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वेश्यालय की मिट्टी के बिना क्यों अधूरी होती हैं देवी दुर्गा की प्रतिमा

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नवरात्र शुरू हो गए हैं. दुर्गा पूजा के पंडालों में होने वाली सजावट अंतिम दौर में पहुंच गई है. शायद आपने भी अपने आसपास या फेसबुक पर तैयारियों के अंतिम दौर वाली दुर्गा प्रतिमाओं की तस्वीरें देखीं होंगी. दुर्गा पूजा की मूर्तियां बनाने में कारीगर कई परंपराओं का पालन करते हैं. इनमें से एक है दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्यालयों से मिट्टी लेकर आना.

अगर आपको याद हो तो संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास में यह सीक्वेंस डोला-रे डोला गाने से पहले काफी ओवर द टॉप तरीके से दिखाया गया था. पारो और चंद्रमुखी को एक साथ मिलवाने का बहाना इस परंपरा को बनाया गया. फिल्म के पर्दे पर एकसाथ ऐश्वर्या और माधुरी को दिखाने के लिए निर्देशक को ऐसी ही किसी कल्पना की जरूरत थी.

फिल्म की बातों को छोड़ दें तो ये देवी पूजा की नींव रखते समय समाज के कथित तौर पर सबसे घृणित पेशे की मदद से शुरुआत करना अपने आप में रोमांचक है. सवाल उठता है कि जिस धर्म में लंबे समय से स्त्रियों को कई परंपराओं से दूर रखा जाता हो, जिस काल में सती प्रथा जैसी परंपरा हो, जहां विधवा का जीवन नरक से कम न हो, उस काल में ऐसी रवायत कैसे पड़ गई?

फिल्म से अलग है वेश्यालय से मिट्टी लाने की परंपरा

दुर्गा प्रतिमा के बारे में माना जाता है कि जब तक उसमें वेश्यालय की मिट्टी न मिला ली जाए वो अधूरी रहेगी. ये मिट्टी भी साधारण तरीके से नहीं मिलती. जमींदारी के समय से पुजारी और कुमार टोली के मूर्तिकार वेश्यालयों के बाहर जाते और भीख की तरह वेश्याओं से ये मिट्टी मांगते. मिट्टी देने वाली वेश्याएं चाहें उनका मजाक उड़ाएं या मना कर दें, उन्हें वैसे ही मांगते रहना पड़ता है.

क्या है इसकी वजह

इस परंपरा के पीछे दो कारण बताए जाते हैं. एक मान्यता है कि देवी ने जब महिषासुर का वध करने के लिए अवतार लिया तो हर वर्ग की स्त्री को अपनी शक्ति का रूप माना. वेश्याएं हमारे समाज का वो वर्ग है जो पुरुषों के कर्मों के चलते समाज में सबसे निचले दर्जे पर रहता है. ऐसे में साल में एक बार समाज का कथित रूप से सबसे ताकतवर और सम्मानित पुरुष यानी पुरोहित, समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला के दरवाजे पर जाकर भीख मांगता है.

दूसरी मान्यता इससे अलग है. इसमें माना जाता है कि आदमी जब किसी वेश्यालय में घुसता है तो अपना सारा रुतबा, इज्जत, मान-सम्मान पुण्य और सारे ओढ़े हुए नकाब चौखट पर उतार देता है. चौखट के अंदर घुसते ही वो सिर्फ एक पुरुष ही होता है. इसलिए चौखट के इस पार की मिट्टी सबसे पवित्र होती है जो दुनिया भर के पुरुषों के उजले चरित्र सोख लेती है.

क्या ये रवायत स्त्री सशक्तिकरण को दिखाती है

पहली नजर में देखें तो ये पूरी कवायद खूब फैसिनेट करती है. पर दरअसल ये भारतीय समाज में चली आ रही हिपोक्रेसी का ही एक और प्रकार है. औरतों को सती के नाम पर जिंदा जलवा देने वाले पुरोहित उस काल में भी मिट्टी मांगने जाते ही होंगे. जमींदार मर्दों के पत्नियों को छोड़ कोठों पर ही पड़े रहने की कहानियों से तो बंगाल का पूरा साहित्य भरा हुआ है.

ऐसे में इन सारे लोगों ने पुण्य से भरी ये मिट्टी मांगकर जितना नारी सशक्तिकरण  नहीं किया होगा उससे कई गुना ज्यादा ईश्वरचंद्र विद्यासागर और राजा राम मोहन रॉय ने धार्मिक रस्मोरिवाज तोड़ कर कर दिया.

हिंदुस्तान में ऐसी टोकन वाली परंपराओं की कमी नहीं है जिनको सुनाकर संस्कृति की महानता की दुहाई दी जा सकती है. महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की बात करते ही एक वर्ग ‘यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ की रट लगाने लगता है. वो सब अलग रखिए भागदौड़ की जिंदगी में त्योहार अपने आप में तनाव कम करने का एक अच्छा जरिया हैं उसका मजा लेते रहिए.

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