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गौरी लंकेश मर्डर: क्या भारत में पत्रकारों की राजनीतिक हत्याएं होने लगी हैं?

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गौरी उनका नाम था और नाम के ही अनुरूप देवी दुर्गा की तरह एक शक्तिशाली और धैर्यवान पत्रकार थीं. पर मेरे लिए वह सिर्फ एक हंसमुख दोस्त थीं. 1980 के दशक में, जब मैं मीडिया इंडस्ट्री में बिल्कुल नया-नवेला ही था, वह हमारी सहयोगी थीं.

न्यूज रूम की हलचल में उनका हंसमुख चेहरा अब भी यादों में ताजा है. इतना मालूम था कि हमारी तरह वह पत्रकारिता में नई नवेली नहीं थीं. उनके पिता, पी. लंकेश स्वयं एक प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार थे और इस तरह से उनकी जड़ें पहले से भी इस पेशे में थीं. जब वर्तमान विदेश राज्य मंत्री एम.जे अकबर ‘संडे’ साप्ताहिक के संपादक थे गौरी उनके साथ उनकी टीम में शामिल हुईं.

जब मै इकोनॉमिक टाइम्स’ में काम करता था, वह टाइम्स ऑफ इंडिया में थीं. एक ही बड़े कमरे में जो पत्रकारों की रौनक रहती थी, उसमें हम शामिल थे. लिखने-पढ़ने और सामाजिक सरोकाकारिता जैसी बातें उनके खून में बहती थीं.

पर मुझे वह बात याद है जब मुझे किसी काम से बेल्जियम जाने का मौका मिला और मेरे पास न पासपोर्ट था न वीजा. और पैसे तो उस जमाने में कम ही होते थे. ‘ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम यूरोप जाओ और सिर्फ काम करके वापस आओ, देखो, सस्ते में भी घूम सकते हैं.’ यह कहकर उन्होंने मुझे किताब दी, ‘यूरोप इन ट्वेंटी फाइव डॉलर्स ए डे.’

घूमने का शौक और दुनिया भर के मामलों को जानने का शौक और समाज में कमजोर और पिछड़ों को ऊपर उठाने का शौक — बस यह तीन चीज ही शायद उनको भाती थी. उनके पिता लोहियावादी थे. उसक समय कर्नाटक में लोहियावादी विचारों का जोर खूब था. इन्हीं विचारों में वह पली-बढ़ी थीं.

मेरे ताल्लुकात उनके साथ उतने नहीं रहे, बावजूद इसके कि मई पांच साल बेंगलुरु में था. बेंगलुरु में एक दिन वह एक फाउंटेन के पास नजर आईं अपने भांजे के साथ. जब मैं भी अपने भांजी को लेकर पार्क पहुंचा था. शायद उस के बाद कुछ खास बात नहीं हुई. हां, फेसबुक के माध्यम से फिर से कुछ बातचीत हो गई पर अधिक नहीं.

पर यह साफ हो गया कि वो पत्रकार कम और एक्टिविस्ट अधिक बन गईं, जिसका परिणाम उनकी दुखद हत्या के रूप में देखने को मिला है. मैं अंग्रेजी में मजाक करता था, ‘गौरी गौरी quite contrary’ (प्रतिवादी विचारों वाली) — पर लगता है यही बात उनके जान को खतरे तक ले गई.

सवाल यह उठता है, क्या भारत इस मुकाम पर आ गया के लोकतंत्र के मौलिक विचारों का कोई स्थान नहीं? क्या स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद गांधी के हत्यारे गोडसे किसी और रूप में जीवित है? क्या अल्पसंख्यक या दलित या शरणार्थियों के बारे में विचार करना या उनके पक्ष में बोलना इतना बुरा माना जाने लगा है के पत्रकारों की भी राजनीतिक हत्या होने लगी है?

मुझे तो याद है बस एक चुलबुली युवती जो मुझे यूरोप का सैर करने को मजबूर कर रही थी पच्चीस डालर प्रति दिन के खर्चे में. शायद दूसरों को ख़ुशी देना कानूनन जुर्म है इक्कीसवी सदी में!

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