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VIDEO: नेत्रहीन होने के बावजूद 10 साल के ये बच्चा किसी भी तारीख का दिन सेकेंड भर में बता देता है

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नाम प्रत्युष, उम्र महज दस साल लेकिन बुद्धिलब्धता यानि आईक्यू और ज्ञान ऐसा कि लोग इन्हें कैलेंडर ब्वॉय के नाम से जानते हैं. जी हां प्रत्युष को ये नाम उनकी खूबी के कारण उन्हें औरों से अलग करती है और उन्हें कैलेंडर ब्वॉय का नाम देती है.

नेत्रहीन होने के बावजूद 10 साल के ये बच्चा सेकेंड भर में भूत से लेकर भविष्य तक के किसी भी तारीख का दिन सेकेंड भर में बता देता है. यानि आप प्रत्युष से 1 मार्च 1912 को कौन सा दिन हैं पूछें या फिर 15 अगस्त 2065 को कौन सा दिन होगा प्रत्युष आपको उस तारीख का दिन चंद सेकेंड में बता देगा.

 

मूल रूप से जहानाबाद जिले के टेहटा गांव के निवासी नंद किशोर गिरी जब अपने इस बच्चे को हमारे पास ले कर आये तो हमें भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि प्रत्युष कैलकुलेशन यानि गणना का मास्टर होगा.

10 साल की उम्र में जब बच्चे आम तौर पर खेलने में ज्यादा वक्त बिताते हैं. नेत्रहीन होने के बावजूद प्रत्युष दिमागी कसरत करते हैं यानि चेस खेलते हैं. उन्हें इस खेल को खेलना बपचन से ही पसंद है और इस खेल को खेलने में उनकी मदद करती है नेत्रहीनों के लिये बनी ब्रेल लिपी.

घूम-घूम कर फेरी का सामान बेचने वाले नन्दकिशोर गिरी के बेटे ने बताया कि मुझे प्रत्युष की इस प्रतिभा का पता तब चला जब मैं उसे दिल्ली स्थित उसके स्कूल छोड़ने गया था. नंदकिशोर के मुताबिक जब प्रत्युष ने पूछा कि पापा आप मुझे वापस लेने कब आओगे तो उन्होंने एक तारीख बतायी.

उनके तारीख बताते ही प्रत्युष ने उस तारीख को आने वाले दिन का जिक्र किया तो उसके पिता भी सकते में रह गए. इसके बाद तो प्रत्युष इस फन यानि तारीख और दिन की गणना बिठाने में मास्टर हो गए.

4 भाई-बहनों में प्रत्युष सबसे छोटा है और चार साल की उम्र में ही उसके आंखों की रोशनी अचानक से चली गई. छोटा सा व्यवसाय कर परिवार को पालने वाले नंदकिशोर ने बेटे की आंखों की रोशनी जाने पर भी हार नहीं मानी और उसका दाखिला दिल्ली के जेपीएम सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग में कराया.  प्रत्युष को पीएम नरेंद्र मोदी से भी सराहना और आर्थिक मदद मिली है. उसके पिता ने बताया कि उन्हें पीएम से 50 हजार रुपए की आर्थिक मदद मिली है.

1 अप्रैल से छठी क्लास में जाने वाले प्रत्युष से जब उनके इस कैलकुलेशन का राज पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं अपने दिमाग की मदद से इसे गणित की तरह सॉल्व करता हूं और ऐसा करने में मुझे बहुत मजा आता है. पेपर खत्म होने के बाद अपने गांव आए प्रत्युष को उनके गांव और आसपास के लोगों से खासा स्नेह मिलता है.

नेत्रहीन बेटे की इस अनोखी काबिलियत पर नंद किशोर गिरी को गर्व तो है लेकिन अपनी सरकार यानि बिहार सरकार से मदद न मिल पाने का इल्म भी है. प्रत्युष के पिता ने कई बार सरकारी मुलाजिमों से गुहार भी लगाई लेकिन कोई मदद नहीं मिल सकी.

नंदकिशोर के पिता यह चाहते हैं कि उनके बेटे की इस क्षमता पर शोध यानि रिसर्च हो. वो इसके लिये जेएनयू, बीएचयू और मगध विश्वविद्यालय के वीसी से मिल चुके हैं. बड़ा हो करा आयुष आईएएस बनना चाहते हैं. जब हमने प्रत्युष से इसका कारण पूछा तो उनका जवाब था कि मैं अगर आईएएसस बनूूंगा तभी तो अपने जैसे लोगों का दर्द और परेशानी समझ पाऊंगा और उनकी मदद कर पाऊंगा.

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