THE INDIANS

गांव के इंजीनियर, गांव के ही मजदूर और किसी ने नहीं लिए पैसे, बना लिया पुल

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नदियों और नहरों पर पुल बन जाना यहां जंग जीतने जैसा है। पहले जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा। टेंडर होते-होते वर्षों बीत जाते हैं। उसके बाद निर्माण में देरी से तय लागत में वृद्धि का झंझट। इस सबके बावजूद यदि पुल बन भी जाए, तो जल्द ही ध्वस्त हो जाते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में नदियों और नहरों पर सरकारी पुल निर्माण का सच यही है। अब इस व्यवस्था से आजिज लोगों ने खुद पुल बनाना शुरू कर दिया है। जिले में चार-चार पुल बन भी चुके हैं। एक-एक पुल की लंबाई 225 फीट तक है।
कटाने नदी पर बना 30 लाख की लागत से पक्का पुल
– अबतक चचरी(बांस का पुल) बनाने वाले पक्का पुल बना कर व्यवस्था को आइना दिखा रहे हैं।
– कटरा प्रखंड में 3 पुल बन चुके हैं। इसमें बागमती नदी पर 2 पीपा पुल, 1 पक्का सीमेंट-कंक्रीट का पुल है।
– व्यवस्था की उपेक्षा से नाराज लोगों ने कदाने नदी पर 120 फीट लंबा पक्का पुल बनाया है।
20 साल सरकार ने नहीं ली सुध, तो लोगों ने बागमती पर बनाया पीपा पुल
– बागमती नदी की धार बदलने के बाद सरकारी पुल नहीं बना।
– कटरा प्रखंड मुख्यालय के पास दो दशक पूर्व लोगों ने जनसहयोग से चचरी(बांस का पुल) बना ली।
– फिर भी सरकार नहीं जागी, तो अब कुछ खास लोगों ने वहां 20 लाख रुपए से पीपा पुल बना लिया।
– 200 फीट लंबे इस पुल के रखरखाव के नाम पर लोगों से पैसा वसूला जाता है। हालांकि, सरकारी अफसरों और नेताओं को छूट है।
20 लाख खर्च कर बनाया गांव में पीपा पुल
– 26 जनवरी 2015 को अमरेश, मुकेश की पहल पर युवाओं ने कदाने पर पक्का पुल बनाने का निर्णय लिया।
– वर्षों तक यहां के लोग जनप्रतिनिधियों से पुल की मांग करते रहे। चुनावों में आश्वासन भी मिलता रहा।

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