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बिहार की इन 3 बेटियों ने किताब से लेकर राजनीति के मैदान तक मारी है बराबर बाज़ी

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बिहार स्वतंत्रता आंदोलन से ही भारतीय राजनीति का समर रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व और बाद तक जहाँ राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया ने देश की राजनीति को नई दिशा दी वहीं महिलाओं ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। राजेंद्र प्रसाद की बहन भगवतिया देवी, जिरियावती, श्रीमती हसन इमाम और विंदयावासिनी देवी स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। इसी तरह आज भी बिहार की ये बेटियाँ जिन्होंने अपने अकादमिक में तो कमाल किया ही और उतना ही अपना परचम राजनीति में भी लहराया है।

जान्हवी ओझा

जान्हवी ओझा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राइट विंग की एक कद्दावर छात्रनेत्री हैं। इन्होंने 2016 में अध्यक्ष पद के लिये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जेएनयू छात्रसंघ का चुनाव भी लड़ा था। जान्हवी बिहार के छपरा की रहने वाली हैं। छपरा सेंट्रल स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद जान्हवी ने अपना स्नातक जंतु विज्ञान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से और वहीं से साइटोजेनेटिक्स में स्नातकोत्तर भी किया। जान्हवी फ़िलहाल जेएनयू से अपना पीएचडी कर रही हैं। पीएचडी में उनका विषय मॉलिक्यूलर पैरासिटालॉजी है।

जान्हवी को अपने एक शोध की प्रस्तुति के लिये हाल ही में उन्हें जापान बुलाया गया था। इनके शोध का टाइटल था, “Partition of Calcium Binding Protein I in action dynamics and phagocytosis of the parasite Entamoeba histolytica”।

जान्हवी पिछले साल हुए जेएनयू के छात्रसंघ चुनाव में जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही थीं। उनकी जीत बहुत ऐतिहासिक हो सकती थी लेकिन जेएनयू में लेफ़्ट के छात्र संघठनों के गठबंधन के बाद उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन जिस तरह उन्होंने अकादमिक और राजनीति दोनों पर अपनी पकड़ बनाई हैं, भविष्य में वो देश के नेतृत्व के लिये एक बड़ा चेहरा बनकर उभर सकती हैं।

अंशु कुमारी

अंशु 2012 में हुए पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव की जनरल सेक्रेटरी रही हैं। ये बेगूसराय जिले की रहने वाली हैं। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की है। इन्होंने वाणिज्य में अपना स्नातक मगध महिला कॉलेज से किया है और इसके बाद दरभंगा हाउस से इसी विषय में स्नातकोत्तर भी। जब ये अपने स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष में थीं तो पटना विश्वविद्यालय में 28 वर्षों के बाद पहली बार छात्रसंघ चुनाव हुआ। अंशु एआईएसएफ से विश्वविद्यालय पैनल पर महासचिव का चुनाव लड़ी और जीत भी दर्ज की।

अंशु पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जीत से पहले और बाद भी छात्रहितों के लिये संघर्ष करती रही। छात्र राजनीति में अपनी माँगों को लेकर इन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन के फ़र्ज़ी मुकदमे का भी शिकार होना पड़ा। छात्रसंघ चुनाव में जीतने के बाद जब अंशु और उपाध्यक्ष अंशुमान सहित एआईएसएफ के लोग छात्रसंघ कार्यालय को लेकर अनशन पर थे। फ़िर इसके लिये उन्होंने एक बैठक भी आयोजित की। इसी बीच कुलपति से किसी की झड़प हो गई और उन्होंने अंशु और अंशुमान पर एटेम्पट टू मर्डर का मुकदमा दायर करा दिया।

अंशु बताती हैं कि इस फ़र्ज़ी मुकदमे के चलते उन्हें काफ़ी परेशानी झेलनी पड़ी थी और वो तीन महीने तक आउट ऑफ कैंपस रही थीं। इसके बाद तत्कालीन डीन का यह बयान आया कि जब ये घटना हुई तो ये लोग दरभंगा हाउस में एक बैठक कर रहे थे जो यह सुनिश्चित करता है कि इसमें ये किसी भी तरह से संलिप्त नहीं हैं।

पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर के बाद अंशु ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध में एमफिल की और अभी इसी विषय में वहाँ से पीएचडी भी कर रही हैं। अंशु बताती हैं कि राजनीति में कुछ बेहतर करने के लिये अकादमिक में बेहतर करना बहुत ज़रूरी होता है। वो अकादमिक को हमेशा ऊपर रखती हैं लेकिन राजनीतिक सक्रियता से इस देश का नागरिक होने का फ़र्ज़ भी निभाती हैं।
जेएनयू में भी वो लगातार अपने संगठन की हर गतिविधि में खुद को सक्रिय रखती हैं।

दिव्या गौतम

दिव्या गौतम 2012 में हुए पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव की प्रेसिडेंट उम्मीदवार थी। आइसा की तरफ़ से अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने वाली दिव्या इस पद की सबसे प्रबल दावेदार मानी जा रही थी। हालांकि वो जीत तो नहीं पाई लेकिन बहुत ही कम वोटों के अंतर से ही हारी थी। दिव्या ने अपना स्नातक पटना कॉलेज से पत्रकारिता एवं जनसंचार में तथा स्नात्तकोत्तर वीमेंस स्टडीज़ में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस से किया है।
दिव्या लेफ़्ट विंग की एक काबिल और कद्दावर छात्रनेत्री मानी जाती हैं। इन्होंने छात्रहितों के लिये हमेशा ही प्रशासन के सामने उनकी आवाज़ को बुलंद किया है। विश्वविद्यालय, कॉलेज, या विभाग की समस्या के साथ-साथ किसी की व्यक्तिगत समस्याओं में भी इन्होंने उनका भरपूर मदद किया है।

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