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जेपी वही युवाओं का नेता जो आलोचनाओं के बावजूद आज भी हैं लोकनायक

जेपी का कहना था कि ‘मेरी रुचि सत्ता के कब्जे में नहीं , बल्कि लोगों द्वारा सत्ता के नियंत्रण में है’

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कुछ लोग अलग ही मिट्टी के बने होते हैं. भले ही कई बार आप उनसे वैचारिक रूप से असहमत हो लेकिन देश और समाज में बदलाव लाने की उनकी जीवटता को देखकर उन्हें सलाम करने का मन करता है. लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक ऐसे ही शख्सियत थे. हममें से अधिकतर लोगों के दिमाग में जयप्रकाश नारायण का नाम सुनते ही 1975 का आपातकाल और संपूर्ण क्रांति का ख्याल आता है.

इसमें कोई शक नहीं कि जेपी आंदोलन ने अपने वक्त में युवाओं के दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला था. देश के कई बड़े राजनीतिज्ञ इसी आंदोलन की उपज रहे हैं. यह अलग बात है कि जेपी के सिद्धांतों से वे आज काफी दूर खड़े नजर आते हैं. जेपी का कहना था कि ‘मेरी रुचि सत्ता के कब्जे में नहीं , बल्कि लोगों द्वारा सत्ता के नियंत्रण में है.’

पूंजीवाद के गढ़ में बने मार्क्सवादी

1921 के असहयोग आंदोलन से जेपी के राजनीतिक आंदोलनों में सक्रियता की शुरुआत हुई थी. 1920 में जेपी की शादी प्रभावती देवी से हुई थी. तब जेपी महज 18 साल के थे और प्रभावती की उम्र 14 साल की थी. जेपी अपने शुरुआती और बाद के जीवन में भले ही गांधीवाद से प्रभावित रहे लेकिन गांधी जी के कई सिद्धांतों से उनकी असहमति थी. इसमें एक सिद्धांत ‘ब्रह्मचर्य’ का भी था जिससे जेपी की असहमति थी. लेकिन यह भी कहा जाता है कि जेपी ने कसम खाई थी कि वे गुलाम भारत में कोई संतान पैदा नहीं करेंगे.

इसके बाद जयप्रकाश नारायण अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने चले गए. वहां उन्होंने कई जगह काम करके अपनी पढ़ाई के पैसे जुटाए थे. पूंजीवाद का गढ़ माने जाने वाले अमेरिका में जेपी मार्क्स के विचारों से प्रभावित हुए और 1929 में एक मार्क्सवादी के रूप में भारत लौटे.

हालांकि, भारत लौटने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए और महात्मा गांधी उनके गुरु बने रहे. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे दौर के दौरान 1932 में जेल गए. जेल में ही उनकी मुलाकात समाजवादी विचारधारा से प्रभावित अन्य राष्ट्रीय नेताओं से हुई. इसके बाद ही 1934 में कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण हुआ. इसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव बने और जयप्रकाश नारायण महासचिव बने.

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेज सरकार ने अन्य नेताओं के साथ उन्हें भी जेल में डाल दिया था. अपने साथियों के साथ जेपी हजारीबाग जेल में बंद थे. लेकिन जल्द ही वे अपने साथियों के साथ हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर नेपाल चले गए और भारत की आजादी की लड़ाई को तेज करने का प्रयास किया. वे फिर से पकड़े गए और भारत को आजादी मिलने से ठीक पहले 1946 में जेल से छूटे.

ग्राम स्वराज के लिए किया जीवनदान

भारत की आजादी के वक्त सोशलिस्ट पार्टी काफी बिखर गई थी. जेपी ने सभी धड़ों में एकता करवाने की काफी कोशिश की. कई बार उनके प्रयास सफल भी हुए लेकिन समाजवादी नेताओं के आपसी मतभेदों को देखते हुए उनका सक्रिय राजनीति से मोहभंग होने शुरू हो गया था.

ठीक इसी वक्त विनोबा भावे ने गांधीवादी तरीके से भूमिसुधार के लिए भूदान आंदोलन शुरू किया था और गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा को स्थापित करने के लिए ‘सर्वोदय’ का नारा दिया. जेपी विनोबा भावे के ‘सर्वोदय आंदोलन’ से काफी प्रभावित हुए और 1954 में उन्होंने अपना जीवन सर्वोदय आंदोलन के लिए समर्पित करने की घोषणा की. 1957 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की भी घोषणा की.

जेपी के राजनीतिक और वैचारिक सफर के बारे में इसलिए इतने विस्तार से जिक्र किया जा रहा है क्योंकि जेपी किसी एक जगह ठहर जाने वाले व्यक्ति नहीं थे. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि जेपी की रुचि सत्ता पर कब्जे में नहीं थी और वे हमेशा सत्ता पर जनता का नियंत्रण चाहते थे. यही वजह थी कि उन्हें तानाशाही पसंद नहीं थी.

बेहतर राजनीति ही है बदलाव का रास्ता

जनता की मुक्ति के लिए वे राजनीति को जरूरी समझते थे. उनका कहना था कि ‘अगर आप सचमुच स्वतंत्रता , स्वाधीनता की परवाह करते हैं , तो बिना राजनीति के कोई लोकतंत्र या उदार संस्था नहीं हो सकती. राजनीति के रोग का सही मारक और अधिक और बेहतर राजनीति ही हो सकती है. राजनीति का विरोध नहीं.’

यही वजह रही कि देश में आजादी के बावजूद जब उन्होंने देखा कि गरीबी और बेकारी बनी हुई है तो वे फिर से राजनीति में कूद पड़े. जेपी के राजनीति में दुबारा कूदने की एक वजह नक्सलवादी आंदोलन का फैलता प्रभाव भी था. जेपी सर्वोदय से इसलिए जुड़े थे कि वास्तविक जोतदारों को भूमि का अधिकार मिले.

नक्सलवादी आंदोलन भी इसी अधिकार की मांग के साथ पैदा हुआ था. जेपी का रास्ता अहिंसक और गांधीवादी था और नक्सलियों का रास्ता सशस्त्र क्रांति का था. जेपी का मानना था कि ‘ एक हिंसक क्रांति हमेशा किसी न किसी तरह की तानाशाही लेकर आई है… क्रांति के बाद, धीरे-धीरे एक नया विशेषाधिकार प्राप्त शासकों एवं शोषकों का वर्ग खड़ा हो जाता है, लोग एक बार फिर जिसके अधीन हो जाते हैं.’

यही वजह थी कि जब बिहार के मुज्जफरपुर के मुसहरी ब्लॉक में 1968-69 के दौरान जब नक्सलियों ने 6 भूस्वामियों की हत्या कर दी तो जेपी वहां शांति बहाल करने और नक्सलवादियों का आत्मसमर्पण करवाने गए. जेपी उनकी मांगों से सहमत थे लेकिन रास्ते से नहीं. जेपी के उस वक्त के बयानों में इस द्वंद्व को समझा जा सकता है.

आलोचनाओं के बावजूद आज भी हैं लोकनायक

जेपी ने संभवतः इसी वजह से राजनीति में ना कूदने की कसम तोड़ी और फिर से सरकार के विरोध में कूद गए. जेपी ने इंदिरा की तानाशाही और आपातकाल के खिलाफ एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिसकी नजीर आज भी दी जाती है. यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि जिस विनोबा भावे के प्रभाव में जेपी ने राजनीति को छोड़ने की घोषणा की थी, उसी विनोबा भावे ने आपातकाल को ‘अनुशासन का पर्व’ कहा था.

तमाम तरह की राजनीतिक धाराओं के बीच जेपी एक बेहतर राजनीति का मॉडल रखने की कोशिश कर रहे थे. हालांकि इस वक्त जनसंघ और आरएसएस का सहयोग लेने के लिए उनकी आलोचना भी हुई थी पर जेपी उस वक्त युवाओं और छात्रों के एक बड़े तबके को अपनी ओर खींचने में सफल रहे. देश में पहली बार एक गैर-कांग्रेसी सरकार केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुई.

यह बात और है कि हर बार की तरह इस बार भी जेपी को अपने साथियों से निराशा हाथ लगी. 1977 में जनता सरकार के दौरान ही बिहार के बेलछी में दलितों का नरसंहार हुआ. जेपी उस वक्त बीमार थे लेकिन इस घटना पर उनकी चुप्पी की आज भी आलोचना होती है.

खैर जिस व्यक्ति का इतना लंबा राजनीतिक सफर रहा हो और जिसे हमेशा अपने साथियों से निराशा हासिल हुई हो, ऐसे व्यक्ति से कोई गलती या चूक नहीं हो यह संभव नहीं है. जयप्रकाश नारायण इन अर्थों में लोकनायक थे कि उन्हें सचमुच में स्वाधीनता और स्वतंत्रता की परवाह थी.

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