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पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ कि पद्मावती का एक दिसंबर को पर्दे पर आना मुश्किल से असंभव हो गया

पद्मावती को दिखाने का प्रस्ताव जिन-जिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के सामने रखा गया उनमें से ज्यादातर इसे देखना तो चाहते थे लेकिन ऐसा करते हुए दिखना नहीं चाहते थे

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संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ सियासत का नया हथियार बनी है. अगर गुजरात में चुनाव न होते तो फिल्म अपनी तय तारीख पर रिलीज़ भी होती और इतना हंगामा भी खड़ा नहीं होता. सुनी-सुनाई है कि संजय लीला भंसाली ने पद्मावती की रिलीज टालने से पहले दिल्ली में कुछ नेताओं को अपनी फिल्म दिखाने की कोशिश की.

लेकिन मोदी सरकार का एक भी मंत्री उसे देखने के लिए तैयार ही नहीं हुआ. सूचना और प्रसारण मंत्रालय से भी संपर्क साधने की कोशिश की गई. लेकिन फिल्म देखने के लिए न तो स्मृति ईरानी तैयार हुईं और न ही उनका कोई अफसर. प्रसून जोशी के लिए भी स्पेशल स्क्रीनिंग कराने का प्रस्ताव आया, लेकिन वे भी इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहते थे. आखिरकार 5-6 वरिष्ठ संपादकों को संजय लीला भंसाली की फिल्म दिखाई गई. इन सभी लोगों के लिए अलग-अलग जगहों पर फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग की गई.

फिल्म देखने के बाद टीवी चैनल के दो संपादकों ने फिल्म की जबरदस्त तारीफ की और कहा कि रानी पद्मावती का किरदार ऐसा है जिससे राजपूत समाज को गर्व होगा. राजपूतों की आन-बान-शान को फिल्म में इस तरह दिखाया गया है जिससे राजपूत समाज का सर ऊंचा होगा. रानी पद्मावती को एक महासुंदरी के साथ साथ एक वीरांगना की तरह दर्शाया गया है. अलाउद्दीन खिलजी की तनिक भी तारीफ नहीं की गई है, उल्टे उसे एक अय्याश, कपटी और व्यभिचारी शासक के तौर पर फिल्म में दर्शाया गया है. लेकिन ये सब किसी काम नहीं आया. उल्टे प्रसून जोशी भंसाली से नाराज हो गये कि वे सेंसर सर्टिफिकेट मिलने से पहले लोगों को फिल्म क्यों दिखा रहे हैं. सुनी-सुनाई है कि इसके बाद संजय लीला भंसाली और फिल्म से जुड़े अन्य लोगों को गैरसरकारी माध्यमों से बता दिया गया कि गुजरात चुनाव के बाद ही फिल्म सिनेमा के पर्दे पर दिखाई जा सकती है. राज्य सरकारें और केंद्र सरकार दोनों ही चुनाव से पहले ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहतीं.

गुजरात में ठाकुर-क्षत्रिय समाज के वोटों की तादाद बहुत ज्यादा है. शंकर सिंह वाघेला भी इस फिल्म को रोकने की मांग कर चुके हैं. वाघेला की पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा यही बन गया है. केंद्र में भी जितने राजपूत मंत्री हैं वे सब फिल्म को फिलहाल दिखाने के पक्ष में भी नहीं हैं और इतने ज्यादा पशोपेश में है कि उसे देखते हुए भी दिखना तक नहीं चाहते. एक वरिष्ठ मंत्री के पास उनके घर पर फिल्म दिखाने का प्रस्ताव भेजा गया तो उन्होंने साफ कहा कि हो सकता है फिल्म बहुत अच्छी बनाई गई हो, लेकिन इस चुनावी मौसम में फिल्म देखना भी मुनासिब नहीं है. पब्लिक कुछ और समझ बैठेगी और बेवजह पुतले जलने लगेंगे. इस फिल्म से दूरी बनाने की रेस को इस बात से भी समझा जा सकता है कि फिल्म की रिलीज टलने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान जैसे भाजपा के अपेक्षाकृत उदारवादी नेताओं तक के वक्तव्य इस पर लगातार आये जा रहे हैं.

जब सेंसर बोर्ड ने भी फिल्म को तकनीकी आधार पर वापस कर दिया तो इसका रिलीज होना और भी मुश्किल हो गया. मुंबई के एक फिल्म पत्रकार के मुताबिक इसके बाद हर हालत में पद्मावती को रिलीज करने की इच्छा रखने वाले संजय लाली भंसाली बड़ी मुश्किल में फंस गए. जब उन्होंने फिल्म की रिलीज़ की तारीख तय की थी तब गुजरात चुनाव का जिक्र तक नहीं था. पद्मावती बड़े बजट की फिल्म है, इसलिए उसके लिए बड़े-बड़े मल्टीप्लेक्सों ने अपने सभी स्क्रीन्स बुक कर दिए थे. अब जब ये फिल्म कम से कम एक महीने के बाद रिलीज होगी तो फिर से इस पूरी प्रक्रिया को दोहराना होगा. दोबारा थियेटर अपने स्क्रीन्स बुक करेंगे और ऐसे में कई जानकारों का मानना है कि फिल्म पर असर पड़ सकता है. हालांकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि इस हो-हल्ले से नुकसान होने के बजाय फिल्म को फायदा ही होने जा रहा है. अपनी बात के समर्थन में ये लोग उड़ता पंजाब का उदाहरण देते हैं जिसका पंजाब चुनाव से पहले काफी विरोध किया गया था और जो बाद में कई जानकारों की उम्मीदों से ज्यादा चली थी.

जहां तक प्रदर्शन करने वाले कर्णी सेना जैसे संगठनों का सवाल है. कहा जाता है कि उनके कर्ताधर्ता भी फिल्म देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें फिल्म दिखाने का मतलब होता उनसे सर्टिफिकेट लेना. दूसरा, देखने के बाद भी वे क्या करेंगे इसके बारे में सोच पाना आसान नहीं था. भंसाली और उनकी फिल्म से जुड़ी कंपनी चाहती थी कि वे ऐसे लोगों से सर्टिफिकेट लें जो सच में फैसला लेने की हैसियत रखते हैं. लेकिन ऐसे लोग फिल्म का नाम सुनते ही बिदक जाते थे. ऐसे में संजय लीला भंसाली के पास फिल्म की रिलीज टालने के अलावा कोई और चारा नहीं था.

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