THE BIHARI

“छठ घाट पर औरतों का कपड़े बदलना गोआ के बिच जैसा ” लिखने वाले को एक बिहारी का जवाब

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हम बिहारी लोग हैं. पिछड़े हैं. हमारे शहर, हमारे गावँ, हमारे यहां के लोग यहां तक कि हमारी संस्कृति भी और सभी भारतीयों के लाइफस्टाइल, कल्चर आदि से पिछड़ी और बेकार है. हम झूठ मुठ का खुद के बिहारी होने पर गर्व महसूस करते हैं, हमारी शक्ल पर कैपीटल में बोल्ड फॉन्ट से लिखा होता है कि “तुम बिहारी हो” “तुम गंवार हो. तुम इस देश में कलंक हो. यह हम नहीं कह रहे. यह कह रहे हैं लल्लनटॉप. कॉम के लेखक. जी हां।
वही लल्लनटॉप जिसके लेख हमें खबर के साथ मारक मजा भी देता आया है. और यह पहली बार नहीं कह रहे. इससे पहले भी यह ऑनलाइन पोर्टल हम बिहारियों के बारे में ऐसा कह चुका है. लेकिन इस बार का मामला सिर्फ “तुम बिहारी हो” ही पर नहीं सीमित है, इस बार तो लल्लनटॉप किसी चीज़ के बारे में तुक लिखने के चक्कर में बिहार के सबसे बड़े महापर्व को ही गलत ठहरा दिया. इनकी माने तो छठ में महिलाओं का घाट पर कपड़े बदलना गोआ की बीच की तरह है. इनकी माने तो घर से घाट तक छठ का डाला ले जाना दुनिया के सबसे भारी भरकम सामान को ढोना है. इनकी माने तो 2008 का साल छठ के लिए आखिरी साल होने वाला था. और भी बहुत कुछ. (पूरा लेख यहं क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
www.thelallantop.com द्वारा लिखा गया लेख

डिअर लल्लनटॉप. आपसे कुछ कहना है.

सुनिए. ध्यान से. आपने अपने इस आर्टिकल को फेसबुक पेज पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि “छठ पूजा से जुड़ी अपनी यादें बता रहा है एक बिहारी ” मतलब की आपके अनुसार इस लेख को एक बिहारी सदस्य ने लिखा है. हो सकता है इसलिए भी की लोग उसे गालियां दें. या कुछ और. लेकिन अगर सच में इसे एक बिहार के लड़के ने लिखा है तो उन लोगों में से है जो भारत के किसी कोने में बिहार से जाते हैं और वहां जाकर वो यूपी वाले हो जाते हैं । दरअसल उन्होंने कभी बिहार को या बिहार की संस्कृति को समझे ही नहीं. अगर समझते तो खुद की माँ, बहन, बेटियों की तुलना गोआ की बीच से नहीं करते. साड़ी और बिकिनी में फर्क होता है.
  • और जहां तक बात है, हम बिहारियों का दूसरे राज्यों में रह कर भी छठ करने का, ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है. चाहे हम बिहार में रह कर छठ करें. दिल्ली में करें, मुम्बई में करें या किसी भी शहर,राज्य, देश में करें. हम इसलिए नहीं करते कि हम ज्यादा मॉडर्न दिखने से बच जाएं बल्कि हम इसलिए करते हैं कि यह हमारी आस्था है. यह हमारा पर्व है. ठीक वैसे ही जैसे बाकी लोगों के लिए कुछ दिनों पहले दीवाली रहा.
  • और आपने जहां तक घाट को लेकर जातिवाद की बात कही (जातिगत भेदभाव घाटों पर भी रहता है. तमाम दावों के बावजूद सच यही है कि जातिगत श्रेष्ठता घाटों की पोजीशन को लेकर दिखती है. जो अच्छे घाट होते हैं, वो ताकतवर सवर्णों के पास जाते हैं. जो दूर के होते हैं, वो तथाकथित पिछड़ी जातियों के पास.) तो आप एक बार बिहार आईये, छठ के कुछ दिन पहले ही. क्योंकि घाट बनाने का काम कुछ दिन पहले से ही सुरु हो जाता है, आपको मैं दिखाऊंगा की बड़ी जात के लोगों के घाटों के बीच कैसे एक छोटे जात का समुदाय भी छठ का घाट बना रहा है. यह एक ऐसा एकमात्र पर्व है जिसमें न कोई अमीर, न गरीब न पंडित न चमार होता है. इस पर्व में उपयोग होने होने वाले सुप से लेकर ऊख तक आपको घाट पर सबके समान दिखेंगे. एक ही पानी मे सभी नहाते, कुल्ला करते मिलेंगे.

 

  • एक बात याद आ गयी, अभी पिछले साल की बात है मेरे घर छूतीका पड़ा था, इसलिए घर में छठ नहीं हो पाया, छठ के सुबह वाले अर्ध्य के दिन मैं घाट पर था, हम गावँ के लड़कों ने ही टेंट, लाइट, साउंड का व्यवस्था का काम देखा था, अर्ध्य खत्म हुआ. हवन के बाद घाट पर एक सिस्टम होता है कि सभी छठ करने वाले लोग जाते समय कमिटी को प्रसाद दे कर जाते हैं. एक बड़ा सा बर्तन रखा जाता है और जाने वाले लोग जो बन पड़ता है वो उसमें दे जाते हैं. कमिटी में लगभग 30 से 35 लड़के होते हैं. और सभी जाति के. हम सभी वहां उस प्रसाद को खूब एन्जॉय करते हैं. हम ये नहीं देखते की इसमें मुसहर, चमार, राजपूत, पंडित.. आदि किस बिरादरी के हाथ से प्रसाद मिला है ।

 

  • आपके लेख में  लड़कियों, महिलाओं को बहुत बढ़िया से टारगेट किया गया है. कहा गया है कि बिहार की लड़कियां, महिलाएं घर से बाहर साल भर में सिर्फ एक दिन ही निकलती हैं. छठ के दिन. जी नहीं गलत है. बिहार की महिलाएं और लड़कियां अब रोज बाहर निकलती हैं. शौच के लिए नहीं बल्कि स्कूल, कॉलेज जाने के लिए, काम पर जाने के लिए. समाज से जुड़ने के लिए बिहार के लड़कियों और महिलाओं का उदाहरण आपको इस लिंक (क्लिक करें) पर मिल जाएगा. 

 

आखिरी एक तरफा संवाद..

वैसे कहना तो बहुत कुछ रह गया है, मगर हमें आशा है आप इतने के बाद भी समझ सकते हैं

हम बिहारी लोग हैं. पिछड़े नहीं बल्कि शुरू से बढ़ रहे लोग हैं. हमारे शहर,गावँ,संस्कृति और लोग,हमें यही पसंद आते हैं. हमारी लाइफस्टाइल दिल्ली, बम्बई जैसी तो नहीं मगर हाँ हम आज भी माँ-बाप  और सभी बड़ों को पैर छू कर ही प्रणाम करते हैं, क्योंकि हम बिहारी लोग हैं. हम कभी किसी की आलोचना नहीं करते क्योंकि हम बिहारी लोग हैं.
हमारी शक्ल पर काश की लिखा होता कि ये बाँदा बिहारी है तो आपके आस पास ही आपके दिल्ली वालों को धूल चाटाता एक बिहारी मिल जाता और आप आसानी से पहचान जाते की ये बिहारी लोग हैं. जी हां हम बिहारी लोग हैं। 

आपका एक पाठक और Yesimbihari.in पर लेखक के रूप में इस वेबसाइट का संस्थापक राजकुमार पाण्डेय 

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