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जन्मदिन विशेष: भारत के इस पीएम ने दहेज में लिया था चरखा

2 अक्टूबर को गांधी जी के साथ लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन होता है, जिनके इस्तीफे की आज भी मिसाल दी जाती है.

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बचपन में फुटपाथ पर मिलने वाली राष्ट्रीय गीतों की एक किताब में एक कविता पढ़ी थी. लेखक का नाम तो याद नहीं आ रहा पर कविता की कुछ शुरुआती लाइनें आज भी याद हैं. शायद याद रहने की वजह ये है कि यह 2 अक्टूबर पर लिखी थी. उस किताब में 15 अगस्त और 26 जनवरी को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय पर्वों पर तो कई कविताएं और गीत थे पर 2 अक्टूबर पर कविता होना मेरे लिए तब और आज भी आश्चर्य का विषय है. इस कविता की पंक्तियां कुछ यूं थीं:

आज का दिन है 2 अक्टूबर, आज का दिन है बड़ा महान

आज के दिन दो फूल खिले थे, जिनसे महका हिंदुस्तान

एक का नारा अमन, एक का नारा जय जवान, जय किसान

2 अक्टूबर सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही नहीं बल्कि भारत के दूसरे प्रधानमंत्री  लाल बहादुर शास्त्री    का भी जन्मदिन है. महात्मा गांधी का व्यक्तित्व इतना बड़ा है हममें से अधिकतर लोग 2 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री जैसे बड़े शख्सियत पर बहुत कम ही बात कर पाते हैं. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर शायद ही उनके नाम से किसी योजना या अभियान की घोषणा की गई हो.

खैर जो भी हो लाल बहादुर शास्त्री के सार्वजनिक, राजनीतिक और निजी जीवन से जुड़ी कई घटनाओं की आज भी मिसाल दी जाती है. लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी ही किंवदंतियों और सच्ची घटनाओं के बारे में आपको इस लेख में बताते हैं.

जब लाल बहादुर शास्त्री ने तैरकर पार की थी नदी

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था. उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे. जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था. इस वजह से बचपन से ही लाल बहादुर शास्त्री को काफी गरीबी का सामना करना पड़ा. किंवदंती है कि पैसे नहीं होने की वजह से लाल बहादुर शास्त्री तैरकर नदी पार कर स्कूल जाया करते थे. लेकिन तथ्य यह है कि स्कूल जाने के लिए उन्होंने नदी पार नहीं की थी. हालांकि यह भी एक तथ्य है कि एक बार पैसे नहीं होने की वजह से लाल बहादुर शास्त्री ने नदी तैरकर पार किया था. यह वाकया कुछ यूं है.

एकबार बचपन में दोस्तों के साथ शास्त्री जी गंगा नदी के पार मेला देखने गए थे. शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो उन्होंने नाव के किराए के लिए जेब में हाथ डाला. जेब में एक पाई भी नहीं थी. वे वहीं रुक गए. उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि वह थोड़ी देर और मेला देखेंगे.

दरअसल वे नहीं चाहते थे कि उन्हें अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े. उसका स्वाभिमान उन्हें इसकी अनुमति नहीं दे रहा था. उनके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए. जब उनकी नाव चली गई तब शास्त्री जी ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गए. उस समय नदी उफान पर थी. बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था. पास खड़े मल्लाहों ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की.

उन्होंने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगे. रास्ते में एक नाव वाले ने उन्हें अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वे रुके नहीं. कुछ देर बाद वह सुरक्षित दूसरी ओर पहुंच गए.

यह बात सही है कि उन्हें पैसे नहीं होने की वजह से स्कूल जाने में दिक्कत होती थी. उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त कर सकें. वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे, यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था.

जब माली ने कहा अधिक जिम्मेदारी होती है बिन बाप के बच्चे की

इसी तरह बचपन में शास्त्री जी एक बार खेल-खेल में एक माली के बाग और बच्चों के साथ फूल तोड़ने गए थे. इस दौरान माली ने बच्चों को देख लिया. 6 साल की उम्र के होने की वजह से वे पकड़े गए और माली ने उन्हें पीट दिया. शास्त्री जी ने माली से कहा कि मैं बिना बाप का बच्चा हूं इसलिए मुझे पीट रहे हो. इस पर माली ने कहा कि पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है.

शास्त्री जी ने इसके बाद जीवन भर अपनी जिम्मेदारियों को उठाया. ललिता शास्त्री के साथ अपनी शादी में उन्होंने दहेज के रूप में सिर्फ एक चरखा और खादी के कुछ कपड़े ही लेना स्वीकार किया था.

शास्त्री जी जाति-प्रथा के खिलाफ थे. इस वजह से उन्होंने कभी भी अपनी जाति के सरनेम को अपने नाम में नहीं लगाया. उनके नाम के साथ लगा ‘शास्त्री ‘ उन्हेंफ काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है.

शास्त्री जी अपनी कार्यक्षमता और समर्पण के बल पर जल्दी ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेताओं में से एक बन गए. जब भारत आजाद हुआ तो कांग्रेस पार्टी ने उन्हें कई जिम्मेदारियां दीं. वे 1951 में उत्तर प्रदेश से नई दिल्ली आ गए और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृह मंत्री और नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे.

आज भी है नजीर शास्त्री जी का इस्तीफा

एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. देश और संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी और उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी.

रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा, ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने और नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूं. यद्यपि शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं.’

आज भी किसी भयंकर रेल हादसे या किसी अन्य हादसे के होने के बाद जिम्मेवारी लेने की बात आती है तो लाल बहादुर शास्त्री की एक बार जरूर याद आती है.

लाल बहादुर शास्त्री, के कामराज और जवाहरलाल नेहरू (तस्वीर : विकीकॉमन )

पीएम होकर भी पहने फटे कपड़े और रद्द किया बेटे का प्रमोशन

प्रधानमंत्री होने के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री ने कभी प्रधानमंत्री को दी गई सरकारी गाड़ी का उपयोग अपने निजी काम के लिए नहीं किया. एक बार उनके बेटे ने गाड़ी का उपयोग कर लिया था तो शास्त्री जी ने इसे आधिकारिक रूप ने नोट करवाया और गाड़ी के उपयोग से होने वाले खर्च को जोड़कर उतना पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाया. निजी आवागमन में दिक्कत होने के बाद पत्नी के बहुत जोर देने पर लोन लेकर एक कार खरीदी थी.

इसी तरह प्रधानमंत्री होने के बावजूद उनके घर में उनकी पत्नी की मदद के लिए कोई घरेलू नौकर नहीं था. शास्त्री जी और उनके परिवार के लोग खाना बनाने से लेकर अपने कपड़े धोने का काम खुद किया करते थे.

इसी तरह पीएम रहते हुए जब उन्हें पता चला कि उनके बेटे का गलत तरीके से प्रमोशन किया गया है तो उसे उन्होंने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए

इसी तरह की एक घटना और है. शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री होते हुए अपने फटे कुर्ते पत्नी से पहनने को मांगे और कहा कि ऊपर से कोट डाल लेने के बाद यह दिखेगा भी नहीं.

इसी तरह यह भी कहा जाता है कि जब शास्त्री जी 1965 के युद्ध में जीत के बाद समझौते के लिए ताशकंद जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनका कोट फटा था. उनके पास नया कोट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और स्वाभिमानी होने की वजह से वे किसी से पैसे मांग भी नहीं सकते थे. कहा जाता है कि उन्होंने फटे कोट को रफू करवाया और वही कोट पहनकर ताशकंद में उन्होंने दुनिया के बड़े नेताओं के साथ बैठक की.

लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी एक पहेली है. 2009 में केंद्र सरकार ने इस संबंध में किए एक आरटीआई के जवाब में कहा कि अगर शास्त्री जी की मौत से जुड़ी घटनाओं को सार्वजनिक कर दिया जाए तो भारत के कई अंतरराष्ट्रीय संबंध खराब हो जाएंगे.

बहरहाल जिस तरह की नजीर लाल बहादुर शास्त्री ने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में पेश की है वह आज के राजनेताओं में ही नहीं उस वक्त के राजनेताओं में भी मिलना मुश्किल है.

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