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भारतीय संस्कृति में गंगा—जमुनी तहजीब की मिसाल है पटना का छठ

यह लेख हमें अमित सिंह ने ईमेल के माध्यम से भेजा

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पटना में एक सड़क है, वीर चंद पटेल पथ. आर ब्लॉक स्थित 1857 की क्रांति के नायक वीर कुंवर सिंह की अश्वारोही प्रतिमा से लेकर इनकम टैक्स गोलम्बर स्थित संपूर्ण क्रांति के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण की प्रतिमा के बीच का रास्ता वीर चंद पटेल पथ कहलाता है.

इस रास्ते में चाणक्य, कौटिल्य और अशोक जैसे होटल हैं तो महालेखाकार कार्यालय और आयकर कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण ऑफिस भी हैं. देवीपद चौधरी (मिलर स्कूल) विद्यालय है तो पटना परिसदन और पटना क्लब जैसे ठिकाने भी हैं. अपनी बदहाली पर आंसू बहाता सुलतान पैलेस जैसी शानदार इमारत है तो हाई कोर्ट और गार्डिनर हॉस्पिटल भी हैं. कांग्रेस को छोड़ प्रदेश में सक्रिय तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों के कार्यालय भी इसी पथ पर हैं. सत्ता पक्ष है, विपक्ष है, जहिर है राजनीतिक गहमागहमी का प्रमुख केंद्र है यह पथ. लेकिन इन दिनों यह पथ किसी दूसरे कारण से आकर्षण और गहमागहमी का केंद्र बना हुआ है.

यहां अभी चूल्हे बिक रहे हैं. जी हां, चूल्हे, मिट्टी के बने चूल्हे. लोक आस्था के महान पर्व छठ को ध्यान में रखकर करीब दो माह पहले से यहां चूल्हे बनाये जा रहे हैं. चूल्हे महिलाएं ही बनाती हैं. आधुनिकता में आकंठ डूबे परिवारों में भी छठ के पकवान और प्रसाद मिट्टी के चूल्हों और लकड़ी के आंच पर पकाए जाते हैं. ठेकुआ, खजूर, पिडुकिया और भी न जाने क्या क्या. आपको बता दें कि तकनीकी क्रांति के इस युग में तमाम सुविधाओं वाले एलपीजी स्टोव, इंडक्शन और माइक्रोवेव उपलब्ध हैं लेकिन चार दिवसीय छठ अनुष्ठान में जब प्रसाद और पकवान बनाना हो तो वह मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी के आंच पर ही तैयार किया जाता है.

प्रथम अनुष्ठान नहाय—खाय के दिन कद्दू की सब्जी बनाई जाती है. बता दें कि बिहार में कद्दू और लौकी वही है जो दिल्ली में घीया है. और जो दिल्ली मे सीताफल और कानपुर में कद्दू है वह बिहार में कदीमा है. नहाय खाय को कदुआ—भात भी कहा जाता है कई जगहों पर. फिर खरना का प्रसाद बनता है. इसमें गुड़ वाली या चीनी वाली खीर बनती है और रोटी बनाई जाती है. कई लोग घर में बनाते हैं तो कई छठ घाट पर ही बनाते हैं. बनाया जाए कहीं भी लेकिन बनाया जाता है मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी के आंच पर ही. चाहे कोई अपने घर पर छठ मना रहा हो या छठ घाट या गंगा नदी के तट पर मना रहा हो, चूल्हा तो मिट्टी का ही बना होता है.

वीर चंद पटेल पथ पर पिछली कुछ दिनों से चूल्हों का बाजार सजा हुआ है. यहां हजारों की तादाद में मिट्टी के चूल्हे आपका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करेंगे. सड़क के दोनों और रोड के डिवाइडर पर मिट्टी के चूल्हे सजाकर रखे हुए हैं. दो माह से यह चूल्हे का मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट था और अब शो रूम है. और अब तो बिक्री समाप्ति की और है. करीब 20 मुस्लिम परिवार दुर्गापूजा के पहले से चूल्हा बनाने की तैयारी शुरू कर देते हैं. हिंदुओं के त्यौहार में मुस्लिमों के योगदान के कुछेक उदाहरणों में से एक यह भी है. धार्मिक सहिष्णुता, सांप्रदायिक सौहार्द्र और सामाजिक समरसता की सुंदर मिसाल है यह. और भारतीय संस्कृति में ‘ढाई सौ ग्राम’ गंगा—जमुनी तहज़ीब की तलाश का तंज़ कसने वालों को करारा जवाब भी है.

यहां महजबीं मिलती हैं. चूल्हे बनाने के लिए मिट्टी पाथने के काम में मशगूल हैं. बताती हैं कि अब मिट्टी यहां नहीं मिलता है. देहात से मंगाना पड़ता है. कीमत उसे पता नहीं है. कहती हैं, अम्मी को पता होगा. मो़. जमील चूल्हों को सहेजने में व्यस्त दिखे. दरअसल बिक्री शुरू हो चुकी है. बताते हैं कि अब सबकुछ बहुत महंगा हो गया है. मिट्टी भी, भूसा भी. बताते हैं एक ट्रैक्टर ट्रेलर मिट्टी की कीमत अब 1000 रुपये की आती है. काफी पहले से तैयारी शुरू कर देनी पड़ती है. इस बीच मौसम के कई बदलाव से गुजरना पड़ता है. गर्मी तो फिर भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन बारिश से काफी नुकसान हो जाता है. प्लास्टिक और राजनीतिक दलों के रैलियों के ‘रिटायर्ड और आउटडेटेड’ हो चुके फ्लैक्स, बैनर आदि भी उपयोग में ले आते हैं. बहुत बचाने के बाद भी थोड़ा—बहुत नुकसान तो हो ही जाता है.

मैं वहां मौजूद एक ग्राहक से जानना चाहता हूं कि जब आपको पता चलता है कि ये मुस्लिम हैं तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है? वह कहते हैं भारतीय संस्कृति की यही तो खसियत है. पूजन सामग्री डोम परिवार से आता है. अगरबत्तियां मुसहर बनाते हैं गया में. यहां प्रसादभी मुस्लिम बेचते हैं. और यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारे मुस्लिम भाई सुल्तानगंज और सिटी इलाकों में घाटों की सफाई भी करते हैं.

भेदभाव या घृणा के लिए भारतीय संस्कृति में कोई जगह नहीं है. वहीं मौजूद महजबीं कहती हैं कि चूल्हे के बनाने में पूरी तरह से नियम और साफ—सफाई का पालन किया जाता है. क्योंकि त्योहार किसी भी धर्म का हो वह आस्था और विश्वास की चीज है और इसका हम सभी सम्मान करते हैं और सभी को सम्मान करना चाहिए. वाकई इन्होंने बहुत सही बात कही. यही भावना तो भारत को एकसूत्र में पिरोने का काम करती है.

यहां चूल्हा बनाने वाले तमाम लोग साल के अन्य दिनों में पुराने कपड़ों के बदले स्टील के बर्तन की अदला—बदली करते हैं और स्टील के बर्तन बेचने का काम भी करते हैं. मैं पूछता हूं एक चूल्हा कितने में बिक जाता है? जमील बहुत बेबाकी से बोलते हैं. जैसा कस्टमर वैसी कीमत. कोई फिक्स प्राइस नहीं है. 100 रुपये 80 या 60 रुपये जितना मिल जाए बेच लेते हैं. डिमांड ज्यादा है तो 100 रुपये में बिक जाता है. माल बहुत बच रहा है तो 25-30 रुपये में भी निकाल देते हैं. आखिर बचाकर तो इसे रखा नहीं जा सकता है. वाकई, दरअसल दो दिन ही तो इसके मेगा सेल का समय है. फिर तो एलपीजी, इंडक्शन के जमाने में मिट्टी के चूल्हे को कौन पूछता है.

मैं पूछता हूं कि कितना चूल्हा बनाए हैं इसबार?  बताते हैं 200 के करीब है. और इतना बेच लेने के बाद कितना बचा लेंगे? वह कहते हैं 7-8 हजार तो बच ही जाएगा. उनकी बातों में संतोष झलकता है. लेकिन सोचने वाली बात है कि दो माह के हाड़तोड़ मेहनत के बाद सिर्फ 7 से 8 हजार रुपये की कमाई. यह ज्यादा बिल्कुल नहीं है. छठ माई इन मेहनतकशों पर भी कृपा करें और इस मिट्टी की सौहार्द्र को इसी तरह सुवासित करते रहें.

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