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फिल्म रिव्यूः नाम शबाना, गर्ल पावर की दमदार कहानी

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कहानी

शबाना खान इंडियन इंटेलिजेंस एजेंसी की स्‍पेशल एजेंट है। देश के लिए जान देने का दम रखती है। अब देश है तो दुश्‍मन भी हैं। फिल्‍म में जो दुश्‍मन है वह एक आर्म्‍स डीलर है। खूंखार है। एजेंसी शबाना को उसे मारने का काम सौंपती है।

समीक्षा

साल 2015 में अक्षय कुमार की फिल्‍म ‘बेबी’ रिलीज हुई थी। इस फिल्‍म में शबाना (तापसी पन्‍नू) का कैमियो था। काठमांडू के होटल में शबाना के एक्‍शन सीक्‍वेंस ने सभी का दिल जीता था। अजय सिंह (अक्षय कुमार) के साथ ‘बेबी’ में शबाना का किरदार भी खूब चमका। समीक्षकों की वाहवाही मिली और दर्शकों का प्‍यार। लेकिन क्‍या वाकई इस प्‍यार और वाहवाही के बूते 148 मिनट की एक अलग फिल्‍म बनाने की जरूरत थी?

…क्‍योंकि भावनाओं का सम्‍मान है

शबाना खान का किरदार दर्शकों को क्‍यों पसंद आया? शायद इसलिए कि वह ‘बेबी’ में कैमियो कर रही थी। लेकिन 148 मिनट के इस प्रीक्‍वल में ना तो उसका कैरेक्‍टर और ना ही पूरी फिल्‍म इतनी प्रभावी जान पड़ती है। हां, यह सच है कि महिला सशक्‍ति‍करण के नजरिए से यह फिल्‍म थोड़ी महत्‍वपूर्ण हो। फिल्‍ममेकर्स ने भी इसी बात का खयाल रखा है। लिहाजा, नीरज पांडे की इस भावना का सम्‍मान किया जा सकता है। उन्‍होंने इस फिल्‍म को डायरेक्‍टर तो नहीं किया है, लेकिन कहानी, स्‍क्रीनप्‍ले और डायलॉग्‍स की जिम्‍मेदारी जरूर उठाई है।

‘बेबी’ जैसी कसावट नहीं

‘बेबी’ की खासियत यह थी कि फिल्‍म आपको बांधे रखती है। उसमें दिखाई गई इंटेलिजेंस की कार्रवाई आपको भी नए ढंग से सोचने पर मजबूर करती है। लेकिन पांडे जी ने इस फिल्‍म की कहानी और कार्रवाई को हद से ज्‍यादा सामान्‍य दिखाया है। ऐसा लगता है जैसे फिल्‍म में मनोज बाजपेयी, अक्षय कुमार (कैमियो) और ‘बेबी’ के दूसरे पात्र शबाना को चम्‍मच से दूध पिला रहे हों।

फिल्‍म में बहुत कुछ अच्‍छा भी है

हालांकि, सबकुछ इतना बुरा भी नहीं है। ‘बेबी’ से तुलना करने पर यह फिल्‍म कमजोर जरूर दिखती है, लेकिन यदि सिर्फ ‘नाम शबाना’ की बात करें तो फिल्‍म अच्‍छी जान पड़ती है।

महिलाओं की ताकत दिखाती है फिल्‍म

सीधे शब्‍दों में कहें तो यह फिल्‍म आपको यह अहसास करवाती है कि महिलाओं को अब किसी सहारे की जरूरत नहीं है। राह चलते अगर शराबियों का गुट उसे छेड़ता है या भीड़-भाड़ वाली जगहों पर उनके साथ बदतमीजी होती है, तो उन्‍हें जवाब देना आता है। उनके डीएनए में पलटवार करने की ताकत है और वह इसे बहुत ही बहादुरी से कर सकती हैं।

शबाना, कैसे और क्‍यों बनी एजेंट शबाना

फिल्‍म में शबाना का पास्‍ट भी दिखाया गया है। मासूम उम्र जब बढ़ रही थी, तब शराबी पिता से उसे डर लगता था। उसके पिता उसकी मां को पीटते थे। दुर्घटनावश वह अपने पिता की हत्‍या कर देती है और इस वजह से उसे बाल सुधार गृह में भी रहना पड़ता है। लेकिन वह इनका असर अपने भविष्‍य पर नहीं होने देती। खुद को तैयार करती है।

कुछ ऐसा है फिल्‍म का फर्स्‍ट हाफ

फिल्‍म के फर्स्‍ट हाफ शबाना और उसके प्रेमी जय के नाम है। इंटरवल के बाद खासकर अंतिम 35 मिनट में ही सारा एक्‍शन है। एक्‍शन-ड्रामा के नाम पर हम अब तो देखते आए हैं, फिल्‍म उसी तर्ज पर बढ़ती है। मुंबई से गोवा। वियना से क्‍वालालंपुर। आर्म्‍स डीलर। आईएसआई एजेंट्स। चूहे-बिल्‍ली का खेल।

एक सलाम तो बनता है

‘बेबी’, ‘पिंक’ के बाद तापसी एक बार छाप छोड़ती हैं। मनोज बाजपेयी शानदार लगे हैं। हालांकि, उनके हिस्‍से सिर्फ डायलॉबाजी है, एक्‍शन नहीं। जहां तक अक्षय की बात है, तो वो अपनी सुपरस्‍टार इमेज को गर्ल पावर का साथ देकर खुश दिखते हैं। फिल्‍म में देश है। महिला सशक्‍ति‍करण है। इंटेलिजेंस एजेंसी है। देश का दुश्‍मन भी है। इतने भावनात्‍मक पक्षों को एक सलाम तो बनता है।

 

 

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