मनोरंजन

जो भोजपुरी फिल्म मुम्बई के बीस-बीस थियेटरों में लगती है, उसे पटना वाले एक शो तक नहीं देते

Get Rs. 40 on Sign up

धनंजय कुमार भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में पटकथा लेखक हैं और पूरी कोशिश में जुटे हैं कि भोजपुरी फिल्मों का कंटेंट बदले. इसमें सामाजिक मसले जगह पायें. मगर उनका दर्द यह है कि पटना का एलीट वर्ग भोजपुरी को अपनाने के लिए तैयार नहीं है. उनकी फिल्म सैंया सुपरस्टार जो गांव में भ्रष्टाचार के मसले पर बनी है, उसे बिहार के दूसरे जिलों में 70 से अधिक सिनेमाघरों में जगह मिली है. मुम्बई में भी 20 से अधिक हॉल में यह रिलीज हुई है. मगर पटना में उसे एक शो तक नहीं मिला. भोजपुरी फिल्मों के प्रति इसे अजीबो-गरीब रवैया को उन्हें इस आलेख में बहुत बारीकी से उजागर किया है. और साथ ही उन्होंने भोजपुरी सिनेमा के इतिहास और उसमें आ रहे बदलाव पर भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं. मौका निकाल कर जरूर पढ़िये.

धनंजय कुमार

धनंजय कुमार

यह कैसी विडम्बना है, महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में भोजपुरी फ़िल्में बीस से अधिक सिनेमाघरों में रिलीज होती हैं, लेकिन बिहार की राजधानी पटना के किसी भी सिनेमाघर में रिलीज नहीं होती ! जबकि भोजपुरी मूल रूप से बिहार की लोकभाषा है. पटना भले ही मगध में पड़ता हो और स्थानीय निवासियों की बोली मगही है, फिर भी पटना में भोजपुर का गहरा प्रभाव है. आरा पटना के बेहद करीब है और पूरे प्रदेश के भोजपुरी भाषी पटना में रहते हैं, आते-जाते रहते है. फिर जब बिहार के सिनेमा की बात करते हैं, तो बरबस भोजपुरी फिल्मों का ही ध्यान आता है. यह ठीक है मगही में दो फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं और मैथिली-अंगिका में भी कुछेक फ़िल्में बन चुकी हैं, लेकिन जिस तरह से भोजपुरी में लगातार फ़िल्में बन रही हैं, वैसी स्थिति बाकी भाषाओं के साथ नहीं है. भोजपुरी में 1962 से फ़िल्में बन रही हैं और अबतक हजार से अधिक फ़िल्में बन चुकी हैं. और दिलचस्प बात यह है कि बिहारशरीफ और मुजफ्फरपुर या सीतामढी और भागलपुर में भी भोजपुरी फ़िल्में उसी प्रेम के साथ देखी जाती है, जिस प्रेम और अपनापन से आरा, बक्सर और देवरिया में. सच यह है कि भोजपुरी फ़िल्में और भोजपुरी गीतों के अलबम पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व करती हैं.

भोजपुरी फ़िल्में अच्छी बनती हैं या बुरी, बहस के लिए अलग विषय है, लेकिन भोजपुरी फिल्मों के दर्शक हैं, इसमें कोई किन्तु परन्तु नहीं है. आज भोजपुरी फिल्मों का कुल सालाना कारोबार कम से पचास करोड़ का है. प्रियंका चोपड़ा जैसी फ़िल्मी हस्ती ने भी जब अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू की, तो भोजपुरी फिल्मों से शुरुआत की. आरा के मंगरू राम से लेकर हिन्दी सिनेमा के महान अभिनेता दिलीप कुमार ने भी भोजपुरी फ़िल्में बनाई हैं. भोजपुरी फिल्मों से ही सेलेब्रिटी बने मनोज तिवारी भाजपा के सांसद हैं और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष भी. लेकिन भोजपुरी फिल्मों को लेकर बिहार सरकार का जो नजरिया रहा है, वह बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है. हालत यह है कि बिहार की राजधानी पटना के भोजपुरी फिल्म प्रेमियों के लिए पटना में कोई सिनेमा हॉल नहीं है.

अस्सी के दशक की बात करें तो पटना में अप्सरा, एलिफिंस्टन, वीणा और रूपक, इन चार सिनेमाघरों में भोजपुरी फ़िल्में लगा करती थीं. इन सिनेमाघरों में फ़िल्में सिल्वर जुबली से लेकर गोल्डन जुबली तक हुई हैं. फिर ऐसा क्या हुआ कि आज भोजपुरी फिल्में लगाने के लिए एक भी सिनेमाघर तैयार नहीं है?

नब्बे का दशक न सिर्फ देश के लिए परिवर्तनों से भरा रहा, बल्कि भोजपुरी सिनेमा के लिए भी बदलाव की वजह रहा. ग्लोबलाइजेशन की वजह से हिन्दी फिल्मों का स्वरूप बदला, पहले की हिन्दी फिल्मों पर हिन्दी बेल्ट के समाज का प्रभुत्व था, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के बाद हिन्दी फिल्में वैश्विक दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जाने लगीं. फिल्म निर्माण में घुसी कॉरपोरेट कंपनियों और कल्चर की वजह से हिन्दी फिल्मों के सब्जेक्ट्स और संवाद हिन्दी के बजाय हिंगलिश हो गए. मॉडर्न समाज के किरदार मुख्य चरित्र के तौर पर परदे पर उभरने लगे.  लिहाजा गंवई सोच और संस्कार वाले दर्शकों का इंटरेस्ट हिन्दी फिल्मों में कम होने लगा. बड़ी बड़ी हिन्दी फिल्में बिहार में फ्लॉप होने लगी. उस पर से आग में घी का काम किया उस समय का राजनीतिक सामाजिक परिवेश. बिहार में अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ था और आम आदमी शाम 6 बजे से पहले घर आ जाना चाहता था. लिहाजा सिनेमाघरों में दर्शकों की उपस्थिति बेहद कम होती चली गईं.

बिहार के सिनेमा हॉल बंद होने के कगार पर आ गए. और ऐसे वक्त में रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसावाला’ ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारी बिजनेस किया. सिनेमाघर मालिकों को जैसे जीवनदायिनी मिल गयी. मनोज तिवारी स्टार बनकर उभरे और छोटे मोटे प्रोड्यूसर जो कि कॉर्पोरेटाइजेशन की वजह से हाशिये से भी बाहर धकेल दिए जा चुके थे, उन्हें भोजपुरी फिल्म बाजार एक सुनहरा अवसर के तौर पर दिखा.

ससुरा बड़ा पैसावाला लेबर क्लास दर्शकों को लेकर बनाई गयी फिल्म थी और इस फिल्म ने चूंकि जबरदस्त बिजनेस किया, इसलिए फिल्म निर्माताओं ने यह मैसेज आत्मसात किया कि भोजपुरी फ़िल्में मजदूर क्लास के लिए हैं और उनके लिए ही फ़िल्में बनाई जाय तो फिल्म चलेगी.

वो भोजपुरी गीतों के अलबम का भी दौर था. मनोज तिवारी की सफलता के बाद कई लड़के सिंगर के तौर पर उभरे. आज के भोजपुरी फिल्म स्टार निरहुआ, पवन सिंह, खेसारीलाल यादव, कलुआ आदि, जिनके गीत फूहड़ और वल्गर होने के बावजूद बेहद लोकप्रिय हुए. भोजपुरी फिल्म निर्माताओं को लगा सफलता पाने का आसान रास्ता है इन हिट गीतों या वैसे ही गीतों को फिल्मों में शामिल कर लेना. लिहाजा भोजपुरी फिल्मों के दर्शक भी वही रह गए. और एलीट दर्शक छंटते चले गए. और जिला मुख्यालयों के लगभग सारे सिनेमाघर भोजपुरी सिनेमा की गोद में जा गिरे. लेकिन पटना इससे अछूता रहा. सिर्फ वीणा सिनेमा घर भोजपुरी फ़िल्मों का केंद्र बना रहा.

पटना में भोजपुरी फिल्में अपना महत्व नहीं साबित कर पाईं, जिसकी वजह रही भोजपुरी फिल्मों का फूहड़ स्तर. पटना बिहार की राजधानी होने के साथ साथ युवाओं के लिए शिक्षा हासिल करने और बेहतर करियर बनाने का हब है. पूरे राज्य के एलीट और बेहतर भविष्य की चाह रखनेवाले लोग-परिवार पटना के नागरिक हैं, जिनके लिए भोजपुरी फिल्में हेय रहीं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पटना में लेबर क्लास नहीं है. पूरे राज्य के कम पढ़े लिखे और लेबर भी पटना आते हैं, लेकिन उनके लिए कोई सिनेमा घर नहीं है. वीणा था जो अब बंद हो चुका है. इसकी वजह क्या है? क्या पटना के लेबर क्लास फिल्में नहीं देखते ?

सच्चाई कुछ और है. बिहार के सिनेमाघरों में लंबे समय से मनोरंजन कर वसूलने का कंपाउंडिंग सिस्टम लागू है. यानी जितनी सीटें उस आधार पर टैक्स निर्धारित है. अब भोजपुरी फिल्मों के साथ दिक्कत यह है कि उसके टिकटों के दाम हिन्दी फिल्मों की तरह सौ- दो सौ रुपये रखे नहीं जा सकते. ऐसे में जाहिर है कि भोजपुरी फिल्में लगाना इन सिनेमाघरों के लिए फायदे का सौदा नहीं है.

बिहार सरकार के कला संस्कृति मंत्रालय को सिनेमा से कोई लेना-देना नहीं है. उसके लिए कला और संस्कृति का मतलब नाटक और नृत्य संगीत है, जिसके प्रोग्राम करवाकर वह अपना दायित्व निभा लिया समझ लेता है. फ़िल्में अब भी उसके लिए कु-संस्कृति फैलानेवाला है. फिल्मों के फूहड़ गीतकार कला संस्कृति मंत्रालय के योग्य लगते हैं, लेकिन फिल्मों के लिए कुछ बेहतर किया जाय, ऐसा सरकार के मन में आता नहीं. इसलिए महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्य जहां अपनी लोकबोली की फिल्मों के उत्थान के लिए कई तरह की योजनायें चलाती हैं, बिहार सरकार वैसा कुछ सोचती भी नहीं. यह बिहार के राजनेताओं की समझ पर भी सवाल है.

बिहार सरकार चाहे तो भोजपुरी फिल्मों का स्तर बदल सकता है. पटना के सिनेमाघर भी भोजपुरी फ़िल्में लगा सकते हैं और भोजपुरी फिल्में मराठी फिल्मों की तरह ऑस्कर में भी भारत को रिप्रजेंट कर सकती है.

Write your Comments here

comments

Show More
रहें चौबीसो घंटे बिहार और देश दुनिया की ख़बरों से अपडेट, फेसबुक पेज जरुर लाइक करें

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close