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पीयू: भारत का पहला विश्वविद्यालय, जहां सर्वप्रथम पूरक परीक्षा की हुई थी व्यवस्था, कई नामी हस्तियों ने बढ़ाया मान

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पटना विश्वविद्यालय एक से एक हस्तियों का गढ़ रहा है. यहां से कई बड़ी हस्तियों ने देश-विदेश और राज्य का गौरव बढ़ाया है. भारत का यह पहला विश्वविद्यालय है, जहां सर्वप्रथम 1922 में पूरक परीक्षा की व्यवस्था हुई. हेमंत कुमार चौधरी पटना हाइकोर्ट के जज थे. 1920 में वे इतिहास प्रतिष्ठा के छात्र थे. डा. यदुनाथसरकार, प्रोफेसर योगेंद्र नाथ समाद्दार, प्रोफेसर वास्टोन स्मिथ इस समय पटना कॉलेज में इतिहास पढ़ाते थे. पटना हाइकोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश कामेश्वर दयाल, कलकत्ता हाइकोर्ट के न्यायाधीश रुपेंद्र मुखर्जी इसी विश्वविद्यालय के छात्र थे. पटना कॉलेज में एसआरबोस अर्थशास्त्र के प्रसिद्ध प्रोफेसर थे. उनकी नियुक्ति 1925 में हुई थी.

1934 के भूकंप में गिर गया था पहला तल्ला

1934 के भूकंप में पटना कॉलेज भवन का पहला तल्ला गिरकर बिल्कुल नष्ट हो गया. प्रोफेसर एसआर बोस और प्रोफेसर सैयद हसन अस्करी रिलीफ वर्क करने के लिए नियुक्त किये गये. टीपी सिंह, आइसीएस, सचिन दत्त आइएएस, पटना हाइकोर्ट के न्यायाधीश सतीश मिश्र एवं हरिहर महापात्रा, उड़ीसा के एडवोकेट जेनरल पितांबर मिश्र, राजस्व मंत्री इंद्रजीत सिंह पटना कॉलेज के छात्र रहे. इसी कॉलेज के छात्र एसआर बोस थे. बिहार सरकार रहे और 1958 में अवकाश प्राप्त किया.

प्रोफेसर यदुनाथ सरकार से इतिहास पढ़ने के लिए आनंद शंकर राय आइसीएस कोलकता से 1923 में पटना आये और 1923 से 1927 तक पटना कॉलेज में इतिहास पढ़े. 1946 के आसपास डाॅ डीपी विद्यार्थी, तत्कालीन प्राचार्य बीएन कॉलेज, डाॅ. डीबी शास्त्री एडिशनल डीपीआइ और डाॅ वी प्रसाद तत्कालीन अध्यक्ष, चित्रा मजूमदार तत्कालीन अधिकारी जेनरल मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन इसी विश्वविद्यालय के छात्र थे. 1960 में ऑल इंडिया एजुकेशनल एंड वोकेशनल गाइडेंस एसोसिएशन का सम्मेलन पटना विश्वविद्यालय में आयोजित हुआ और इसकी अध्यक्षता डाॅ जाकिर हुसैन ने की थी.1931 में पटना कॉलेज के प्राचार्य एच लैम्वर्ट थे. वे आइए में प्रति सप्ताह पांच ट्यूटोरियल क्लास अंग्रेजी में लेते थे. 1931 में मिंटो छात्रावास के अधीक्षक एपी बनर्जी थे. वे काफी कड़े थे. होली के दिन छात्रावास परिसर में रंग खेलने के कारण कुछ छात्रों को दंडित किये थे. दंड क्या दिया गया? दोषी अंतेवासी को ऊपर के कमरे से नीचे शौचालय के पास स्थित कमरे आवंटित किये गये.

खादी वस्त्र धारण करने पर थी पाबंदी

दर्शनशास्त्र के विद्वान डा. डीएम दत्त 1931-32 में खादी का धोती और कोट पहना करते थे. अंग्रेजी शासन काल के दौरान खादी वस्त्र धारण करने पर पाबंदी थी. 1931-32 में स्नातकोत्तर छात्रावास रानीघाट के अधीक्षक एचएन गांगुली गणित के प्रोफेसर थे और होमियोपैथ की दवा बांटा करते थे. महेंद्रू मुहल्ला के मरीज प्राय: आया करते थे.

इतिहास और पुरातत्व के प्रसिद्ध विद्वान डा. बीपी सिन्हा जब 1935 में पटना कॉलेज के छात्र थे तो स्कॉटलैंउ के निवासी प्रोफेसर जेएस आर्मर प्राचार्य थे. वे अंग्रेजी पढ़ाते थे और शैली ऐसी कि सभी भारतीय छात्र आसानी से समझ लेते थे. छह फुट लंबा मिस्टर जेएल हिल अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष थे. छात्रों के बीच ये दोनों शिक्षक काफी लोकप्रिय थे. मिस्टर आर्मर फुटबॉल के खिलाड़ी थे. 1935 के आसपास इतिहास के प्रोफेसर तारापोरेवाला यूरोपीय इतिहास के भारत प्रसिद्ध शिक्षक थे. इनके द्वारा यूरोप पर लिखित पुस्तक दो जिल्दों में पटना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की गयी थी. प्रोफेसर एससी सरकार इतिहास विभाग के अध्यक्ष थे और बेहतरीन पढ़ाने के लिए प्रसिद्ध थे. उन्हीं के कारण प्राचीन विश्व के इतिहास पर शोधकार्य करने का सिलसिला यहां प्रारंभ हुआ.

हमेशा सूट और टाई में आया करते थे प्रोफेसर

1935 में सैयद हसन अस्करी छात्रों को ब्रिटिश हिस्ट्री आइए में और यूरोपीय हिस्ट्री बीए में पढ़ाते थे. एमए में वे मध्यकालीन इतिहास पढ़ाते थे. प्रोफेसर अस्करी हमेशा सूट-टाई में आया करते थे तो जरूर किंतु टाई के नॉट और रंग पर उनका ध्यान कभी नही रहा. नाम के लिए गले में टाई रहती थी. अंग्रेजी वे फर्राटे से बोलते और मध्यकालीन इतिहास में गहरी जानकारी देते थे. मस्तानी और लाल कुंवर की ऐतिहासिक चर्चा वे प्राय. किया करते थे. प्रोफेसर अस्करी के सहपाठी प्रोफेसर गुप्तेश्वर नाथ इंग्लैंड का सांविधानिक इतिहास आइए एवं बीए में पढ़ाते और अपने सही ज्ञान का परिच एमए में देते थे. एमए में वे राजनीतिक विचार पढ़ाते थे. छात्रों को सदा प्रोत्साहित करते रहनेवाले डा. केके दत्त पटना कॉलेज के इतिहास विभाग में शोध कार्य का परिपक्व माहौल बना दिये. भारतीय इतिहास पर शोध करने का जितना श्रेय सर यदुनाथ सरकार को है उतना ही श्रेय बिहार पर शोध कार्य करने-कराने के लिए डा. दत्त का. कलीमुद्दीन साहब और प्रोफेसर फजलुर रहमान से आयु में बड़ी होने के बावजूद प्रोफेसर एसके घोष और संतोष बाबू छोटे लगते थे.

ये लोग अंग्रेजी पढ़ाते थे. सिंध के वासी और अंग्रेजी के प्रोफेसर एसटी गुलरजानी अत्याधुनिक वस्त्र पहना करते ओर देखने में सबसे सुंदर थे. डा. ज्ञानचंद्र अर्थशास्त्र के विद्वान थे. अंग्रेजी जमाने में भी वे बड़े ही असरदार अंदाज में समाजवाद की बात करते थे. वे काफी कुशल वक्ता थे. अर्थशास्त्र के दूसरे शिक्षक डा. आरके शरण क्लास में अच्छा नोट्स देने के कारण छात्रों के बीच लोकप्रिय थे़.

1956 में सीनेट की बैठक में पास हुआ प्रोफेसर एवं रीडर की नियुक्ति का प्रस्ताव प्रथम बार प्रोफेसर एवं रीडर के वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति का प्रस्ताव 1956 में सीनेट की बैठक में पास हुआ. इस  पद पर जितने शिक्षक नियुक्त हुए 1960 में उन्हें बीपीएस  द्वारा रिकंमेंडेशन मिला. यहां के शिक्षक डा. एसएम मोहसिन 1953 में इंडियान साइंस कांग्रेस एसोसिएशन के साइकोलॉजी एंड एजुकेशनल साइंस सेक्शन के रिकाॅर्डर निर्वाचित और 1957 में साइकोलॉजी एजुकेशनल साइंस सेक्शन के अध्यक्ष हुए. फारसी विभाग में तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर सैयद हुसैन 1927 से 1934 तक पटना कॉलेज के छात्र रहे. उनके समय में जेएस ऑर्मर, जेएल हिल, डेविड, एचएन गांगुली गणित के प्रसिद्ध प्राध्यापक थे. फजलुर रहमान डाइरेक्टर ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन और मिस्टर कलीमुद्दीन अहमद इसी कॉलेज के छात्र रहे. इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान

डा. कयामुद्दीन अहमद इन्हीं के परिवार के थे. कलीमुद्दीन अहमद के पिताजी डा. अजीमुद्दीन अहमद फारसी विभाग के अध्यक्ष थे. कलीमुद्दीन अहमद की दो पुत्रियां फरीदा कलीम की और जायरा कलीम मगध महिला कॉलेज में अंग्रेजी की प्राध्यापिका थी.

1934 में जब भूकंप आया तो पटना कॉलेज 15 दिनों के लिए बंद रहा

मिंटो मुहम्मडन हॉस्टल (जैक्सन होस्टल) के अधीक्षक डा. ए.एन. एम. अली फारसी विभाग के प्रथम शिक्षक थे जो अरबी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मिस्त्र गये. फारसी विभाग के शिक्षक ए. मन्नान की आकस्मिक मृत्यु युवाकाल में ही हो गयी. वे ‘बेदिल’ नाम से शायरी लिखते थे. इसी विभाग में वज्म ए अदब का प्रथम वार्षिकोत्सव 1928 में मनाया गया. इसी वर्ष पटना में साइमन कमीशन आया था. इस कमीशन के सदस्यों में से एक थे सर जुल्फीकार अली खान. उन्होंने ही वज्म-ए-अदब की अध्यक्षता की. 1934 में जब भूकंप आया तो पटना कॉलेज 15 दिनों के लिए बंद रहा. अंग्रेजी स्नातकोत्तर विभाग में एमए की प्रथम छात्रा कुमारी नवनालिनी घोष बीए में कुमारी नारायण और फिर कुमारी रमोला थी. 1930 में पटना कॉलेज में ड्रामा हुअा जिसमें मिस्टर मोहसिन (उा. एस.एम. मोहसिन, अध्यक्ष मनोविज्ञान विभाग) ने लड़की के वेष में एक्टिंग किया था. 1934-35 में परीक्षाफल व्हीलर सिनेट हाॅल के उत्तरी दीवार पर चिपका दिया जाता था. बच्चों के इलाज के प्रसिद्ध डाक्टर लाला सूर्यनंदन प्रसाद इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं.

स्वतंत्रता व असहयोग आंदोलन में भी पीयू की भूमिका थी अहम

पटना. स्वतंत्रता आंदोलन और असहयोग आंदोलन में भी पटना यूनिवर्सिटी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है. इतिहास की प्रोफेसर जय श्री मिश्रा ने बताया कि आंदोलन के दौरान  गांधी ने आह्वान किया था कि जहां भी अंग्रेजों द्वारा सरकारी स्कूल और कॉलेज शुरू किये गये हैं  वहां कोई भी पढ़ने न जाये. शिक्षा ग्रहण करने के लिये राष्ट्रीय विद्यालय खोला जायेगा. गांधी के इस आह्वान के बाद कई स्टूडेंट्स ने पढ़ाई छोड़ दी थी. बीएन कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रो बद्रीनाथ वर्मा और पटना कॉलेज में पढ़ रहे जय प्रकाश नारायण ने भी अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी. इसके बाद सदाकत आश्रम में राष्ट्रीय विद्यालय खोला गया जहां सभी ने अपनी पढ़ाई शुरू की.

स्वतंत्रता आंदोलन में पीयू के थे कई छात्र

असहयोग आंदोलन के बाद 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हुई. इस दौरान देश के सभी जगहों के नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया. तब पीयू के सात छात्र ने सचिवालय में तिरंगा लहराया था. जिसके बाद सातों छात्र को गोलियों से भून दिया गया. आज जिनकी मूर्ति आप विधानसभा के पास देखते हैं ये वहीं सात छात्र हैंं. इसमें बीएन कॉलेज के छात्र जगपति कुमार, मिलर हाई स्कूल के देवी पद चौधरी, पटना हाई स्कूल के राजेंद्र सिंह, राम मनोहर राय सेमिनरी स्कूल के उमाकांत प्रसाद सिन्हा और रामानंद सिंह, पुनपुन हाई स्कूल के राम गोविंद सिंह शामिल थे. यह सभी पीयू के छात्र थे. क्योंकि उस दौरान बिहार के सभी सरकारी हाई स्कूल और कॉलेज पीयू के अधीन थे.

1942 के आंदोलन को जेपी ने ही किया था तेज 

सभी नेताओं को जेल में बंद होने के बाद 1942 का आंदोलन काफी कमजोर होने लगा था, तब जय प्रकाश नारायण अपने छह साथियों के साथ जेल से भाग कर आंदोलन में तेजी लायी थी. वह जेल से भाग कर नेपाल की तराई में चले गये और गुप्त तरीकों से आंदोलन को हवा दी.

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