारदा सिन्हा को भी भेंट किया है। वह शारदा सिन्हा को अपना आइडल भी मानते हैं और उन्हीं के तरह संस्कृतिक धरोहरों को जीवित रखना चाहते हैं।

जिंदगी जीने के लिए एक कमी जरूरी है तभी इंसान उसको पाने के लिए आगे बढ़ता है। जिसने अपनी कमी को अपना हथियार बना लिया वहीं इंसान जिंदगी में आगे बढ़ता है। कुंदन ने इस चरितार्थ को सही कर दिखलाया है।

कुंदन ने एमबीए करने के बाद नागपुर में ही जाॅब की पर इन नौकरी के दवाब में अपने शौक को कहीं फिका नहीं पड़ने दिया। नागपुर शहर को भी उन्होंने अपनी कलाकारी का दिवाना बना दिया। उन्होंने अपने हुनर के दम पर नागपुर में बहुत नाम कमाया। कुंदन फिलहाल माँ की तबीयत बिगड़ने के कारण समस्तीपुर में ही है।

उनकी एक बात हमें बहुत पसंद आई कि उन्होंने नागपुर में जाॅब करते हुए भी अपने इस हूनर को जिंदा रखा वरना परिवार की जिम्मेवारी और ”सबसे बड़ा रोग की क्या कहेंगे लोग” इस डर से करना कुछ होता है और हो कुछ जाता है। इस चक्कर में लोग अपने हुनर को छुपा से देते हैं या दिल के किसी कोने में दबाए रह जाते हैं। पर कुंदन ने दुनिया को बता दिया कि अगर मन में सच्ची लगन हो तो सफलता आप के कदम जरूर चूमती है। अगर उन्हें सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन मिले तो वह और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। वह मधुबनी पेंटिंग के धरोहर को भी आगे ले जाना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि उनकी तरह हर कोई अपनी कमजोरी को अपना हथियार बनाए।

उन्होंने डाॅ. संजय सी रघटाटे  के आक्सफोर्ड एकेडमी में ”ओरेटर आॅफ द मन्थ” का खिताब जीता फिर उसी मंच पर उन्हें एंकरिंग भी करने का मौका मिला। सालों पेंटिंग से दूर रहने के बाद काॅलेज के एच.ओ.डी गीता नायडू के कहने पर उन्होंने एक पेटिंग प्रतियोगिता में भाग लिया और द्वितीय स्थान पर रहे। फिर उन्होंने सोचा जिस रंग से मेरा नाम है उसे मैं अपनी पहचान बना दूंगा।

बिहार  को गर्व है किबिहार के  समस्तीपुर के मिट्टी पर ऐसे कलाकार ने पैदा लिया और देश के हर कोने में  बिहार का नाम रौशन किया। साभार – www.samastipurtown.com

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