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बिहार का बत्तीसगामा: यहां जो दहेज लेता है, उसे समाज से निकाल देते हैं

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दहेज लेना-देना कानूनन अपराध है. इस वाली लाइन का उतना ही महत्व है जितना धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानि… वाली लाइन का होता है. जितना सनीमा शुरू होने के पहले मुकेश हराने के ऐड का होता है. जितना केआरके के मूवी रिव्यू का होता है. सलमान की फिल्म में स्टोरी का होता है. और आपकी जिंदगी में ऐसे घिसे हुए वन लाइनर्स का होता है.

दहेज बुरी बात है. नहीं लेना चाहिए. लोग दबा के लेते हैं. काहे के समाज के आगे दिखाना होता है. कमाऊ/लायक लड़का इत्ता सामान लाया. पर भारत में एक ऐसा समाज भी है जहां दहेज लेना गुनाह है. और इतना ही नहीं जो दहेज लेते हैं या देते हैं उनको समाज से निकाल दिया जाता है. ये परंपरा चली आ रही है. परंपरा के नाम से हम तनिक बिदक जाते हैं, बट दिस वाली परंपरा इज क्वाइट कूल. वो भी बिहार की धरती पर.

तो ये समाज है ‘बत्तीसगामा समाज’. बत्तीसगामा समाज 32 गांवों का एक संगठन है. जो बिहार के मधुबनी और दरभंगा जिले में एक्टिव है. यहां सालों से दहेज न लेने की परंपरा चली आ रही है. मैथिल कर्ण-कायस्थ समाज के लोग अपने बेटों-बेटियों की शादी बिना दहेज लिए-दिए करते हैं. (यकीन जानो, जातियों का नाम इतना फैल के हम आमतौर पर लिखते नहीं हैं 😉 ) इतना ही नहीं अगर कोई इस परंपरा को तोड़ता है तो उसको समाज से निकल देते हैं. मल्लब उसके यहां न तो अपने बच्चों का बियाह करेंगे और न ही भोज खाने जाएंगे.

इस समाज के एक बुजुर्ग ने बताया कि ‘हमारे पूर्वजों ने 32 गांवों का एक संगठन बनाया. और निर्णय लिया कि हम अपने बेटों-बेटियों की शादी में न दहेज़ लेंगे और न दहेज़ देंगे. और अगर कोई दहेज़ लेते हैं तो हम उसका सामाजिक बहिष्कार करते हैं. उनके यहां खान-पान बंद कर देते हैं.’ इसी समाज की एक लड़की ने बताया ‘जैसे हमारे समाज के लोग दहेज नहीं लेते हैं और जिस तरह इस परंपरा को मेंटेन किया हुआ है. वैसे ही सभी समाज के लोग करें तो बहुत अच्छा होगा.’

इस परंपरा की नींव दरभंगा के महाराज हरी सिंह देव ने रखी थी. यह सिस्टम उन्होंने समाज में बराबरी बनाने और भेदभाव को मिटाने के लिए शुरू किया था. ये सिस्टम हर जाति के लिए था. पूरा हिसाब-किताब रखा जाता. पंजी व्यवस्था की गई थी. पंजीकरण समत्ते हो न? इस व्यवस्था में हिसाब धरने वाला लड़का और लड़की की सात पुश्तों का हिसाब-किताब को देख कर रिश्ता कराते थे. जिसमें दहेज नहीं लिया जाता था. लेकिन आज सिर्फ मैथिल कायस्थ परिवार ही इस नियम का पालन कर रहे हैं.

इस समाज के एक पंजीकार ने बताया ‘इस परंपरा की शुरुआत 800 साल पहले ही हो गई थी. जिसका मोटिव था कि समाज में अमीर-गरीब की खाई है को खत्म किया जाए. हर तबके के लोग एक-दूसरे में शादी कर सकें.’ यार ये सही चीज है. इसी आड़े कम से कम लोग लड़कियों की जान तो न खाएं. नहीं तो पढ़ लिख लिए. सौ प्रपंच कर लिए पर ब्याह को हुआ तो मुंह खोलेंगे और टप्प से दहेज़ मांग देंगे. अब इसी सिस्टम लगाए ही ये घिनहापन टले. यही अच्छा है.

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