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क्या नीतीश कुमार का यह नया फैसला वोटरों का एक अलग वर्ग तैयार करने की कवायद का अगला कदम है?

शराबबंदी के बाद अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दहेज और बाल विवाह के खिलाफ एक राज्यव्यापी अभियान शुरू कर दिया है

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते सोमवार को गांधी जयंती के मौके पर बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ राजव्यापी अभियान का आगाज किया है. उन्होंने इन दोनों रिवाजों को समा​ज के लिए घातक बताते हुए कहा कि इनके खिलाफ शराबबंदी की तरह ही अभियान छेड़ा जाएगा. राजधानी पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने ​इन कुरीतियों के खिलाफ साल भर चलने वाले जागरुकता अभियान की रूपरेखा भी पेश की.

इस मौके पर नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि अगले साल 21 जनवरी को इस अभियान के तहत पूरे राज्य में मानव श्रृंखला बनाई जाएगी. वैसे इस साल भी 21 जनवरी को शराबबंदी के पक्ष में तीन करोड़ लोगों के सहयोग से ऐसी मानव श्रृंखला बनाई गई थी. सोमवार को हुए कार्यक्रम में उन्होंने बाल विवाह और दहेज को किसी तरह का समर्थन न देने के लिए पांच हजार लोगों को शपथ भी दिलाई. पटना के अलावा राज्य के सभी जिलों, अनुमंडलों, प्रखंडों, थानों और स्कूलों में लोगों को इस बारे में शपथ दिलाई गई. शपथ में लोगों को किसी भी तरह से बाल विवाह और दहेज का समर्थन न करने और ऐसे समारोहों का बहिष्कार करने का निश्चय कराया गया. अभियान के तहत लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए हर जिले में जागरूकता रथ और कला जत्थों को भी रवाना किया गया. ये रथ और जत्थे गांव-गांव जाकर फिल्मों, नुक्कड़ नाटकों, गीतों और अन्य तरीकों से दहेज प्रथा और बाल विवाह के​ खिलाफ लोगों को जागरूक करेंगे.

बिहार में महिलाओं और बच्चों की दशा खराब

2014 में आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पूरी दुनिया के एक तिहाई बाल विवाह भारत में होते हैं. इसमें बिहार जैसे गरीब राज्य की भूमिका काफी बड़ी बताई गई. वहीं 2015-16 में हुए राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-4) के अनुसार राज्य में 39 फीसदी लड़कियां (राष्ट्रीय औसत 28 फीसदी) और 40 फीसदी लड़के (राष्ट्रीय औसत 20 फीसदी) बाल विवाह के शिकार हैं. हालांकि बीते एक दशक में बाल विवाह से पीड़ित लड़कियों की संख्या एक तिहाई घट गई है. लेकिन ऐसे लड़कों की संख्या लगभग स्थिर बनी हुई है. जानकारों के अनुसार बाल विवाह लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पाने की योग्यता के लिए बहुत बड़ी बाधा है. इससे महिलाओं और बच्चों का स्वास्थ्य सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. अभी राज्य के आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. बाल विवाह के चलते संतानों में बौनेपन की समस्या भी पाई जा रही है.

नीतीश कुमार ने कहा कि बाल विवाह से बच्चों का पूरा शारीरिक और मानसिक विकास नहीं होता, जिससे देश और राज्य दोनों का विकास रुक रहा है. उन्होंने बताया कि इससे लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बीच में रुक जाती है, जिससे वे बेहतर रोजगार नहीं पा पाते. उन्होंने जनसंख्या वृद्धि के लिए भी बाल विवाह और अशिक्षा को जिम्मेदार बताया. एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार बिहार की प्रजनन दर अभी राष्ट्रीय औसत 2.2 की तुलना में बहुत ज्यादा (3.4) है.

उधर, दहेज उत्पीड़न के मामले में बिहार देश में दूसरे स्थान पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार बिहार में पिछले साल दहेज उत्पीड़न के करीब पांच हजार मामले दर्ज किए गए, जबकि दहेज से जुड़ी मौतों के मामलों की संख्या करीब एक हजार पाई गई. नीतीश कुमार ने कहा है कि दहेज के चलते लोगों की गरीबी बढ़ती है और मां-बाप बेटियों की पढ़ाई में कम रुचि लेते हैं. उन्होंने कहा कि यदि इन दोनों कुरीतियों पर काफी हद तक काबू कर लिया गया तो बिहार में लड़के और लड़कियों में भेद समाप्त हो जाएगा, जिससे राज्य तेजी से विकास कर पाएगा.

बाल विवाह और दहेज विरोधी ताजा अभियान छेड़ने वाले नीतीश कुमार पहले भी महिलाओं के पक्ष में कई अच्छे फैसले ले चुके हैं. उन्होंने पिछले साल महिलाओं की मांग पर पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी. सरकार के लिए यह फैसला आसान नहीं था क्योंकि इससे राजकोष को सालाना करीब 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ा. आलोचक भी मानते हैं कि इस फैसले से राज्य का माहौल महिलाओं के पक्ष में सुधरा है.

इन फैसलों से पहले नीतीश सरकार ने पंचायतों और नियोजित शिक्षकों के आधे पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए. राज्य सरकार ने लड़कियों के लिए एमए तक की शिक्षा मुफ्त करने के अलावा राज्य की दूसरी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया. वैसे नीतीश सरकार की सबसे चर्चित योजना ‘मुख्यमंत्री साइकिल योजना’ रही, जिसके तहत स्कूली लड़कियों को मुफ्त में साइकिल बांटी गई.

जानकारोंं के अनुसार कानून और व्यवस्था सहित सड़क और बिजली की दशा सुधरने से भी महिलाओं की दशा में काफी सुधार हुआ है. वरिष्ठ पत्रकार सा​गरिका घोष ने पिछले विधानसभा चुनाव के समय अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि बिजली की बेहतर दशा से महिलाओं के रहन-सहन और उनकी सुरक्षा में काफी फर्क आया. उसी समय एक सर्वे में दो तिहाई से भी ज्यादा महिलाओं ने माना कि नीतीश कुमार के शासन में राज्य में कानून-व्यवस्था काफी सुधरी है.

महिलाओं को ‘स्वतंत्र’ वोटर बनाना नीतीश की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि

कई जानकारों का मानना है​ कि नीतीश कुमार देश के उन विरले नेताओं में हैं जो मानते हैं कि महिलाएं जाति और परिवार से अलग अपनी पसंद से वोट डाल सकती हैं. पिछले चुनावों के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें महिलाओं ने अपने परिवार का विरोध करते हुए नीतीश के पक्ष में वोट डाले. विश्लेषकों के अनुसार ऐसा महिलाओं के हित में लिए गए उनके कई अच्छे फैसलों के चलते हुआ.

2014 लोकसभा चुनाव के समय बिहार में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार वहां के 28 प्रतिशत पुरुषों ने प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार को अपनी पहली पसंद बताया. लेकिन यही सवाल जब महिलाओं से पूछा गया तो 32 फीसदी ने नीतीश का इस लायक माना. दूसरी ओर 2010 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने पहली बार पुरुषों से ज्यादा मतदान किया था. उस समय 51 फीसदी पुरुषों की तुलना में 55 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले थे. पिछले विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से करीब पांच फीसदी अधिक रहा. विश्लेषकों ने इसकी वजह महिलाओं में नीतीश कुमार की बढ़ी लोकप्रियता को माना. उनके अनुसार महिलाएं उनके पक्ष में खुलकर सामने आईं थीं.

यही वह वजह भी है जिसके चलते कई नीतीश कुमार के महिला हितैषी फैसलों को उनका राजनीतिक दांव मानते हैं. इन जानकारों के अनुसार इन फैसलों का उद्देश्य महिलाओं के कल्याण के बजाय उन्हें अपना ‘वोट बैंक’ बनाना है. वैसे नीतीश कुमार समय-समय पर इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं. उनका कहना है कि केवल आ​र्थिक सुधार से बिहार आगे नहीं बढ़ सकता, इसके लिए समाज में सुधार लाना बहुत जरूरी है. दूसरी ओर कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अच्छे फैसलों से किसी नेता को वोट मिलते हैं, तो इसमें बुरा क्या है.

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