THE BIHARI

यह बिहारी बनना चाहता है आनंद सर जैसा, कहता है- आनंद सर अकेले पड़ जाते हैं। वह कितने बच्चों को सहारा दें?

हंजला कहते हैं, आनंद सर अकेले पड़ जाते हैं। वह कितने बच्चों को सहारा दें? इसके लिए कई लोगों को आनंद कुमार बनना होगा। यह शुरुआत शायद हंजला शफी से ही हो।

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यह जीत है हिम्मत-हौसले और प्रण की, इस साल हंजला को डिग्री और शानदार जॉब मिल गई। आठ साल जूते-चप्पल की दुकान में काम करते हुए फरहाद को इस पेशे से लगाव हो गया तो कुछ दिन पहले हंजला ने बेगूसराय में उनकी अपनी दुकान खुलवा दी। उसकी पढ़ाई के लिए याश्मीन ने जो गृहस्थी बेच दी थी, वह भगवान के दूत ने तमाम दूसरी खुशियों के साथ वापस ला दी। अब सबकी आंखों में कोई न कोई सपना है। मां उसकी शादी का सपना देख रही हैं तो हंजला अपने परिवार के लिए बड़े मकान का।

दोनों भाई एक ऐसी कोचिंग स्थापित करने का भी सपना देख रहे, जहां से उनके जैसे साधनहीन बच्चों को उनकी मंजिल दिखाई जा सके। हंजला कहते हैं, आनंद सर अकेले पड़ जाते हैं। वह कितने बच्चों को सहारा दें? इसके लिए कई लोगों को आनंद कुमार बनना होगा। यह शुरुआत शायद हंजला शफी से ही हो।

एेसी है हंजला की कहानी

हंजला की यह कहानी पढ़ने के बाद शायद ही कोई मां-बाप अपने बच्चों को आर्थिक लाचारी के नाम पर शिक्षा से वंचित करेंगे। बेगूसराय के फरहाद-याश्मीन अपने छोटे बेटे हंजला शफी की पढ़ाई के लिए गरीबी के पहाड़ से टकरा गए। पाई-पाई को मोहताज बाप ने मजदूरी की, गलियों में फेरी लगाकर कपड़े बेचे।

गन्ने के रस का ठेला लगाया और जूते-चप्पल की दुकान में काम किया। खुद ग्रेजुएट मां ने ट्यूशन भी पढ़ाई। बेटे के फॉर्म और किताबों के लिए गृहस्थी का जरूरी सामान बेच दिया। मां-बाप की जिद के आगे हालात ने घुटने टेक दिए।

कहानी कठिन संघर्ष की

सिर्फ 22 साल का हंजला आइआइटी दिल्ली से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर अब हैदराबाद में एक बड़ी कंपनी में मोटी पगार पर जॉब कर रहा है। मुसीबतों का तूफान शिक्षा के दीये की टिमटिमाहट से परास्त होकर वापस लौट चुका है।

बेगूसराय शहर में टेंट के पुश्तैनी कारोबार से फरहाद शफी का परिवार खुशहाल था, जब जनवरी, 1996 में उनका छोटा बेटा पैदा हुआ। नाम रखा गया, हंजला। इस शब्द का अर्थ होता है, भगवान का दूत। शायद इसी सोच से बच्चे का नामकरण हुआ, पर फरहाद-याश्मीन को इल्म नहीं था कि भगवान अपने इस दूत के जरिए नियामतें लुटाने से पहले उनका ऐसा इम्तिहान लेने जा रहे हैं, जो देखने-सुनने वालों की भी रूह कंपा देगा।

अचानक टेंट का कारोबार घाटा देने लगा। उसे बचाने के लिए परिवार कर्ज के बोझ से दब गया। खाने-पीने के लाले पड़ गए। वजूद बचाने की जिद्दोजहद शुरू हो गई, पर मां-बाप को हंजला और बड़े बेटे तलहा की पढ़ाई जारी रखने की फिक्रलगी थी।

परीक्षा हिम्मत और हौसले की

हंजला बताते हैं कि दोनों भाइयों के पास सिर्फ एक-एक स्कूल यूनीफॉर्म थी जो उन्होंने कई साल पहनी। दोनों के बीच स्वेटर एक ही था। इस वजह से कड़क जाड़े के दिनों में क्रमश: एक ही भाई स्कूल जा पाता था। फीस जमा न होने पर स्कूल से वापस भेज दिया जाता था यद्यपि बाद में बच्चों की मेधा और परिवार के हालात जानकर स्कूल ने फीस माफ कर दी।

बच्चे बड़े हो रहे थे। पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा था। अब फरहाद के सामने लोक-लाज छोड़कर मोर्चा संभालने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने दिहाड़ी मजदूरी करना शुरू कर दिया। फिर गलियों में फेरी लगाकर कपड़े बेचे। बाजार में ठेला लगाकर गन्ने का रस बेचा। इसके बाद 100 रुपए दिहाड़ी पर एक जूते की दुकान में सेल्समैन की नौकरी करने लगे। ऐसे जटिल हालात में हंजला ने 2010 में मैटिक और 2012 में प्लस टू परीक्षा उत्तीर्ण की।

प्रण पक्का तो किस्मत भी देती है साथ

अब दीये और तूफान की जंग तेज हो गई। फरहाद दिन-रात मेहनत करके भी हंजला को आगे पढ़ाने की स्थिति में नहीं थे, पर वह हालात से हारने को भी तैयार नहीं थे। कोलकाता में कोई परीक्षा देकर लौट रहा हंजला पटना में ट्रेन से उतर गया और भटकते हुए आनंद कुमार की सुपर-30 कोचिंग पहुंच गया। फॉर्म भरा। परीक्षा दी और कोचिंग में दाखिला मिल गया।

आनंद कुमार उसकी प्रतिभा को भांप चुके थे, लिहाजा उसे तराशना शुरू कर दिया। हर वक्त सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई। ईद पर भी घर जाने की मोहलत नहीं। ईद कोचिंग में ही मनाई गई। अंतत: 2013 में हंजला को आइआइटी दिल्ली में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला मिल गया।

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