THE BIHARI

जन्मदिन स्पेशल: राजेंद्र बाबु जो बारह सालों तक देश के राष्ट्रपति रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं

Get Rs. 40 on Sign up

वो बारह सालों तक देश के राष्ट्रपति रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं. देश के पहले राष्ट्रपति. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद. 1884 में बिहार के सीवान में पैदा हुए थे. 28 फरवरी को उनकी मौत हुई थी. साल था 1963. राजेन्द्र बाबू महात्मा गांधी के फ़ॉलोवर रहे. अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे. अपनी सैलरी का पचास फीसदी हिस्सा ही लेते थे. तब राष्ट्रपति की सैलरी 10,000 हुआ करती थी. कार्यकाल के आखिर में उन्होंने 25 प्रतिशत सैलरी ही लेनी शुरू कर दी थी. कोई भी गिफ्ट नहीं लेते थे.

उन्होंने अपनी बचत के पैसों से एक कार खरीदी थी. लोगों ने कहा कि इनके पास इतना पैसा कहां से आ गया. इसकी वजह से उन्होंने अपनी कार वापस कर दी.

राजेन्द्र बाबू पढ़ाई-लिखाई में उस्ताद थे. 1915 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के एडमिशन में पहली रैंक थी, इस वजह से उन्हें हर महीने 30 रूपए की स्कॉलरशिप भी मिलती थी. वहां के एक एग्जाम में टीचर ने उनकी कॉपी में लिख दिया था, ”Examinee is better than examiner”. इसके बाद उन्होंने इकनॉमिक्स में मास्टर्स किया. मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में इंग्लिश के प्रोफ़ेसर रहे. इसके बाद कलकत्ता सिटी कॉलेज में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर रहे. बाद में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उन्होंने लॉ में डॉक्टरेट किया. वकालत की प्रैक्टिस शुरू की और बिहार और उड़ीसा में हाईकोर्ट भी ज्वाइन किया.

बचपन की पढ़ाई के किस्से को उन्होंने अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह दर्ज किया है-

मौलवी साहब कभी अपनी चारपाई पर और कभी तख़्तपोश पर बैठकर हम लोगों को पढ़ाया करते. सवेरे आकर पहले का पढ़ा हुआ सबक एक बार आमोख्ता करना पड़ता और जो जितना जल्द आमोख्ता कर लेता उसको उतन ही जल्द नया सबक पढ़ा दिया जाता. मैं अक्सर अपने दोनों साथियों से पहले मकतब में पहुँच जाता और आमोखता भी पहले ख़तम करके सबक भी पहले पढ़ लिया करता.यह करते सूर्योदय होकर कुछ दिन भी निकल आता.

दोपहर को नहाने-खाने के लिए एक-देश घंटे की छुट्टी मिलती और खाकर फिर मकतब में ही उसी तख्तपोश पर सोना पड़ता. मौलवी साहब चारपाई पर सोते. हम लोगों को अक्सर नींद नहीं आती और तख्तपोश पर लेटे-लेटे शतरंज खेलते और जब मौलवी साहब के जागने का वक्त होता उसके पहले ही गोटियों को उठाकर रख देते. उसी ज़माने में कभी शतरंज खेलना आ गया, पर उसका पता नहीं कब, कैसे और किससे सीखा. फिर सेपहर (दोपहर के बाद का वक्त) को दूसरा सबक मिलता और उको कुछ हद तक याद करके सुनाने के बाद घंटा-डेढ़-घंटा दिन रहते खेलने के लिए छुट्टी मिलती. इसी समय गेंद, चिक्का आदि खेल खेले जाते.

1905 में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी ज्वाइन की. हालांकि, इसे ज्वाइन करने से पहले वो काफी असमंजस में थे. इसके लिए उन्होंने अपने बड़े भाई को भोजपुरी में ख़त लिखा. उनके भाई ये ख़त पढ़कर रोने लगे थे.

प्रसाद ने 1906 में बिहारी स्टूडेंट्स कांफ्रेंस का आयोजन करवाया. 1913 में बिहार छात्र सम्मलेन के अध्यक्ष चुने गए. 1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के मुख्य नेता रहे.

1934 में बिहार के भूकंप और बाढ़ के दौरान उन्होंने रिलीफ फंड में जमा करवाने के लिए 38 लाख रूपए जुटाए. भारत छोड़ो आन्दोलन के लिए कई बार जेल गए. आन्दोलन के लिए भी पैसे जमा करने के लिए वो देश के कई हिस्सों में घूमते रहे. अपनी आत्मकथा में वो इस बारे में लिखते हैं.

जीरादेई से मैं सीधे दौरे पर निकल गया. प्रायः 6-7 हफ़्तों तक दौरा करता रहा. लोगों में उत्साह बहुत था. 1942 के दमन का कुछ भी असर देखने में नहीं आता था. मालूम होता था रबर की गेंद जितनी जोर से पटकी जाती है, वह उतने ही जोर से ऊपर उठती है. वैसे ही दमन के कारण लोगों का जोश और भी ज्यादा हो गया है. सभाओं में रुपयों की वर्षां होती. जो कुछ थैली के लिए लोग जमा करके पहले से रखते उसके अलावा सभाओं में भी अच्छी रकम जमा हो जाती.

दौरा बहुत सख्त था, क्योंकि बहुत स्थानों में जाना था और सभी जगहों में भाषण करना पड़ता था. यद्यपि तबियत ठीक हो गई थी, लेकिन कमजोरी अभी काफी थी. भाषणों में, लोगों का उत्साह बढ़ाने के अलावा, आनेवाले चुनावों के सम्बन्ध में भी मैं कुछ कह देता और फिर रुपयों के लिए अपील करता.जितना ‘कोटा’ निश्चित था उससे कम किसी जिले ने नहीं दिया. सूबे के अन्दर ही पांच लाख रुपए आ गए. बाहर मांगने की जरूरत न रही. अभी दौरा पूरा नहीं हुआ था और मैं थक सा गया था. दो-तीन जिले अभी बाकी थे जब कटिहार पहुँचकर मैं बहुत बीमार पड़ गया था. पटने से डॉक्टर बनर्जी बुलाए गए थे. जो जिले दौरे से वंचित रह गए थे उनका दौरा कई महीनों के बाद किसी तरह कर सका, पर वह बात न रही जो उस समय थी. उस समय का उत्साह और जोश अद्भुत था.

गांधी और सुभाष के बीच मतभेदों को सुलझाने में उनकी बड़ी भूमिका रही. त्रिपुरी अधिवेशन के बाद सुभाष चन्द्र बोस को जब कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया तब उनके विरोधी चाहते थे कि राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष चुने जाएं. लेकिन राजेन्द्र बाबू ने कहा कि अगर उनके पक्ष में बहुमत है तो उन्हें ही कांग्रेस की कमान संभालनी चाहिए. त्रिपुरी में कांग्रेस के अधिवेशन के बाद गांधी समथकों और सुभाष चन्द्र बोस के समर्थकों में काफी ख़ट-पट हो गई थी.

राजेन्द्र प्रसाद पर भी आरोप लगे कि वो सुभाष चन्द्र बोस के अध्यक्ष चुने जाने पर खुश नहीं हैं. राजेन्द्र प्रसाद ने भी माना कि वो सुभाष से बहुत सी बातों पर सहमत नहीं हैं. लेकिन कटुता जैसी कोई बात नहीं थी जैसा कि तब के अखबार दावा कर रहे थे. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उन्हें खुद पसंद नहीं थी. उन्हें इस तरह के झगड़ों से नफरत थी. इसके अलावा वो जमीन में रहकर अपने सूबे में पार्टी का काम देखना चाहते थे. उन्होंने गांधीजी से कहा कि वो अध्यक्ष नहीं बनना चाहते. लेकिन गांधीजी जी ने राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव डाला कि वो अध्यक्ष बन जाएं. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष चुन लिया गया.

अखिल भारतीय कमेटी की पहले दिन की बैठक ख़त्म होने के बाद इस बात पर पंडाल में हंगामा हो गया. गोविन्दवल्लभ पन्त और कृपलानी के साथ बुरा बर्ताव किया गया. मारपीट तक की नौबत आ गई थी. दूसरे दिन सुभाष चन्द्र बोस इस राजेन्द्र बाबू की वजह से अधिवेशन में नहीं आए और उन्होंने अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. अगले दिन जैसे ही राजेन्द्र प्रसाद बोलने के लिए खड़े हुए, सुभाष के समर्थकों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. राजेन्द्र प्रसाद चुपचाप खड़े रहे और शोरगुल के ख़त्म होने का इंतज़ार करते रहे. शोरगुल ख़त्म होने पर राजेन्द्र प्रसाद ने सभा बर्खास्त कर दी. जब वहां से जाने लगे तो कुछ लोगों ने उनको पकड़ लिया और खींचतानी करने लगे. दुसरे लोग उन्हें बचाने के लिए कूद पड़े. राजेन्द्र प्रसाद को चोट तो नहीं आई लेकिन उनके कपड़ों के बटन टूट गए. किसी तरह उन्हें गाड़ी तक पहुंचाया गया. इस बात से राजेन्द्र प्रसाद काफी आहत थे कि उन्हें बहुमत के विरोध के बावजूद अध्यक्ष बनाया गया है. गांधी जी के समर्थक थे इसलिए उनकी बात काट नहीं सके.

1962 में राष्ट्रपति पद से रिटायर होकर बिहार के सदाकत आश्रम में आ गए थे. उन्हें 1100 रूपए की पेंशन मिलती थी.

अंत में एक मजेदार बात कि राजेन्द्र बाबू को सबसे ज्यादा मलाल ये रहता था कि लोग उनके बारे में अफवाह उड़ाते थे कि वो खैनी खाते हैं, जबकि ऐसा नहीं था.

Write your Comments here

comments

Show More
रहें चौबीसो घंटे बिहार और देश दुनिया की ख़बरों से अपडेट, फेसबुक पेज जरुर लाइक करें

Related Articles

Close