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मोकामा के मरांची गांव से खबर है. मैदान नहीं है फिर भी, बेटियां भर रहीं हौसलों की उड़ान

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मोकामा के मरांची गांव ने एशियाड चैम्पियन गोल्डेन गर्ल स्मिता के तौर पर जब कबड्डी की होनहार खिलाड़ी को पैदा किया तब इलाके की कई लड़कियों के मन में कबड्डी खेल के प्रति लालसा जगी. दरियापुर पंचायत की कई लड़कियां कबड्डी खेलकर हौसलों की उड़ान के सहारे आसमान छूना चाहती हैं. सुखद बात यह है कि चार-पांच लड़कियां राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं. टी-शर्ट और हाफ पैंट पहनकर गांव की ये बेटियां जब कुलांचे भरती हैं तो हर कोई आह्लादित हो उठता है.

अफसोस इस बात का है कि दरियापुर, हाथीदह, महेन्द्रपुर की बेटियां भले ही हौसलों की उड़ान के सहारे आसमान छूना चाहती हैं, पर एक अदद मैदान को तरस रही हैं. महिला कबड्डी की नई नर्सरी के तौर पर उभर रहे दरियापुर की लड़कियां कभी खेत में कबड्डी खेलती हैं, कभी चिमनी भट्ठियों पर तो कभी गंगा नदी की रेत पर, बिल्कुल यायावरों-घुमन्तुओं की तरह.

दो दर्जन लड़कियां तमाम बाधाओं-सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़कर कबड्डी खेलकर अपने मां-बाप और इलाके का नाम रौशन करना चाहती हैं, पर इन्हें एक अदद मैदान और एक चेन्ज रूम की तलाश है. ऐसा नहीं है कि लड़कियों की राह बहुत आसान थी. सर्वाधिक परेशानी अल्पसंख्यक समुदाय की बच्चियों को हुई थी. फरीदा खातून और मो. इलियास की तीन बेटियां शमा परवीन, हीना परवीन और रेशमी कबड्डी खेलती हैं. इनको देखकर कई लड़कियां आगे आ गईं. परदा प्रथा पीछे छूट गई.

कोच इलियास बताते हैं कि साल में दस बार मैदान बदलना पड़ता था. दरियापुर की गैरमजरूआ जमीन पर लड़कियों का कला-कौशल उफान मारने लगा. जमीन चूंकि सरकारी थी इसलिए लड़कियों को लगा कि अब हटाने के लिए कोई नहीं आएगा. हालांकि मुखिया की नजर टेढ़ी हो गई और मुखिया के इशारे पर लोगों ने यह कह कर बेटियों को प्रताड़ित किया कि लड़कियां निकली जा रही हैं. समाज के ताने और अपमान को सुनकर भी कबड्डी के प्रति इनकी ललक बरकरार है. कबड्डी खेलने वाली लड़कियों की ओर सरकार की नजरे इनायत तो बिल्कुल नहीं हैं और समाज भी बढ़ावा देने के लिए आगे नहीं आता. लड़कियां को यह असमानता खलती है.

कबड्डी खेलने वाली लड़कियां कहती हैं-मैदान नहीं है, चेन्ज रूम नहीं. खुले में कभी-कभी घेरा बनाकर कपड़े बदलने पड़ते हैं तो लड़के सीटी बजाते हैं. लड़कियांं ने आगे भी कई बातें झिझकते हुए कहीं जिसे हम हू-ब-हू प्रकाशित नहीं कर सकते. सरकार के साथ-साथ समाज का भी यह दायित्व बनता है कि वह इन लड़कियों के हौसलों को परवान दे. कबड्डी खेलने वाली लड़कियां सेन्ट्रल लाइन (पहली पंक्ति) से निकलकर बट लाइन (दूसरी पंक्ति) में पहुंच चुकी हैं. इनके हौंसले बताते हैं कि ये कैरियर के बोनस लाइन में प्रवेश करने को आतुर हैं.

समाज और सरकार से इनकी इतनी गुजारिश है कि इन्हें कैरियर के डेड लाइन में न जाने दिया जाए. यदि ऐसा हुआ तो हौसले टूट जाएंगे. अरमान बिखर जाएंगे. स्वप्निल कैरियर अवरूद्ध हो जाएगा. ऐसा कुछ हुआ तो समाज को भी नुकसान होगा. समाज इन बच्चियों के भविष्य के लिए कुछ तो उदारता दिखाए ताकि हौंसलों की उड़ान को आसमान छूने के लिए मैदान मिल जाए.

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