THE BIHARI

कौन हैं यह बिहारी जिन्हें जन्मदिन पर याद कर रहा है गूगल

Get Rs. 40 on Sign up

जावेद अख्तर, मुजफ्फर हनफी, इकबाल मसूद जैसे शायर और लेखक जिनके शार्गिद रहे हैं उनके बारे में दो शब्द भी लिखना और कहना मुश्किल काम है. लेकिन Yesimbihari.in ने एक कोशिश की है मशहूर उर्दू लेखक और आलोचक अब्दुल कावी देसनावी के बारे में कुछ बताने की. वो लेखक जिनके बारे में बिहार के लोग आज भी उनकी बफात (मृत्यु) के बाद कहते हैं कि देसनावी को हमसे भोपाल वालों ने छीन लिया.

यहां हम आपको बता दें कि बिहार के लोग ऐसा इसलिए कहते हैं कि मुम्बई से पढ़ाई करने के बाद देसनावी का पूरा जीवन भोपाल में बीता. यहीं पर सैफिया कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर उर्दू की खिदमत करते रहे. आपको बताते चलें कि बिहार वालों का मलाल करना कोई बेमानी नहीं है. देसनावी की पैदाइश 1930 में बिहार के देसना में हुई थी. इसी के चलते अब्दुल कावी के नाम के साथ देसनावी  जुड़ गया.

मुम्बई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में प्रिंसीपल थे पिता सईद रजा

देसनावी  के पिता डॉ. सईद रजा मुम्बई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में प्रिंसीपल थे. इसी वजह से देसनावी  की पढ़ाई मुम्बई में हुई और जिंदगी का एक अहम हिस्सा भी मुम्बई में गुजरा. इनकी पढ़ाई भी सेंट जेवियर्स कॉलेज से हुई. उर्दू से जुड़ाव भी ग्लैमर की दुनिया वाले इसी शहर में रहने के दौरान हुआ.

ग्लैमरस सिटी मुम्बई से आ गए अदबी शहर भोपाल
अब्दुल कावी देसनावी  के मार्गदर्शन में पीएचडी करने वाले भोपाल के खालिद आबिदी बताते हैं कि ‘देसनावी  साहब के चाचा सुलेमान भोपाल में रहते थे. इसी के चलते चाचा के साथ मुम्बई से भोपाल आ गए. यहां के मशहूर सेफिया कॉलेज में उर्दू विषय के प्रोफेसर हो गए. इत्तेफाक से मुम्बई से आने के बाद भी इस अदबी शहर से उनका ऐसा जुड़ाव हुआ कि पलटकर भी उन्होंने कभी दूसरे शहर में जाने के बाद में नहीं सोचा. इतना ही नहीं भोपाल से उन्हें इस कदर मोहब्बत हो गई थी कि उन्होंने भोपाल पर रिसर्च कर दी.’

 

देसनावी  ने ही बताया था अल्लामा इकबाल और गालिब का भोपाल से जुड़ाव
देसनावी  ने भोपाल के बारे में जो रिसर्च की थी बाद में उसे दो किताबों की शक्ल दी गई. भोपाल के लिए इज्जत की बात ये है कि उन दो किताबों को जोड़ा गया मशहूर शायर अल्लाम इकबाल और मिर्जा गालिब से. खालिद आबिदी बताते हैं कि देसनावी  ने अपनी रिसर्च को दो भागों में बांटा था. पहली किताब का नाम था ‘अल्लामा इकबाल और भोपाल’, दूसरी का नाम था ‘गालिब भोपाल’.

सियासत से दूर मेहमान नवाज थे देसनावी  
खालिद आबिदी बताते हैं कि ‘वर्ष 1990 ये वो समय था जब आरक्षण और रामजन्म भूमि के मुद्दे पर सियासत गरमाई हुई थी. लेकिन सियासत से दूर रहने वाले देसनावी  ने कभी इस बारे में भी कुछ नहीं कहा. इस सबसे दूर वो एक अच्छे मेहमान नवाज थे. आने वाला कोई बड़ी मेहमान हो या उनका शार्गिद, सभी को बराबर का दर्जा देते थे. रोज-रोज उनके दर पर आने वाले शार्गिदों को भी कभी ये महसूस नहीं होता था कि वो रोज आने वालों की फेहरिस्त में हैं.’

ऑल इण्डिया रेडियो की प्रोग्रामिंग सलाहकार समिति में रहे सदस्य
अब्दुल कावी देसनावी  सिर्फ उर्दू भाषा के जानकार नहीं थे बल्कि उस समय के जाने-माने लेखक भी थे. उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें आज दुनियाभर में जाना जाता है. देसनावी  ने वैसे तो कई प्रसिद्ध कृतियां लिखी हैं, लेकिन उसमे ‘हयात-ए-अबुल कलाम आजाद’ का उर्दू साहित्य में अलग ही स्थान है. ये किताब स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद के जीवन पर लिखी गई थी, जिसे साल 2000 में प्रकाशित किया गया था.

भोपाल के सैफिया कॉलेज में उर्दू विभाग के प्रमुख और कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय साहित्यिक समितियों के सदस्य के रूप में, उन्होंने भारत में उर्दू साहित्य और शैक्षिक विचार के विकास के लिए खासा काम किया. देसनावी  ऑल इंडिया रेडियो पर प्रोग्रामिंग सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे थे.

कौन हैं उनके शार्गिद खालिद आबिदी
उर्दू में पीएचडी करने वाले खालिद आबिदी भोपाल के ही रहने वाले हैं. आज वो भोपाल में एक बड़ी लाइब्रेरी चला रहे हैं. साथ ही उर्दू किताबों को लिखने और उनकी प्रिंटिंग के कारोबार से जुड़े हुए हैं. खालिद आबिदी ने देसनावी  के मार्गदर्शन में ही पीएचडी की थी.

देसनावी  को गूगल भी दे रहा है मुबारकबाद
गूगल आज उर्दू लेखक और आलोचक अब्दुल कावी देसनावी  का 87वां जन्मदिन मना रहा है. गूगल ने आज अपने डूडल के लोगो पर उनकी फोटो लगाई है. डूडल को उर्दू लिपि में डिजाइन करके देसनावी  को कुछ अलग अंदाज में मुबारकबाद दी है.

Write your Comments here

comments

Show More
रहें चौबीसो घंटे बिहार और देश दुनिया की ख़बरों से अपडेट, फेसबुक पेज जरुर लाइक करें

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close