citizen updates

नैंसी झा हत्याकांड पर युवा पत्रकार ने लिखी कविता, पढ़िए

Get Rs. 40 on Sign up
पत्रकार कुमार राहुल

बिहार के मधुबनी जिले के अंधरामठ थाना क्षेत्र से 25 मई को एक बच्ची नैंसी झा का अपहरण कर लिया गया और बाद में उसके हाथों का नस काट कर व एसिड डाल कर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गयी. इस हत्याकांड की चर्चा बिहार से बाहर तक हुई और बच्चियों की सुरक्षा पर नये सिरे से सवाल उठे. इस मामले में प्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा ने भी भावुक अपील की. उन्होंने बिहार सरकार एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नैंसी को न्याय दिलाने की मांग की. इस मामले में राज्य सरकार ने संबंधित क्षेत्र के थानाध्यक्ष को सस्पैंड किया है और एक महिला आइपीएस निधि रानी के के नेतृत्व में एसआइटी गठित कर मामले की जांच सौंपी गयी है.

 

इस हत्याकांड से बिहार में लोग दुखी हैं, आहत हैं. एक युवा पत्रकार कुमार राहुल ने अपने भाव कविता की शक्ल में सामने रखा है. पढ़िए उनकी कविता :

अभी-अभी तो पिता के गले में डाली थी गलबहियां
और वे हो गये थे कचनार
आंखों में पलने लगे थे कई गीत
मां ने स्कूल जाने से पहले गाल पर लगायी थी थोरी-सी पाउडर-स्नो
बुआ की शादी में जाने से पहले अलता से रंगने थे पैर
दुलारी धीया को देखना था बुआ की मेहंदी रचे हाथ
ये तूने क्या किया सभ्यता के दुश्मन
सप्तम सुर में वह गानेवाली थी
बटगबनी और बेटी कुमार
और तूने उदासी-समदाओन भी गंवाने लायक नहीं छोड़ा
यह माना कि कमला थिर है
वह रो भी नहीं सकती, कलप सकती है, कुहर सकती है
वह मिथिला है
वह बांध दी गयी है, मार दी गयी है
पर दसक में एक बार ही सही, उत्ताल तरंगें जब टकराती है, तो बांध नहीं टिकता
इतिहास-भूगोल बदल जाता है
वह जाे एक कमला थी, कोसी थी
उसे बननी थी भरी पूरी नदी
टकराना था बालुका पिंडों से
तूने क्या किया दरिंदे
एक हंसती-बिहंसती नदी को जला डाला
उसकी तितलियों-सी खुशी
भगजोगनी भरे आकाश-सा मन
चंपा-सी महंकती हंसी
क्यों तुझे विचलित नहीं कर सके
अभी जो लिख रहे हैं देश बदलने की कथा
उन्हें नहीं पता कि परियों की कहानी सुननेवाली आंखें
कभी लाल भी हो जाती है
जो कंठ कभी पराती-बिरहा सुनाते हैं
वह कमला-कोयला भी गाते हैं
हम जो चुप हैं
हम जो किसी चीख पर भी अनसुना करते हैं
अपने खोल में दुबके रहते हैं
बैंक अकाउंट, आधार कार्ड, गैस की सब्सिडी में उलझे रहते हैं
इस चुप्पी से अब घिन भी नहीं आती दादा…
कितना चूक चुका है प्रतिरोध
कितना भोथरा हो चुका है हमारा दिल
जो मन नटुआ के लाल रंग से रंगे चेहरे को देख रो पड़ता था
आज एक फूल-सी बच्ची की लाश देख सिहरता तक नहीं
हम विलाप भी नहीं कर सकते
हम बंधे हैं एक अनाम रस्सी में
अपनी दुनिया में सिमटे हुए
सभ्य समाज का तगमा लिये घूमते हैं हम
ओ तिलयुगा!
हम अभी नहीं गा सकते सोहर
हम नहीं गा सकते झिझिया
मन कोसी-कमला हो जाना चाहता है

Write your Comments here

comments

Show More
रहें चौबीसो घंटे बिहार और देश दुनिया की ख़बरों से अपडेट, फेसबुक पेज जरुर लाइक करें

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close