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वह बिहारियों के गुमनाम इतिहास की कड़ियां जोड़ती रहीं और हमने उनका कत्ल कर दिया

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नई पीढ़ी के कम ही बिहारी इतिहासकार पापिया घोष का नाम जानते होंगे. आज उस बात के ठीक ग्यारह साल हो रहे हैं, जब रात को कुछ डकैतों ने चोरी के इरादे से घुसकर उनका और उनकी नौकरानी का नृशंसता से कत्ल कर दिया था. उस रात हमने पापिया घोष समेत उन तमाम संभावनाओं को गंवा दिया था, जो उनके दीर्घायु होने की वजह से हम बिहार वासियों को मिलने वाला था.

आधुनिक इतिहास में बिहार और पूरे साउथ एशिया में फैले बिहारियों के इतिहास के बारे में समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय निगाह से जो उनका अध्ययन है, उसका महत्व आज नहीं, आने वाले दशकों में समझ आयेगा. मगर उनके असामयिक निधन से जो हमने गंवाया है, उसकी क्षतिपूर्ति शायद ही मुमकिन हो. क्योंकि अलग-अलग अस्मिताओं में बंटे बिहार के अध्येताओं में शायद ही कोई आज ऐसा है जिसकी रुचि उन विषयों पर काम करने की है, जिसे पापिया घोष अधूरा छोड़ गयी हैं.
अगर आप पापिया घोष के कामकाज के बारे में जानना चाहते हैं तो जरा इनकी किताबों के नाम पर गौर कीजिये. 1. मुहाजिर्स एंड द नेशन : बिहार इन द 1940 2. द सिविल डिसोबिडियेंस मूवमेंट इन बिहार 3. कम्युनिटी एंड नेशन : एशेज ऑन आइडेंटिटी एंड पोलिटिक्स इन इस्टर्न इंडिया 4. पार्टिशन एंड साउथ एशियन डायस्पोरा.
अपनी मेड मालती से साथ पापिया. तीन दिसंबर 2006 की रात दोनों का कत्ल कर दिया गया था.

इन नामों से जाहिर है कि उनकी प्राथमिकता में बिहार, मुहाजिर, विभाजन, पूर्वी भारत और दक्षिणी एशिया थी और उनके अध्ययन का काल 1930 से लेकर कमोबेस 20वीं सदी के आखिर तक फैला हुआ था. इन विषयों पर उन्होंने सिर्फ इतिहास के नजर से नहीं बल्कि समाजशास्त्री की निगाह से भी अध्ययन किया और लिखा. लोग बताते हैं कि वे इस काम के सिलसिले में बिहार के दूर-दराज के इलाके में खूब घूमा करती थीं और देश-विदेश के सेमिनारों में अपनी बातें रखने जाया करती थीं. वे एक वास्तविक अध्येता थीं. हिंदी-मैथिली की मशहूर लेखिका और इतिहास की प्राध्यापिका रह चुकीं उषाकिरण खान कहती हैं कि वे अपने छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय थीं. वे बिहार की एक प्रगतिशील शख्सियत थीं. उनकी असमायिक हत्या हम सबके लिए एक शॉक की तरह था.

आठ अक्तूबर 1953 को उस वक्त के बिहार के दुमका शहर में पैदा हुई पापिया घोष के पिता उज्ज्वल कुमार घोष एक आइएएस अफसर थी, जिनकी राजनीतिक कारणों से हत्या हो गयी थी. पापिया की पढ़ाई लिखाई पटना में हुई. फिर वे दिल्ली विवि गयीं जहां से पीएचडी किया. फिर बिहार लौट आयीं. वे अपनी मां के साथ रहना चाहती थीं. उन्होंने पटना वीमेन्स कॉलेज में इतिहास पढ़ाना शुरू किया, फिर 1991 में वे पटना विवि के इतिहास विभाग का हिस्सा बन गयीं. उन्हें दो बार प्रतिष्ठित राकफेलर फेलोशिप मिला, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज का फेलोशिप भी मिला. जेएनयू और नेहरू म्यूजियम लाइब्रेरी की वे विजटिंग स्कॉलर थीं. 2006 में 2-3 दिसंबर की रात उनकी दुःखद हत्या हो गयी. हत्या बहुत नृशंस थी. अपराधी पकड़े गये, उन्हें फांसी की सजा भी निचली अदालत ने सुनाई मगर मामला आगे नहीं बढ़ सका. दोषियों की अपील के बाद फिर से उस मामले की सुनवाई नहीं शुरू हो पायी है.

उनकी बहन टुकटुक कुमार जो आइएएस अफसर हैं और केंद्र सरकार में सेवाएं दे रही हैं ने उनकी याद में एक ट्रस्ट बनाया है. वे उनकी हत्या की जांच के लिए लगातार संघर्ष करती हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रसिद्ध कॉलमिस्ट जग सुरया भी उनके नजदीकी रिश्तेदार हैं और उनकी याद को जिंदा रखने की कोशिश करते हैं. मगर क्या हम बिहारी भी पापिया घोष को उसी शिद्दत से याद करते हैं, जिस शिद्दत से उन्होंने बिहार के इतिहास की गुमनाम कड़ियां जोड़ने की कोशिश की थी.

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