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महिलाओं के अंडरगारमेंट को महज ‘कपड़ा’ समझिए जनाब!

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“भजनपुरा के पास के इलाके में किसी दोपहर घूमने चला गया. हर घर में ब्रा बन रहा था. पहली बार मर्द हाथों को ब्रा बनाते देखा. थान-थान ब्रा को बनते देखना भीतर से बाहर आने जैसा था. ऐसा घबराया कि नजर बचाकर भागने जैसा लौटने लगा. कई दिनों बाद उन्हीं गलियों में दोबारा लौटकर गया. हमने पतंग का मांझा बनते देखा था, जमशेदपुर के टाटा स्टील प्लांट में स्टील बनते देखा था. ब्रा भी बनता है पहली बार देखा. सबको ब्रा बनते देखना चाहिए. किशोर उम्र के बहुत से लोग कपड़े में जिस्म देखा करते थे. कपड़े को कपड़ा समझने के लिए उसे बनते देखना जरूरी है….”

-रवीश कुमार (इश्क में शहर होना की भूमिका में)

रवीश कुमार का ये तजुर्बा बहुत कुछ बिलकुल सटीक ढंग से कह जाता है, सिवाय एक बात के, कपड़े में जिस्म देखने की आदत सिर्फ किशोरों तक नहीं रहती. लोगों को उम्र के आखिरी पड़ाव तक कपड़ों में बहुत कुछ दिखता है. पाकिस्तान के कुछ लोगों की बात करें तो उन्हें ब्रा के हुक के बीच फंसा हुआ मजहब भी दिख गया.

 

पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वाह इलाके के बनेर जिले में पुलिस ने 14 दुकानदारों को गिरफ्तार कर लिया. इनका जुर्म इतना था कि ये लोग खुले में महिलाओं के अंतःवस्त्र बेच रहे थे. एक्सप्रेस ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक इन लोगों को पीर बाबा मोसोलम की मजार के पास ब्रा, पैंटी और दूसरे अंतःवस्त्र बेचने के लिए गिरफ्तार किया गया है.

इलाके के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की मानें तो ये लोग खुले में महिलाओं के कपड़े बेच रहे थे और उन्हें दुकान पर बुलाने के लिए आवाज भी लगा रहे थे. ऐसा करना संस्कृति और धर्म के खिलाफ है. इसीलिए इन लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

हिंदुस्तान के लोगों को ये खबर पढ़कर थोड़ा अजीब लग सकता है. कुछ लोग पाकिस्तान की जाहिलपन पर हंस भी सकते हैं. वैसे भी हिंदुस्तान के लगभग हर छोटे शहर के किसी भी धार्मिक मेले में तमाम अंडरगार्मेंट्स के स्टॉल लगे मिल जाएंगे, जिनमें ब्रा के बड़े-बड़े ढेर लगे दिखाई देते हैं. लेकिन क्या सच में ऐसा इसलिए होता है कि हमारा समाज महिलाओं के अंतःवस्त्रों को सिर्फ एक कपड़े की तरह देखता है.

नहीं, क्योंकि मंदिरों के पास इन स्टॉल के लगने की एक ही वजह है. छोटे कस्बों, गांवों में हर दुकानदार जानपहचान का होता है. किसके घर की बहू, लड़की खरीददारी करने आई सबको पता रहता है. ऐसे में मेलों और अनजान स्टॉल्स ही वो ऑप्शन होता है, जहां से महिलाएं बिना झिझक अपनी जरूरत की खरीददारी कर सकती हैं.

क्यों अंडरगार्मेंट्स सिर्फ एक कपड़ा नहीं है 

ब्रा और पैंटी को महज कपड़ा न समझने की इस सोच का कारण शायद ये है कि कपड़ों का ये टुकड़ा महिलाओं के उस अंग से जुड़ा है जो तमाम तरह की वर्जित कल्पनाओं का हिस्सा बनता है. तभी तो जापान जैसे देश में कम उम्र की लड़कियों की इस्तेमाल की हुई लॉन्जरी भी महंगे दामों में बिकती है. इनको खरीदने वाले मर्द होते हैं. जो ‘ये उसने वहां पहन रखा होगा’ जैसी कल्पना करके ही संतुष्ट हो जाते हैं.

सिर्फ पुरुष ही क्यों, इस सोच के दायरे में खुद महिलाएं भी आती हैं. पारिवारिक समारोह में किसी लड़की की ब्रा की स्ट्रैप दिख जाना तो तमाम चाचियों और बुआओं के लिए तानों और कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी करने का मैटेरियल बन सकता है. वहीं हॉस्टल और पीजी में खुले में अंडरगार्मेंट सुखाना भी अक्सर वॉर्डन या मकान मालिक से चेतावनी पाने का कारण होता है.

इन सब बातों का कुल जमा यही है कि लड़की के शरीर से जुड़ी हुई हर चीज अश्लील हो जाती है. मेडिकल स्टोर पर बिकने वाला सैनिटरी पैड अश्लील हो जाता है. रोजमर्रा के कपड़े अश्लील हो जाते हैं. मेट्रो के सीसीटीवी में किसी लड़की का लड़के को छूना अश्लील हरकत हो जाता है और तो और पार्क जैसी जगहों पर पास बैठकर बात करना भी अश्लील हो जाता है.

श्लील और अश्लील की इस बहस में एक बात खास तौर पर पुरुषों को याद रखनी चाहिए. एक महिला के लिए ब्रा पहने रहना कोई आरामदेह अनुभव नहीं है लेकिन समाज में सभ्य तरीके से बाहर निकलने के लिए इसे पहनना भी जरूरी है. आप खुद सोचिए अगर आपके शरीर पर कुछ ऐसा कसा रहे जिसमें ढेर सारे तार और हुक हों तो आप कितना सहज रहेंगे. इसलिए अगली बार महिलाओं के अंतःवस्त्र कहीं दिख जाएं तो हड़बड़ाइएगा मत. उसे उतनी ही तवज्जो दीजिएगा जितनी कपड़े के किसी और टुकड़े को देते हैं, न ज्यादा न कम.

यह लेख निधि ने हमें लिख भेजा है अगर आप भी लिखना चाहते हैं तो yesimbihari@gmail.com पर लिख भेजिए 

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