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फगुआ गीत से किया जाता है नये साल का स्वागत

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भारत देश में हर ख़ुशी के लम्हों को त्यौहारों से जोड़कर मनाया जाता है। इसी  वजह से भारतवर्ष को त्यौहारों का देश भी कहा जाता है। भारत देश की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ सभी धर्मों के लोग “सर्व धर्म समभाव” की सदभावना के साथ रहते हैं। इसीलिए यह नारा लगाया जाता है – “हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, आपस में हैं भाई भाई”। जिस तरह से हिन्दू धर्मं में जो महत्व ‘होली’ का है वही महत्व इस्लाम में “ईद’ का तथा ईसाईयों में ‘क्रिसमस’ का है।

फाल्गुन मास की शुरुआत बसंत ऋतु के रूप में होती है। वसंत के स्वागत में प्रकृति का कण-कण खिलने लगा है। पेड़-पौधों-फूलों पर बहार, खेतों में सरसों का चमकता सोना, गेहूं की सुडौल बालियां, आम के पेड़ों पर लदे बौर ऋतुराज के अभिनंदन में नत मस्तक हो रहे हैं। मौसम सुहाना हो गया है। न अधिक गर्मी है न अधिक ठंड। पूरे वर्ष को जिन छः ऋतुओं में बांटा गया है, उनमें वसंत मनभावन मौसम है।

फाल्गुन माह की अंतिम रात (पूर्णिमा) पूनम की रात को होली जलाकर ख़ुशी मनायी जाती है। साल की आखिरी रात होती है। सुबह नयी ताज़गी  साथ चैत्र महीने का पहिला दिन नववर्ष का आरम्भ होता है जिसे रंग गुलाल के साथ लोगो से गले मिलकर  होली के रूप में मनाया जाता है।

हिन्दी महीना के  नये साल का स्वागत फगुआ गीत से किया जाता है जिसे होली के रूप में मनाया जाता है।
पुराने साल की अंतिम रात को होलिका दहन के रूप लकड़ियों के ढेर को जलाकर नाच गाना के साथ विदाई दी जाती है।


सुबह सवेरे नई ताजगी और नए जोश के साथ रंग बिरंगी होली खेलते हुए तथा फगुआ (फाग) गाते हुए घर-घर जाकर सामूहिक नाच गाना करते हुए  मनाया जाता है। पुरुष लोग बेलवरिया, जोगीरा सररररररररा आदि आदि.. गीत गाते हुए महिलाओं को ललकारते हैं और महिलाएं बाल्टी भर – भरकर रंग पुरुषों पर डालती है।

रंग गुलाल और फागुआ  के साथ  भाँग की घोटाई तथा खूब जमके भाँग पीने का भी आनंद उठाया जाता है।

पुरुष उअर महिलाओं में होड़ भी लगती नही कि कौन ज्यादा भांग पी सकता है।

भंग के  रंग का आनंद तो तब आता है जब भाँग का नशा सर पर सवार हो जाता है। फगुआ में भाँग की घोटाई और भाँग पीने का अलग ही आनंद है .

 

फ़िल्म – सिलसिला के लिए सदी के महानायक – अमिताभ बच्चन द्वारा  गीत – “रंग बरसे भीजे चुनार वाली  ……”  आज भी बड़े चाव से गाया तथा सूना जाता है।

 

 

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