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जिया और जिया : एक यात्रा कथा जो रफ्तार पकड़ने से पहले ही रास्ता भटक जाती है

जिया और जिया में कुछ चीजें जबर्दस्ती ठूंसी हुई लगती हैं तो कुछ जरूरी चीजों को हम ढूंढ़ते ही रह जाते हैं

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‘जिया और जिया’ का कॉन्सेप्ट एकदम नया न होते हुए भी लुभाने वाला था. यह दो लड़कियों की यात्रा-कथा है. पुरुषों को लेकर बनाई गई यात्रा-कथाएं आमतौर पर किरदारों की उस तलाश पर खत्म होती हैं जहां उन्हें अपने होने की सार्थकता या जिंदगी के नए मायने मिल जाते हैं. जिया और जिया को भी इसी राह पर जाना था लेकिन यह इतना भटकती है कि खुद के लिए दर्शन खोज पाना तो दूर दर्शनीय भी नहीं रह जाती.

रेटिंग- ★★☆☆☆
परदे पर : 27 अक्टूबर
डायरेकटर : हॉवर्ड रोजमेयर
संगीत :
कलाकार : ऋचा चड्ढा, कल्कि केक्लां, अर्सलान गोनी
शैली : ड्रामा

एक्टर-कोरियोग्राफर से निर्देशक बने हॉवर्ड रोजमेयर की यह फिल्म इंटरनेट पर रोज अपलोड होने वाली छिटपुट कथाओं जैसी लगती है. फिल्म में कुछ चीजें ठूंसी हुई सी हैं, जैसे – जबरदस्ती का ह्यूमर. वहीं कुछ चीजें जिनकी दरकार थी, गायब हैं, जैसे – दोनों मुख्य किरदारों के बीच की केमिस्ट्री. इसके अलावा रोजमेयर स्वीडन की खूबसूरत और अनदेखी लोकेशंस का भी अच्छे से इस्तेमाल नहीं कर पाए हैं, वरना यह बॉलीवुड के लिए नया कोर्सिका (तमाशा) साबित हो सकता था. इसके बाद रही-सही कसर खराब प्रोडक्शन क्वालिटी ने पूरी कर दी है.

जैसा कि आपको ट्रेलर से अंदाजा लग जाता है कि फिल्म एक ही नाम वाली दो लड़कियों की कहानी है. पहली जिया (ऋचा चड्ढा) खुद को एक बैंकर बताती है और पहनावे से नजर भी आती है. ये जिया थोड़ी सी अकड़ू भी लगती है क्योंकि अपनी हिचक और डरों के चलते वह खुद को बांधकर रखती है. जैसा कि आमतौर पर फिल्मों में होता है दूसरी जिया (कल्कि केक्लां) इस जिया से उलट एकदम जिंदादिल और लोगों में घुलने-मिलने वाली लड़की है और पेशे से कैफे ओनर है. बैंकर जिया को कैफे ओनर जिया के साथ अपना स्वीडन ट्रिप सिर्फ इसलिए शेयर करना है कि उसके बटुए में पर्याप्त पैसे नहीं हैं. पैसों की ये कमी दोनों जियाओं को होटल बिल से लेकर अपने मन के बोझ तक शेयर करने के मौके देती है. अपने राज़ बांटते-बांटते दोनो जिंदगी के उस राज़ तक पहुंच जाती हैं जो उनके नाम में छिपे थे – जिया. हालांकि फिल्म बस ऐसा होने का इरादा दिखाती है, इसे दिखा नहीं पाती.

अभिनय की बात करें तो दोनों मुख्य किरदार दो अलग-अलग छोरों पर जाकर अभिनय करते हैं. कल्कि केक्लां यहां हर सांस के साथ सिगरेट फूंकने और दारू गटकने वाली जंगली लड़की बनकर अति का बनावटी अभिनय करती हैं. इसके उलट ऋचा चड्ढा मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रही एक अति गंभीर महिला बनकर जरूरत से ज्यादा दबी-कुचली नजर आती हैं. फिल्म में इनके किरदारों की झड़पों से इनके बीच कोई गहरा रिश्ता पनपते दिखाया जाना चाहिए था जिसके लिए कई भावनात्मक ट्विस्ट वाले दृश्यों की दरकार थी. लेकिन 93 मिनट की इस पटकथा में कहीं पर भी कोई ऐसा दृश्य नजर नहीं आता जिसे भावुक करने वाला कहा जा सके.

फिल्म में जिया (कल्कि केक्लां) के अलावा एक और किरदार है जो उसके जितना ही शराब और सिगरेट का प्रेमी है. लेकिन यहां इस एकमात्र पुरुष पात्र वासु (अर्सलान गोनी) की मौजूदगी की कोई खास वजह समझ नहीं आती. क्योंकि न तो वह दोनों जियाओं की जिंदगी में ही कोई फर्क डाल पाता है और न ही रोमांस करते हुए कल्कि की आंखों में चमक जाने वाली कोई चिंगारी पैदा कर पाता है.

अगर फिल्म को एक ढंग से लिखी पटकथा और सधे निर्देशन का साथ मिलता तो इस सफर कथा में गुंजाइश थी कि जिंदगी की नई संभावनाओं की तलाश कर रही इन दोनों लड़कियों के साथ हम भी थोड़ी मौज-मस्ती और कुछ नये मतलब ढूंढ़ सकते थे. लेकिन अभी तो बस यही कहा जा सकता है कि ‘जिया और जिया’ का यह सफर रफ्तार पकड़ने से पहले ही राह भटक जाता है.

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