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बिहार के एक ऐसे नेता जिन्होंने बदल दी चुनाव की परिभाषा और बन गए जनता के हीरो

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आज 5 नवंबर है। आज से 4 वर्ष पूर्व आज ही के दिन मेरे सिर से पिताजी का साया उठ गया था। मेरे पिताजी श्रद्धेय मुनीश्वर प्रसाद सिंह, स्वतंत्रता सेनानी, विधायक और बिहार सरकार के मंत्री रहे। समाजवाद के प्रखर नेतृत्व में उनका नाम शुमार होता था।

राजनीति का ककहरा उनके सानिध्य में सीखा। यों तो उनके बारे में लिखना शुरू करूँ तो एक ग्रंथ तैयार हो जाए।

परंतु आज के मौजूदा राजनैतिक परिवेश में जहाँ सुप्रीमो संस्कृति हावी है और चरण वंदना और बूट पॉलिश के द्वारा विधायिका में जगह बनाने की होड़ लगी है उस स्थिति में जनता से सीधा जुड़ाव किसी भी लहर में आपको सफल बना सकती है इसकी मिसाल सन 1990 के विधानसभा चुनाव में मेरे पिताजी ने साबित किया था, का उल्लेख करना उचित होगा।

सन 90 के विधानसभा चुनाव में बिहार के मूर्धन्य समाजवादियों को साजिश के तहत जनता दल के टिकट से वंचित कर दिया गया। मुनीश्वर बाबू को उनके परंपरागत सीट “महनार” से न लड़कर “गायघाट” से लड़ने को कहा गया। महनार जिनकी आत्मा थी, उसे छोड़ना गवारा नहीं करते हुए उन्होंने दल से त्यागपत्र देकर सोशलिस्ट पार्टी(लोहिया) जैसे अनाम पार्टी से चुनाव लड़ा। जनता दल की लहर थी। वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे। मुनीश्वर बाबू के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए वी पी सिंह, रामसुन्दर दास, रामविलास पासवान ने महनार का दौरा किया। लालू प्रसाद जी ने तो कई बार महनार का दौरा किया।

प्रशासनिक रूप से भी उन्हें हराने की तमाम कोशिशें की गई। मतगणना में जब वे करीब 900 मतों से जीत रहे थे तब उनके पक्ष में 8 बूथों पर 90% से अधिक मतदान की बात कर पुनः मतदान कराया गया। पुनर्मतदान में पुनः मतदाताओं ने 95% से अधिक मतदान कर मुनीश्वर बाबू को करीब 1700 मतों से विजयी बनाया।

इस तरह तमाम प्रशासनिक, राजनैतिक साजिश को महनार के लोगों ने नकार दिया और अपने प्रिय नेता को जीत दिलाकर ये साबित कर दिया कि अगर कोई जनता के दिल में घर बना ले तो कोई भी उसके मान पर आंच नहीं पहुंचा सकता। इस चुनाव की एक और विशेषता थी। तत्कालीन महनार विधानसभा क्षेत्र में तीन प्रखंड- देसरी, सहदेई बुज़ुर्ग और महनार थे। सहदेई बुज़ुर्ग और देसरी में मात्र 3,000 मत मुनीश्वर बाबू को मिले, परंतु अकेले महनार प्रखंड ने 33,000 मत देकर मुनीश्वर बाबू को विजयी बनाया। मुनीश्वर बाबू के उक्त चुनाव का खर्च भी ₹50,000 से कम ही था।

यह सब उनके जनता से सीधे जुड़ाव का नतीजा था। आज के नेताओं को इनसे सीख लेते हुए गणेश परिक्रमा की जगह जनता से जुड़ना चाहिए। जन-जुड़ाव ही सही नेता बनाता है। महान महिषी को उनके चतुर्थ पुण्यतिथि पर अपनी श्रद्धा निवेदित करता हूँ।

डॉ अजेय कुमार,

राज्याध्यक्ष,

समाजवादी जनता पार्टी (चंद्रशेखर),

बिहार,

[लेखक मुनीश्वर बाबू के ज्येष्ठ पुत्र हैं]

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