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राजनीतिक मजबूरी के कारण बिहार में बीजेपी ने पकड़ी समाज सुधार की राह

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बिहार में एनडीए सरकार में शामिल जेडीयू और बीजेपी का फोकस अचानक सामाजिक बदलाव की ओर है. विकास और कानून-व्यवस्था के बदले सामाजिक बुराइयों को निशाना बनाया जा रहा है. पहले नीतीश ने दहेज और बाल विवाह के खिलाफ मुहीम का आगाज किया तो अब बीजेपी ने अपनी कार्यकारिणी में जातिवाद खत्म करने का संकल्प पारित किया है.

आज बिहार से जिस जातिवाद को मिटाने की बात हो रही है, उसे बनाए रखने में भी सियासतदानों का ही हाथ है. जातीय अस्मिता के आधार पर बनी राजनीतिक पार्टियां जातिवाद के चूल्हे पर ही अपनी रोटी सेंकती नज़र आती है.

बीजेपी की ही सहयोगी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के मुताबिक अगर उन्हें सरकार बनाने का मौका मिलता तो एक मुख्यमंत्री और दो उप-मुख्यमंत्री की थ्योरी देते. मांझी के मुताबिक एक तीन में से एक मुसलमान, एक अतिपिछड़ा और एक अनुसूचित जाति के लोग होंगे.

बिहार में 200 से अलग-अलग जातियां हैं, जिन्हें इतिहास के अलग-अलग पायदानों पर अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया. जो आखिरी कतार पर थे उनके लिए आरक्षण आया तो था 10 वर्षों के लिए लेकिन 58 साल बाद भी नेता इसे आखिर सांस तक जारी रखने की कसमें खाते हैं. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि बिहार भाजपा अचानक जातिवाद के पीछे क्यों पड़ गई?

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