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तो क्या अन्ना अब दीघा के कब्जाधारियों के लिए भी सत्याग्रह करेंगे?

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खबर है कि अन्ना हजारे एक-दो दिन में पटना आने वाले हैं और खबर यह भी है कि उनके लोकल सपोर्टरों का एक धड़ा उन्हें राजीव नगर-दीघा के उन कब्जाधारियों की लड़ाई को नेतृत्व देने के लिए उकसा रहा है, जो कई सालों से आवास बोर्ड की जमीन पर कब्जा जमाकर बैठे थे. और जब सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश पर उस जमीन को कब्जामुक्त कराया तो उनलोगों ने संगठन बनाकर वापस उस जमीन पर कब्जा मांगना शुरू कर दिया है. कहा जा रहा है, अन्ना उस लड़ाई को नेतृत्व देने के लिए लगभग तैयार ही हैं. हालांकि पटना के उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें आगाह कराया है कि वे इस गलत लड़ाई में भागीदारी न करें. क्योंकि इससे उनकी ही छवि धूमिल होगी. पर अन्ना इस बात से कितने सहमत होते हैं और अपने फैसले पर कितना पुनर्विचार करते हैं, यह कहना मुश्किल है.

दरअसल अन्ना इनदिनों उस दूसरे सत्याग्रह की तैयारी में पूरे देश की यात्रा पर हैं, जो अगले साल 23 मार्च से प्रस्तावित है. इस दौरान उनका पटना आना भी तय है. वैसे तो वे 17 की शाम को ही पटना पहुंचने वाले थे और 19 दिसंबर को यहां आंदोलन करने वाले थे. मगर किसी वजह से उनकी यह यात्रा आगे बढ़ गयी है. कहा जा रहा है कि उनके स्थानीय समर्थकों का एक बड़ा धड़ा उनकी सभा दीघा में करवाना चाहता है, ताकि वहां दीघा-राजीवनगर कब्जाधारियों की भीड़ जुटा कर अन्ना से उनके पक्ष में आवाज उठवाई जा सके और इस आंदोलन को अन्ना का नैतिक समर्थक मिल सके. बताया जा रहा है कि स्थानीय स्थितियों से अनभिज्ञ अन्ना इस बात के लिए सहमत भी हैं. उन्हें समझा-बुझा लिया गया है कि इन आंदोलनकारियों की मांगें जायज हैं. उन्हें अंधेरे में रखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का इस मसले पर कड़ा रुख है. और पुलिस थाने में पैसे देकर बड़े-बड़े लोगों ने सरकारी जमीन पर कब्जा जमाया था.

इस बीच जब अन्ना के कुछ स्थानीय शुभचिंतकों को इस मामले की जानकारी मिली तो उन्होंने अन्ना को सलाह दी है कि वे इस आंदोलन से दूर रहें. क्योंकि इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले अन्ना की छवि ही धूमिल होगी. क्योंकि दीघा के कब्जाधारी भी एक तरह से भ्रष्टाचारी ही हैं. उन्होंने पुलिस को चढ़ावा देकर अनैतिक रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा किया था. यह जमीन उनके हक की नहीं है. उन लोगों ने अन्ना को सलाह दी कि अगर बिहार में आंदोलन करना है तो बाढ़ पीड़ितों के पक्ष में खड़े हों. जिन्हें अब तक न ठीक से मुआवजा बंटा है, न फसल क्षतिपूर्ति. इस मद की तकरीबन 2.5 हजार करोड़ की राशि सरकारी खजाने में पड़ी है, मगर पीड़ितों को मुआवजा नहीं बांटा जा रहा.

मगर अन्ना के ये शुभचिंतक आश्वस्त नहीं हैं कि अन्ना उनकी बात मान ही लेंगे. उनका कहना है कि अन्ना अभी भी दीघा आंदोलनकारियों के पक्ष में ही नजर आ रहे हैं. वैसे तो उन्हें 17 की शाम को ही यहां पहुंचना था, मगर यह यात्रा एक-दो दिन लेट हो गयी है. अब देखना है कि अन्ना कब्जाधारियों के पक्ष में आवाज उठाते हैं या बाढ़ पीड़ितों के हक में. इन दिनों बार-बार कहा जा रहा है कि अन्ना लगातार गलत लोगों से घिर गये हैं. इस प्रकरण से भी यह बात और सही साबित हो रही है.

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