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बकरीद: आखिर क्यों अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी

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भारत में जिस त्योहार को बकरीद के नाम से जाना जाता है दरअसल वो ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-जुहा कहलाता है. अज़हा या जुहा का अर्थ है सुबह का वक्त यानी सूरज चढ़ने से सूरज के ढलने के बीच का समय.

ये त्योहार अरबी महीने ज़िलहिज्जा की दसवीं तारीख को मनाया जाता है. इसी महीने में मुसलमान हज करने मक्का की यात्रा पर जाते हैं. यूं तो क़ुर्बानी के लिए कोई चौपाया (चार पैरों वाला) कुर्बान करने की परंपरा रही है लेकिन भारत में इसे बकरे से जोड़ कर देखा जाता है और इसको बकरी-ईद या बकरीद कहा जाता है.

बकरीद के त्योहार में अपनी हैसियत के मुताबिक किसी जानवर की क़ुर्बानी देने की परंपरा रही है. आज भी पूरी दुनिया के मुसलमान हैसियत के मुताबिक हलाल जानवर खरीदते हैं और अपने रब की खुशी के लिए उसको कुर्बान करते हैं.

इस क़ुर्बानी का मकसद ये कतई नहीं है कि अल्लाह को खून या गोश्त पसंद है या उसे इसकी जरूरत है बल्कि इसका मकसद ये है कि हर इंसान अपने जान-माल को अपने रब की अमानत समझे और उसकी रजा के लिए किसी भी त्याग या बलिदान के लिए तैयार रहे.

यूं जानवर की बलि या क़ुर्बानी दुनिया के हर धर्म और समाज की परंपरा का हिस्सा रही है लेकिन बकरीद के इतिहास पर एक नजर डाली जाए तो हमे मालूम होता है कि जानवर की क़ुर्बानी का कोई सीधा आदेश अल्लाह की तरफ से नहीं हुआ था. क़ुर्बानी दरअसल पैगंबर इब्राहीम की यादगार के तौर पर की जाती है.

कुर्बानी के पीछे की कहानी

एक मर्तबा पैगंबर इब्राहीम ने ख्वाब में देखा कि वो अपने बेटे को अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर रहे हैं. उन्होंने देखा कि उनके हाथ में छुरी है और वो उसको अपने बेटे की गर्दन पर चला रहे हैं.

सुबह इब्राहिम सो के उठे तो उनको सोच-विचार में पड़ा देख उनके बेटे इस्माईल ने पुछा, अब्बाजान आप फिक्रमंद नजर आ रहे हैं, क्या बात है? बेटे के बार-बार पूछने पर पैगंबर इब्राहीम ने सपने वाली बात बताई. इस पर बच्चा इस्माईल बोला, तो इसमें इतना सोचने की बात क्या है, मैं आपकी सबसे प्यारी चीज हूं आप मुझे अल्लाह की राह में क़ुर्बानी कर दीजिए. इब्राहीम ने बच्चे के मुंह से ये बात सुनी तो हैरान रह गए.

उनको लगा कि उनका रब कोई इम्तहान ले रहा है. वो अपने रब के इम्तहान में नाकाम नहीं होना चाहते थे. बेटे को क़ुर्बानी के लिए लेकर चल दिए. क़ुर्बानी की जगह पर पहुंचकर जैसे ही बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई तो एक करिश्मा हुआ. बेटा छुरी के नीचे से निकल गया और एक दुम्बा (कुछ परंपराओं में भेड़) वहां मौजूद था जिसकी गर्दन पर छुरी चल चुकी थी. इस तरह पैगंबर इब्राहीम अपनी परीक्षा में सफल हुए.

इसके बाद अंतिम पैगंबर मोहम्मद के दौर में क़ुर्बानी को मुसलमानों के लिए जरूरी करार दे दिया गया. हर वो मुसलमान जो एक या अधिक जानवर खरीदने की हैसियत रखता है वो जानवर खरीदता है और क़ुर्बान करता है. इसका गोश्त तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है. एक हिस्सा गरीबो के लिए, एक हिस्सा रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालो के लिए और एक हिस्सा अपने लिए होता है. इससे समाज में आपसी भाईचारा बढ़ता है और एकदूसरे का ख्याल रखने की भावना पैदा होती है. जानवर का चमड़ा बेच कर जो पैसा मिलता है वो किसी गरीब, यतीम या जरूरतमंद को दे दिया जाता है.

कुर्बानी के पीछे का पैगाम

क़ुर्बानी तो जानवर की होती है लेकिन इससे जो शिक्षा मिलती है उस पर ध्यान देने की जरूरत है. इस त्योहार का एक पैगाम ये भी है कि हम अपने चरित्र को बुराइयों से पाक करें. मन को साफ करें और दुनिया को एक बेहतरीन जगह बनाएं.

बहरहाल किसी भी त्योहार के पीछे उसका इतिहास होता है, धार्मिक मान्यताएं होती हैं और सामाजिक सरोकार होते हैं. क़ुर्बानी के त्योहार का मकसद भी सामाजिक एकता, भाईचारा, एक-दूसरे की जरूरत और किसी भी कठिनाई के समय अपना सबकुछ क़ुर्बान करने की भावना को मजबूत करना है.

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