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पुण्यतिथि विशेष: जब गाते-गाते रोने लगे जगजीत सिंह और फिर आई वो बुरी खबर

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जगजीत सिंह को गए 6 साल हो गए. इन 6 सालों में ग़ज़ल के शौकीनों ने उन्हें हर रोज याद किया. वो कलाकार ही ऐसे थे. आप इश्क में हों तो जगजीत सिंह को सुनिए. दिल टूट गया हो तो जगजीत सिंह को सुनिए. खुशी में हों तो उन्हें सुनिए, ग़म में हो तो उन्हें सुनिए. भक्ति में सुनिए, डांस में सुनिए.

ये उनकी खूबी थी कि उनके चाहने वालों में 15 साल से लेकर 85 साल तक के लोग थे. उनके पास हर उम्र के लोगों के सुनने सुनाने के लिए कुछ था. जगजीत सिंह के पास मानो गायकी का डिपार्टमेंटल स्टोर था. आप उसमें अंदर चले जाएं और अपनी पसंद का सामान ले लें. आप वहां से खाली हाथ नहीं लौट सकते.

हिंदी गीतों में ग़ज़लों की सेंध

इस अद्भुत रेंज के पीछे बड़ी वजह थी. उन्होंने हिंदी गीत सुनने वालों को ग़ज़ल का चस्का लगाया. ग़ज़ल को उर्दू की मिल्कियत समझने वालों को गलत साबित किया और उसे आम लोगों की जुबां बना दिया. ग़ज़ल गायकी की दुनिया के वो निश्चित तौर पर पहले और सबसे बड़े ‘स्टार’ थे. उनके कार्यक्रमों में अगर आंखें बंद किए ग़ज़ल का लुत्फ उठाते श्रोता होते थे तो ठुमके लगाने वाले श्रोता भी. जगजीत सिंह कहा भी करते थे कि मंच पर बैठने के साथ ही अगर आपने श्रोताओं से कनेक्ट कर लिया तो आपकी गायकी को लोग जमकर पसंद करेंगे.

दशक जगजीत सिंह के लिए चुनौतियों का दशक था. वो जिन जगहों पर रहे वहां चूहों का बड़ा आना जाना था. लिहाजा गर्मियों में भी मोटे मोजे पहनकर सोना पड़ता था. बड़ी मुश्किल से कुछ जिंगल्स मिलते थे गाने के लिए. साठ के दशक के बीतते-बीतते जगजीत सिंह की मुलाकात चित्रा दत्ता से हुई. चित्रा जगजीत सिंह से उम्र में तो बड़ी थीं, लेकिन दोनों में इश्क हुआ और फिर शादी.

सत्तर के दशक से बने जगजीत सिंह

सत्तर का दशक जगजीत सिंह के लिए बेहतर रहा. इसी दशक में उनकी पहली अल्बम रिलीज हुई ‘अनफॉरगेटेबल्स’. इसी दौरान बासु भट्टाचार्य की फिल्म-अाविष्कार में उन्होंने गाया- बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए. इसके बाद अगर ये कहावत वाकई कुछ मायने रखती है कि ‘इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा’ तो जगजीत सिंह का उदाहरण बेस्ट है.

अनूप जलोटा ने जगजीत सिंह पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में बताया कि एक वक्त था जब जगजीत सिंह और चित्रा सिंह को लेकर कनाडा में लोगों को लगता था कि दो सरदार एक साथ गाएंगे, ये तो बाद में पता चला कि ये पति-पत्नी हैं.

लोकप्रियता की हद देखिए कि जब पहली बार इन दोनों कलाकारों ने कनाडा में कार्यक्रम किया तो उसके बाद एक महीने तक उन्हें वहां से वापस आने का मौका ही नहीं मिला. जिस हॉल में पहला कार्यक्रम किया था वो हॉल अगले कई दिनों के लिए बुक कर दिया गया. भारत लौटने से पहले ही सीधे कनाडा से उन्हें दूसरे देशों के दौरों पर ले जाया गया. ये जगजीत सिंह का जादू था.

80 के दशक में ये जादू फिल्म इंडस्ट्री पर भी चढ़कर बोलने लगा. ‘होठों से छू लो तुम’ ऐसा गाना हो गया जो हिंदी फिल्म संगीत में अमर कहा जाएगा. इसी दशक के शुरुआती सालों में ही ‘अर्थ’ और ‘साथ-साथ’ के संगीत ने जो सुकून दिया वो जगजीत सिंह की लोकप्रियता को एक अलग ही मुकाम पर ले गया. फारूख शेख जैसे संजीदा कलाकार के लिए जगजीत सिंह की आवाज ने कमाल ही कर दिया.

की बारी थी एक और महान शख्सियत गुलजार की. दूरदर्शन के लिए मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल बन रहा था और मिर्ज़ा ग़ालिब का रोल नसीरुद्दीन शाह कर रहे थे. जगजीत सिंह ने मिर्ज़ा ग़ालिब को गाया. कई बड़े शायरों का कहना है कि आम लोगों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों की जो पहुंच बनी वो जगजीत सिंह की बदौलत थी. इसी दौरान एक के बाद एक हिट एल्बम, दुनिया भर में लाइव शो, फिल्मों में ‘प्लेबैक सिंगिंग’. जगजीत सिंह एक अलग ही ‘स्टेटस इन्जॉय’ कर रहे थे. उस दौर में उन्हें घोड़ों का शौक था और वो घोड़ों पर पैसा लगाते थे.

‘दर्द से मेरा दामन भर दे’

इसी दौरान एक घरेलू पार्टी में जगजीत सिंह की जिंदगी का सबसे बुरा दिन आया. साल था 1990. पार्टी खत्म होने को थी. अंजू महेंद्रू की फरमाइश हुई कि जगजीत सिंह जाने से पहले ‘दर्द से मेरा दामन भर दे’ सुना दें. जगजीत सिंह उस ग़ज़ल को गाने के मूड में नहीं थे लेकिन फरमाइश का बोझ लिए जाना भी नहीं चाहते थे. उन्होंने वो ग़ज़ल गाई. कहते हैं कि वो ग़ज़ल गा रहे थे और लगातार रो रहे थे.

कार्यक्रम खत्म हुआ तो उनके इकलौते बेटे विवेक सिंह की सड़क दुर्घटना में मौत की खबर आई. बेटे की अर्थी का बोझ किसी के लिए भी दुनिया का सबसे बड़ा बोझ होता है. जगजीत सिंह बेटे के अंतिम संस्कार में आए ज्यादातर लोगों के जाने के बाद बोले, ऊपर वाले ने उस रात मेरी दुआ कबूल कर ली. ये उनके जीवन का सबसे बड़ा सदमा था. चित्रा सिंह तो इस सदमे को बर्दाश्त ही नहीं कर पाईं. उन्होंने गाना तक छोड़ दिया.

कुछ समय बाद जगजीत सिंह गायकी में तो लौटे लेकिन ये उनकी गायकी का बिल्कुल अलग अंदाज था. जगजीत सिंह बदल चुके थे. इसके बाद जगजीत सिंह को अलग ही दर्जे के कलाकार के तौर पर देखा गया. फिर भी उनकी लोकप्रियता ज्यों की त्यों थी क्योंकि उनकी डिमांड थी. जगजीत सिंह ने इस दौर में तमाम लोगों की मदद की. अपने साथी कलाकारों को पैसे दिए. बीमार बच्चों के इलाज के लिए पैसे दिए.

सत्तर की उम्र में सत्तर कन्सर्ट

उनकी ख्वाहिश थी कि सत्तर साल की उम्र में सत्तर कन्सर्ट करेंगे, इसकी शुरुआत भी हो चुकी थी. सबने मना किया था उम्र का खयाल रखिए, कहने वाले शायद ये कहना चाहते थे कि अपने गमों का खयाल रखिए, लेकिन वो नहीं माने यहां-वहां, इधर-उधर के कार्यक्रम करते

चले गए ।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में गुलज़ार साहब ने कहा कि क्या खूबसूरत याराना है सत्तर की उम्र में सत्रह का लगता है तो उस रोज जगजीत सिंह ने स्टेज से गाया- ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं सत्तर का हूं, सुनने वाले झूम गए.

किसी ने सोचा तक नहीं था, वो गुलज़ार साहब के एक छोटे से जुमले को गायकी में ढाल देंगे. कार्यक्रमों की इस भागदौड़ में सब कुछ बड़ा ही अचानक हुआ. उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ. कुछ हफ़्तों तक वो अस्पताल में ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते रहे. आखिरकार एक बार फिर अपनी दुआ को वो इन शब्दों में कबूल कराकर चले गए- चिट्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए.

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