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बेटों से ज्यादा लोगों ने बेटियों को लिया गोद

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मैं गौरव हूं. मैं सम्मान हूं .मैं भी इनसान हूं. मैं भविष्य हूं. मैं ही वर्तमान हूं. मैं हूं बेटी. बेटियां अब बोझ नहीं लक्ष्मी की प्रतीक हैं. ताजा आंकड़े तो कम-से-कम यही कहते हैं. जी हां, गोद लिये गये बच्चों के अांकड़ों को देखा जाय, तो यह बात सच साबित होती है. सूबे में बीते छह वर्षों में सबसे अधिक 235 बेटियां गोद ली गयी हैं.
समाज कल्याण विभाग के राज्य दत्तक संसाधन प्राधिकरण केंद्र के जरिये छह वर्षों में 324 बच्चे गोद लिये गये हैं. इनमें बेटियों की संख्या सबसे अधिक 235 और बेटों की संख्या 89 है. इनमें 10 बेटियां विदेशी दंपत्ति द्वारा गोद ली गयी हैं. आंकड़े बताते हैं कि बेटियां बोझ नहीं हैं. वे भी गौरव और सम्मान की हकदार हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से देश भर में राज्य दत्तक संसाधन प्राधिकरण की व्यवस्था की गयी है. इसके तहत बिहार भर में कुल 21 गोद लेनेवाली एजेंसियां कार्य कर रही हैं.
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बच्चे सामाजिक बीमा के रूप में नहीं, दिल से जुड़े हैं : समाज शास्त्री डॉ रेणु रंजन के अनुसार पहले जहां माता-पिता बच्चों को सामाजिक बीमा के रूप में देखते थे. वहीं, अब यह सोच बदल चुकी है. बुढ़ापे में न तो उनके साथ बेटे रहते हैं और न ही बेटियां. लेकिन बेटों की तुलना में बेटियों के साथ इमोशनल अटैचमेंट अधिक होने से वह उनके दिल के करीब होती है. यही कारण है कि अब लोग बेटियों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. बच्चे अब सामाजिक बीमा के रूप में नहीं भावनात्मक सपोर्ट का रूप ले चुके हैं.

महिला चरखा समिति की मंत्री मृदुला प्रकाश कहती हैं कि लोग लड़कियों को अधिक पसंद कर रहे हैं या फिर लड़कियों को छोड़ रहे हैं. यह समझने की बात है. हमारा समाज आज भी दोराहे पर खड़ा है. कुछ पितृसत्तात्मक सोच के तले दबे हुए हैं, कुछ बाहर निकल चुके हैं. पर, अब भी बेटियां दुत्कारी जाती हैं. वैसी महिलाएं जो बेटा और बेटी की सोच से ऊपर उठ चुकी हैं, वे बेटियों को गोद लें रही हैं.
सोच में आया बदलाव 
एजेंसी में बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या अधिक होती है. लेकिन पहले जहां दंपती बेटों को ही गोद लेना चाहते थे. अब वे बेटियों को पसंद कर रहे हैं. उनकी सोच में बदलाव आया है.
ब्रजेश कुमार , कार्यक्रम प्रबंधक, राज्य दत्तक संसाधन प्राधिकरण
यह आर्टिकल हमें अनुपम कुमारी ने भेजा है

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