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लिंगभेद मिटाने साइकिल यात्रा पर निकला एक बिहारी

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बिहार के छपरा का एक 42 वर्षीय आदमी साइकिल पर पूरे देश की सैर कर रहा है। मगर इस सैर में सैर-सपाटा नहीं है, बहुत सारे सवाल हैं। इस आदमी का नाम है राकेश कुमार स‌िंह। साल 2014 में एक लड़की पर हुए एसिड अटैक ने इन सवालों को राकेश के सामने इस तरह लाकर खड़ा किया कि फिर वह जवाब तलाशने इस लंबे सफर पर निकल पड़े। तमिलनाडू, केरल, पांडिचेरी, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में जाकर इन सवालों के जवाब तलाश चुके हैं।

इन दिनों अपने सफर के 11वें राज्य महाराष्ट्र में हैं।दिल्ली और भोपाल जैसे शहरों में रिसर्चर और कॉरपोरेट कम्यूनिकेटर जैसे पदों पर काम कर चुके हैं। उनके सवाल बहुत सरल, लेकिन तीखे हैं। वह पूछते हैं, ‘ बेटी बचाओ का नारा बुलंदी पर है, मगर कोई ये क्यों नहीं बताता क‌ि बेटी को किससे बचाना है? क्या हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब एक बेटी को उसी के मां-बाप से बचाने के ल‌‌िए नारा देने की जरूरत है? यद‌ि देश की आज़ादी के लगभग 70 साल के बाद भी हमारे बीच यही सवाल बाकी हैं, हमें महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के ल‌िए अलग से लड़ना पड़ रहा है, तो फिर हमें इस आजादी पर दोबारा सोचना होगा।’

अलग-अलग राज्यों में स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं से लेकर चाय और पान की दुकानों तक राकेश अपने इन सवालों के साथ पहुंच चुके हैं। उनके साथ सिर्फ उनकी एक साइकिल है। इस साइकिल पर एक बड़ा सा बहुरंगी झंडा है। एक टेंट है, पानी की बोतल है। एक डोनेशन बॉक्स है, एक लैपटॉप है और रोज़मर्रा का कुछ जरूरी सामान। बहुरंगी झंडे के बारे में बताते हैं, ‘यह झंडा मेरी मां ने सिलकर दिया है। इस पर बड़े अक्षरों में लिखा है ‘राइड फॉर जेंडर फ्रीडम’। इस झंडे से मुझे ये सहूलियत होती है क‌ि मैं जहां भी जाता हूं, लोग खुद-ब-खुद मेरे पास बात करने आ जाते हैं।’

अब तक वह साढ़े सत्रह हजार किलोमीटर तक साइकिल चला चुके हैं और लगभग साढ़े पांच लाख लोगों के साथ अपने इन सवालों को साझा कर चुके हैं। साल 2018 के आखिरी महीनों में बिहार के छपरा में ही उनकी इस ‘राइड फॉर जेंडर फ्रीडम’ के पूरा होने की संभावना है। तब तक वह देश के हर राज्य तक अपनी उपस्थ‌ित‌ि दर्ज करा चुके होंगे।

कौन हैं राकेश कुमार स‌िंह

साल 2014 के मार्च महीने में राकेश कुमार स‌िंह ने चेन्नई से शुरू की थी राइड फॉर जेंडर फ्रीडम। इस राइड के दौरान वह जगह-जगह जाकर लैंगिक भेदभाव से जुड़े मसलों को उठाते हैं। कहां पर लोगों की किस तरह की सोच है, इस बारे में शोध कर रहे हैं। लंबे समय तक दिल्ली और भोपाल जैसे शहरों में बतौर मीडिया रिसर्चर और कॉरोपोरेट कम्यूनिकेटर भी काम कर चुके हैं। ‘बम संकर तन गनेस’ के नाम से उनकी एक किताब भी आ चुकी हैं।

राकेश से अगर आप बात करेंगे तो सोचने पर मजबूर हो जायेंगे की हमारे आसपास व्यापित नियमो के पीछे कोइ रीति रिवाज नहीं कोई परंपरा नहीं बस हमारी सोच और वो परवरिश है जो हम अपने बच्चों को शुरुआत से देते हैं। अक्सर आपने किसी पुरुष को सड़क किनारे हल्का होते देखा है, कभी किसी महिला को ऐसा करते देखा है? कामकाजी महिलाओं को जिन्हें सारा दिन घर से बाहर रहना पड़ता है उन्हें अपनी इस जैविक जरुरत के लिए कितनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

कभी आपने सोचा है ऐसा क्यों हैं? इसका जवाब राकेश जी के पास है। उन्होंने एक वाकया बताया की एक शादी में उन्होंने देखा की शादी के मंडप के बगल में खाना खाती एक महिला को उसके डेढ़ वर्षीय बेटे ने कहा की उसे सुसु करना है। उसकी माँ ने तुरंत उसकी पैंट एक इंच नीचे कर दी। राकेश कहते हैं वहीँ अगर उनकी बेटी होती तो उसे थोड़ी देर रुकने को कहा जाता। उसकी माँ खाना खतम कर के उसे दोनों हाथों से उठा कर टॉयलेट या कमसे कम किसी मोड़ी पर लेकर जाती। इस तरह वो डेढ़ साल का बच्चा सीखता है की उसे लड़कियों की तरह टॉयलेट खोजने की जरुरत नहीं है वो कहीं भी हलके हो सकते हैं और इस तरह हमारी परवरिश हमारे बच्चोँ का व्यवहार तय करती है।

राकेश को अपनी आगे यात्रा के लिए फण्ड की जरुरत है। अगर आप चाहे तो उनकी मदद कर सकते हैं। राकेश कहते हैं लोग उन्हें दिन का एक रुपया दे सकते हैं और घर के कबाड़ को बेच कर आये हुए पैसे भी। सहयोग उनतक कैसे पहुचाना है उसके लिए आप rakeshjee@gmail।com पर संपर्क कर सकते हैं।

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