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बिहार में भयावह हुए AIDS के आंकड़े, बीमारी के पहले भेदभाव से मर रहे मरीज

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एड्स (एक्वाीयर्ड इम्यूवन डेफिसिएंसी सिंड्रोम) से बचाव संभव है, लेकिन रोग हो जाने के बाद मौत तय है। इस बीमारी में मौत तो बाद में आती है, सामाजिक भेदभाव पहले तोड़ता है। मरीज का पूरा परिवार इसका शिकार होता है। समस्या का गंभीर पहलू यह है कि अस्पातालों तक में भेदभाव के उदाहरण हैं। सरकार ने एड्स पीडि़तों के लिए कानून तो बना दिए हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि उनके हितों की रक्षा करे तो कौन और कैसे?

बिहार के पूर्वी चंपारण जिला अंतर्गत केसरिया की रहने वाली रागिनी (काल्पनिक नाम) एचआइवी (ह्यूमन इम्यूकन डेफिसिएंसी वायरस) पॉजेटिव हैं। फिलहाल एड्स नहीं, लेकिन तबियत खराब रहती है। रागिनी को यह ‘सौगात’ लुधियाना में मजदूरी कर लौटे पति से मिली। संक्रमण की जानकारी होने के बाद परिवार व समाज ने दंपती से किनारा कर लिया है। निराश रागिनी कहती है, ”भगवान ऐसी मौत किसी को न दे, जिसमें कंधा
देने वाले रहेंगे या नहीं, इसे लेकर भी संशय हो।”

पटना के असलम (काल्पकनिक नाम) को एक निजी अस्पताल में सर्जरी के दौरान ब्लड की जरूरत हुई। परिजनों ने किसी दलाल के माध्यम से इसका जुगाड़ किया। करीब 10 साल पहले की इस ‘गलती’ का खामियाजा आज असलम भुगत रहे हैं। शुरूआती दौर में एचआइवी संक्रमण का पता नहीं चला। अब एड्स की अंतिम अवस्था में मौत के दिन गिन रहे असलम को अपनी नहीं, उनके कारण समाज में अछूत बन गए परिवार की चिंता है। कहते हैं, बिना किसी गलती के बीमारी हो गई, लेकिन समाज नहीं मानता।

दरअसल, रागिनी और असलम बिहार में एचआइवी संक्रमित व एड्स पीडि़त लोगों व उनके परिवारों की व्यथा के दो उदाहरण मात्र हैं। विभिन्न कारणों से एचआइवी संक्रमण व उसके बाद एड्स, फिर मौत तक के सफर के बीच जो बीतती है, उसे बयां नहीं किया जा सकता। बीमारी की मौत तो बाद में आती है, इसके पहले मरीज व परिजन हर दिन घुट-घुटकर मरते हैं।

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