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राजा रवि वर्मा पुण्यतिथि: भगवान को इंसान की छवि देने वाले ऐसे राजा जिनके पास कोई राजपाट नहीं था

राजा रवि वर्मा ने कैलेंडर पर हिंदू देवी-देवताओं के चित्रों को उकेर कर उन्हें मंदिरो से बाहर निकाल आम लोगों के घरों में पहुंचाया

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पूरी दुनिया में ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करने वालों की संख्या करोड़ों में है. भारतीय धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक ईश्वर से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाओं में विश्वास रखने वाले करोड़ों भारतीयों के मानस पटल पर ईश्वर के स्वरूप की एक छवि भी अंकित है. वह छवि ईश्वर के इंसानी स्वरूप की छवि है. ईश्वर को किसी ने देखा नहीं है लेकिन उनकी स्वरूप की कल्पना उन्हें  इंसान मानकर ही की जाती है.

जरा सोचिए, धनुर्धारी श्रीराम, विष पीने वाले शिवजी और कमल पर विराजमान सरस्वती माता के जिस स्वरूप की आज हम कल्पना करते है आखिरकार वह स्वरूप कहां से निकले हैं?  आखिर वह किसकी ब्रश थी जिसने करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीकों के स्वरूप में ऐसा रंग भर दिया कि उसकी बनाई देवी-देवताओं के पेंटिंग्स हिंदू धर्म और मान्यताओं का अभिन्न हिस्सा बन गईं हैं.

देवी-देवताओं को मंदिरों से बाहर निकाल घरों में पहुंचाया

हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के मंदिरों से निकालकर लोगों के घरों तक में ले जाने का श्रेय राजा रवि वर्मा के नाम पर दर्ज है. 29 अप्रैल 1848 को उस वक्त की त्रावणकोर रियासत में जन्में राजा रवि वर्मा ही वह कलाकार है जिनकी पेंटिंग्स ने हिदुस्तान के करोड़ों लोगों के जीवन पर ऐसा प्रभाव डाला जो कभी नहीं मिटेगा.

वह एक ऐसा दौर था जब हिंदू देवी-देवता बस मंदिरों में ही विराजमान थे. देश की सामाजिक स्थिति ऐसी थी कि मंदिरों में भी एक बहुत बड़े वर्ग को जाने की इजाजत नहीं थी. ऐसे में राजा रवि वर्मा ने हिंदू देवी –देवताओं की पेंटिंग्स को अपने ब्रश से कागज पर इस तरह से उकेरा कि वह घर-घर में पहुंच गए. राजा रवि वर्मा उस वक्त बिना किसी संचार क्रांति के हर घर में मशहूर हो गए.

आधुनिक भारतीय कला के जनक

राजा रवि वर्मा की मां लेखिका थी और उनके पिता आयुर्वेद के जानकार थे. उन्होंने चित्रकारी के गुर अपने चाचा से सीखे थे. इसके बाद त्रावणकोर महाराज के दरबार में पेंटिंग के कलाकार रामास्वामी नायडू से उन्होंने चित्रकारी की शिक्षा ली.  चित्रकारी सीखने के बाद अपने विषय का चुनाव करने के लिए उन्होंने कुछ वक्त लिया. फिर उनकी समझ में आ गया कि पौराणिक कथाएं हिंदुस्तान की आत्मा हैं और इसी विषय पर उन्होंने अपनी चित्रकारी शुरू कर दी.

भारत में उस वक्त ऑयल पेंटिंग एक नई विधा थी. राजा रवि वर्मा ने नेदरलैंड्स के मशहूर चित्रकार थियोडोर जेनसन से ऑयल पेंटिंग्स की कला को सीख कर उसे भारत में मशहूर किया.

हिंदुस्तान में घर–घर में देवी–देवताओं और पौराणिक कथाओं के पात्रों को पहुंचाने के लिए राजा रवि वर्मा ने अपनी खुद की प्रेस भी लगाई. इसके जरिए छपे चित्रों में ईश्वर को भी उन्होंने आम इंसान के रूप में दर्शा कर भारत के आमजनों के घर में पहुंचा दिया.

कई विवादों का किया सामना

कई बार बड़े सामाजिक बदलाव के कारण बनने वालों को समाज के कुछ हिस्से का विरोध भी झेलना पड़ता है. राजा रवि वर्मा भी इसके अपवाद नही थे. उनके द्वारा बनाए गए देवी-देवताओं के चित्रों पर कई पुरातन पंथियों ने सवाल भी उठाए.

उन पर आरोप लगे कि वह अपने चित्रों से मुनाफा कमाने के लिए भारतीय देवियों के अश्लील चित्र बनाकर उनका अपमान कर रहे हैं. उन पर कई मुकद्मे भी चले जिनके चलते उन्हें काफी नुकसान भी उठाना पड़ा. आरोप तो यह भी लगा कि वह सुगंधा नाम की अपनी कथित प्रेमिका की तस्वीर को लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों का रूप प्रदान कर रहे हैं. उनको विरोधियों की दलील थी कि सुगंधा एक वैश्या की बेटी है और वह उसके साथ मिलकर हिंदू धर्म का अपमान कर रहे हैं.

बहरहाल इन तमाम विवादों के बीच भी उनकी कूंची रुकी नहीं. अर्जुन और सुभद्रा, दमयंती-हंसा संभाषण, संगीत सभा,  शकुंतला, रावण द्वारा जटायु वध, इंद्रजीत-विजय, राजा दुष्यंत, नायर जाति की स्त्री, द्रौपदी कीचक, राजा शांतनु और मत्स्यगंधा, और शकुंतला जैसे उनके मशहूर चित्र आज भी अद्वितीय नजर आते हैं.

भारतीय सिनेमा में योगदान

यूं तो राजा रवि वर्मा का भारतीय सिनेमा के साथ सीधा जुड़ाव तो नही रहा लेकिन भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के की उन्होंने जमकर मदद की थी. बड़ौदा में फोटोग्राफी के जरिए अपने करियर की शुरूआत करने वाले दादा साहब फाल्के ने काफी वक्त तक राजा रवि वर्मा की प्रेस में ही नौकरी की थी.

कहा तो यह भी जाता है कि उन्होंने दादा साहब फाल्के के हुनर को पहचान कर अपनी प्रेस को बेच कर उससे मिला पैसा उन्हें ही दे दिया ताकि वह भारत की फिल्मों के इतिहास का आगाज कर सकें.

111 साल पहले आज ही के दिन यानि दो अक्टूबर को 1906 को 58 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. उनकी मौत के करीब सात साल बाद दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाकर देश में सिनेमा की नींव रखी.

भगवान को आम इंसान जैसा बनाने वाले राजा रवि वर्मा के हुनर की कद्र करते हुए ही उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ‘राजा’ की उपाधि दी. यही नहीं 1904 में उस वक्त से सबसे बड़े सम्मान केसर-ए-हिंद से भी उनको नवाजा गया.

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