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बिहार के एक ऐसे कवि जिन्होंने वेदों और तंत्रों पर फारसी में “तश्दीद” लिख दिया

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आपने कालिदास, तुलसीदास, सूरदास और रविदास जैसे कवियों के बारे में सुना होगा, पर लालदास का नाम शायद ही आपके कानों से गुजरा हो. आइए आपको बताते हैं इस जबर कवि के बारे में.  बिहार के मधुबनी में महाकवि पंडित लालदास का जी के बारे में, कवि लालदास ने चार भाषओं में कविताएं लिखी हैं. फारसी, संस्कृत, मैथिलि और हिंदी में. वो उर्दू और अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार थे. मिथिला चित्रकारी भी आती थी. ये मधुबनी में ही पैदा हुए थे. इनके दादा जल्पादत्त दास राज दरभंगा में दीवान थे और पिता बचकन दास विचारक थे.

आइए जानते हैं इनकी जिंदगी के कुछ रोचक किस्से…


‘इसी बच्चे के हाथ से पिंड लेना है, इसे कैसे अंग्रेजी पढ़वाऊं’

अपनी नॉलेज की वजह से लालदास कम समय में ही अपने इलाके में फेमस हो गए थे. पहले इनका नाम चूड़ामणि लाल दास था, जो बाद में लालदास हो गया. किस्मत अच्छी थी कि भैयादास पढ़ा रहे थे, जिससे सात की उमर में ही हिंदी और मैथिलि की नॉलेज हो गई थी. संस्कृत के श्लोक तो झड़ापड़ सुुनाते थे. हालांकि, एक कारण ये भी था कि इनके पिता की महफिल बड़े वाले विद्वानों के साथ जमती थी.

थोड़ी-बहुत पढ़ाई हो गई, तो पिता ने लालदास को फारसी की तालीम दिलाने का फैसला किया. उन दिनों फारसी हायर एजुकेशन भाषा थी. ये समझ लीजिए कि जैसे आज इंग्लिश है, वैसे ही तब फारसी थी. तो एक मौलवी साहब तय हुए, जिन्होंने चार साल में लालदास ने फारसी में महारत हासिल की. वो फारसी लिटरेचर और पोएट्री में भी पक्के हो गए. फिरदौसी, रुदकी और खय्याम… सब पढ़ गए.

लाल दास की लिखी फारसी कविता

मौलवी साहब भी लालदास के जहीन को देखकर गिल्ल थे एकदम, तो उनके पिता से कहा, “बाबूजी, इस बच्चे को अगर आप अंग्रेजी की तालीम दिलवा दें, तो बेशक ये कमाल कर दिखलाता.” पिता ने जवाब दिया, “मौलवी साहब, ये मेरा बड़ा लड़का है. इसी के हाथ से मुझे जल-पिंड लेना है. इसे अंग्रेजी पढ़वाऊंगा, तो निसंदेह ये अपने कुल का धर्म-कर्म छोड़ देगा. इसी वजह से मैं इसे सिर्फ संस्कृत ही पढ़वाऊंगा.” इसके बाद लालदास संस्कृत की तरफ कूच कर गए.

यहां से आया था सीता पर रामायण लिखने का आइडिया

लालदास को संस्कृत पढ़ाई थी बच्चा झा ने. ये भी अपने सेगमेंट के बाबा थे. लालदास भी संस्कृत के लिए मुहाए हुए थे. वाल्मीकि रामायण और दुर्गा शप्तसती जैसी तमाम चीजें पढ़ीं. संस्कृत के विद्वानों से भी मुखातिब होते थे. इसी बीच जनकपुर में उनकी मुलाकात कुछ ऐसे साधुओं से हुई, जिनके साथ उनकी सीता पर बहस हुई.

बहस ऐसी थी कि लालदास को सीता पर आधारित रामायण लिखने का आइडिया आया. आइडिया मिलते ही लालदास रिसर्च में लग गए. सीता के बारे में खोज-खोजकर जानकारी निकाली. जनकपुर के साधुओं के साथ भारत-भ्रमण किया.

और इस तरह चूड़ामणि बन गए लालदास

सालभर घूमने के बाद लालदास घर लौट आए. वापस आकर इनके लक्षण ऐसे हो गए थे कि घरवालों को लगा कि ये ब्रह्मचारी हो जाएंगे. उन्होंने 14 साल की उम्र में लालदास की शादी करा दी. पत्नी सुकन्या आई, तो उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई. घर चलाने के लिए दरभंगा महाराज के यहां मुहाफीज दफ्तर में नौकरी कर ली.

दरबार वालों को उनकी प्रतिभा का अंदाजा हीं था, लेकिन थोड़े ही दिनों में लालदास का हुनर पूरे राज दरबार में दिखने लगा. लोग उनके बारे में बातें करते थे. दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह ने खुद उन्हें दरबार में बुलाकर उनसे वेदों और ग्रंथों पर बात की. सवाल पूछे. लालदास ने राजा को जवाब दिए.

लालदास से खुश दरभंगा महाराज ने उन्हें एक इज्जतदार पेशकार का पद दिया. यही घटना थी, जिसने उन्हें ‘लालदास’ नाम दिया. इससे पहले तक वो चूड़ामणि थे. महाराज की लालदस से इसलिए भी ज्यादा बनती थी, क्योंकि दोनों की उम्र लगभग बराबर थी.

फारसी जानने वाला संस्कृत का कवि, जो तांत्रिक भी था

जब महराज रामेश्वर सिंह भागलपुर में मैजिस्ट्रेट बने, तो लालदास को भी साथ ले आए. भागलपुर आने तक लालदास को मौलवी साहब की अंग्रेजी पढ़ने वाली बातें याद थीं. वहां वे एक अंग्रेज अधिकारी से अंग्रेजी सीखी भी. जब महाराज मैजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देकर राजनगर के अपने महल में रहने लगे, तो लालदास भी उनके साथ लौट गए.

लाल दास द्वारा लिखे गए रामायण का एक पन्ना

राजनगर में महाराज कवि-सम्मेलन भी कराते थे. ये आयोजन देखकर लालदास फिर कविता लिखने लगे. अपनी पहली रचना “मिथिला महात्म्य” लिखते समय उनकी उम्र 22 साल थी. हिंदी की ये रचना सीता की शक्ति पर लिखी गई है. इसके बाद लालदास ने मैथिली में “रामेश्वर चरित मिथिला रामायण” लिखी. संस्कृत में “चंडीचरित” लिखी और फारसी में काव्य “तश्दीद” लिखी. “तश्दीद” में वेदों और तंत्रों का जिक्र है.

“तश्दीद” का एक पन्ना

लालदास के लिखने का सिलसिला ताउम्र चलता रहा. राजनगर में रहने के दौरान ही उन्हें महाराज के साथ कामख्या और बंगाल की यात्रा की. कामख्या में उन्होंने तंत्र-विद्या के बारे में जाना. लालदास खुद जाने-माने तांत्रिक थे. उनकी किताबों के कवर और पांडुलिपि के पन्नों के बीच मिथिला चित्रकारी (मिथिला पेंटिंग या मधुबनी पेंटिंग, जो मिथिलांचल के घरों की दीवारों पर देखने को मिलती है) मिलती है.

लाल दास के द्वारा बनाया गया चित्रकारी

पिता का शव रखा था और पैर की उंगली डोलने लगी

तंत्र विद्या में एक्सपर्ट होने के बाद ज्यादातर पूजा में लगे रहते थे. लालदास जब 32 के थे, तो पिता की तबीयत ज्यादा खराब हो गई. लालदास बड़े बेटे थे, तो पिता उन्हीं को याद करते थे. जब उन्हें लगा कि जाने का वक्त आ गया, ततो वो ‘बच्चा-बच्चा..’ पुकारने लगे. आधी रात में लालदास को इसकी खबर देने के लिए एक आदमी भेजा गया.

खबर मिलते ही लालदास गांव के लिए निकले. रात दो बजे तक पहुंचे, लेकिन इससे पहले ही पिता जा चुके थे. गांव के कुछ लोगों को लगा कि लालदास कहीं घूमने गए होंगे, इसलिए उन्होंने अंतिम-संस्कार की तैयारी शुरू कर दी. लालदास की गैर-मौजूदगी में सबसे छोटे बेटे गौरीशंकर दास (जो बाद में मुख्तार साहब के नाम से मशहूर हुए) से मुखाग्नि की तैयारी होने लगी. तब गौरीशंकर सिर्फ छह साल के थे. पर श्मसान ले जाते समय उनके पिता के पैर की उंगली डोलने लगी.

लोग डरे. असमंजस में पड़ गए. आखिरकार शव चिता पर नहीं रखा गया. दाह-संस्कार रोक दिया गया. घंटेभर तक सब बैठे रहे. इसकी जानकारी भी लालदास को रास्ते में ही मिल गया था. वो सीधे श्मशानपहुंचे. पिता के पैर छूकर प्रणाम किया और फिर पिता के पैर की उंगली डोलना बंद हो गया. दाह-संस्कार लालदास ने ही किया. मिथिलांचल में ये किस्सा बहुत मशहूर है.

पंडित और महाकवि की उपाधि 

लाल दास बोलने की शैली, परम ज्ञान और सौम्यता देखकर दरभंगा महाराज सर रामेश्वर सिंह ने उन्हें सम्मानित किया. और “पंडित” की उपाधि दी. अब वो दरभंगा महाराज के दरबार में पंडित लाल दास के नाम से लोग उन्हें जानने लगे. इसके बाद से उनका मान-सम्मान बढ़ता ही गया. राजकवि, महाकवि जैसे सम्मान मिलता गया. अपने आखिरी समय तक वो राज दरभंगा में कवि और पंडित के रूप में काम करते रहे.

लाल दास को मिले ‘पंडित’ की उपाधि के दस्तावेज

शिक्षा और खास कर नारी शिक्षा में योगदान

उस समय शिक्षा प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नहीं थी. अगर कोई परिवार संपन्न होता भी था. तो अपने बच्चों में से किसी एक को पढ़ाते थे. वो भी बेटे को. बेटियों की शिक्षा नदारद ही थी. लाल दास के साथ भी यही था. उनके पिताजी ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया. और छोटे भाइयों को लाल दास ने पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया. इसी का नतीजा था कि उनके छोटे भाईयों में बुन्नी लाल दस संस्कृत के, नन्नू लाल दास हिंदी के, सुंदर लाल दास फारसी के, बच्चे लाल दास उर्दू के और गौरी शंकर दास अंग्रेजी के विद्वान थे. लाल दास ने गांव के सभी लड़कों और लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने गांव एक गुरुकुल की स्थापना की. लाल दास के नहीं होने पर इस गुरुकुल की देख-रेख इनके भाई करते थे. इसी का नतीजा था कि उस पूरे ख़ित्ते में ज्ञान की गंगा बहने लगी.

महा कवि पंडित लाल दास

लाल दास ने नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए “स्त्री धर्म शिक्षा” के नाम से एक कविता संग्रह भी लिखी. ताकि लोगों को नारी शिक्षा की अहमियत का पता चल सके. इस काव्य में उन्होंने कहा है कि शिक्षा ही स्त्री का धर्म है. लाल दास एक ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताएं तीन भाषाओं के पाठ्यक्रम में हैं (फारसी, मैथिली और संस्कृत).

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