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क्यों कांग्रेस के लिए अब हिंदूवाद को साथ लेकर चलना बहुत जरूरी है

अगर कांग्रेस हिंदूवाद से किनारा करेगी तो भाजपा के लिए इस मोर्चे पर चुनौती देने वाला कोई नहीं होगा और इसके कई खतरे हैं. द टाइम्स ऑफ इंडिया की संपादकीय टिप्पणी

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गुजरात चुनाव के नतीजों से एक बड़ा ही दिलचस्प तथ्य भी सामने आता है. राहुल गांधी जिन-जिन विधानसभा क्षेत्रों के मंदिरों में गए उनमें से 18 में कांग्रेस को जीत मिली है. पूरे गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी कुल मिलाकर 27 मंदिरों में गए थे. इनमें प्रतिष्ठित सोमनाथ मंदिर भी शामिल है. तब इसे भाजपा के कट्टर हिंदुत्व के जवाब में उदार हिंदुत्व को आगे लाने की कांग्रेस की रणनीति कहा गया था.

वहीं भाजपा ने इसकी आलोचना करते हुए इसे चुनावी स्टंट करार दिया था और यहां तक कि राहुल गांधी के धर्म पर भी सवाल उठाया था. लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि कांग्रेस को इस रणनीति का फायदा मिला है. इसने भाजपा के हिंदुत्व से जुड़े आकर्षण को काफी हद तक काटने का काम किया और मतदाताओं को मजबूर किया कि वे वोट देने से पहले सत्ताधारी पार्टी के कामकाज का आकलन करें.

हालांकि राहुल गांधी के मंदिर जाने की रणनीति को उदार हिंदुत्व कहना गलत है. सिर्फ अपने धर्म को श्रेष्ठ मानना और दूसरे को खारिज करने की सोच और हिंदुत्व के विपरीत हिंदू दर्शन एक समावेशी विचारधारा है. यहां ईश्वर की अलग-अलग व्याख्याओं और तमाम तरह की विविधता को स्वीकार्यता मिली हुई है. इस आध्यात्मिक नजरिए से देखें तो राहुल गांधी को मंदिरों में जाने के साथ-साथ अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर जाने में भी कोई हिचक नहीं होनी चाहिए.

धर्मनिरपेक्षता का भी अपना एक आध्यात्मिक पक्ष होता है और जो हिंदूवाद के करीब है क्योंकि यह विविधता को स्वीकार करता है. यहां पर यह कहना भी जरूरी है कि अगर कांग्रेस हिंदूवाद को साथ लेकर आगे नहीं बढ़ती तो वह गलती करेगी. ऐसे में वह भाजपा के लिए पूरा मैदान खुला छोड़ देगी और जिसका नतीजा यह हो सकता है कि राजनीति और देश में असहिष्णु तत्वों के साथ-साथ एक ही तरह की विचारधारा को स्वीकार करने वाले तत्वों का दबदबा हो जाए.

हालांकि इस मामले में राहुल गांधी को सावधानी बरतने की जरूरत भी है कि उनका मंदिरों में जाना सिर्फ प्रतीकवाद की राजनीति न हो. मंदिरों में दर्शन करना उनके लिए हिंदूवाद को समझने की एक व्यापक आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा होना चाहिए. वे अपनी इस यात्रा के लिए मार्गदर्शक की मदद भी ले सकते हैं. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जैसे व्यक्ति यह जिम्मेदारी बखूबी संभाल सकते हैं.

इस सबके अलावा राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद यह कहकर एक सकारात्मक और अच्छी शुरुआत तो कर ही दी है कि राजनीतिक विरोधियों को नफरत के जोर पर नहीं, प्यार के साथ हराया जाना चाहिए. दर्शन की भाषा में कहें तो यह प्यार-मोहब्बत ही है जो दुनिया को चला रही है. यह विचार हिंदू दर्शन में तो प्रमुखता से रचा-बसा है ही, दूसरे धर्मों का भी यही सार है.

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