दि सन्डे

‘वो मेरा सांवलापन नहीं, लोगों के मन की कालिख थी जिसने मेरी बचपन की यादों को स्याह कर दिया’

बचपन से जुड़ी वे यादें जो न होतीं तो जैसे हम हैं शायद वैसे न होते

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जब कोई बचपन के किस्से सुनाता है और उसमें तब की गई ढेर सारी मस्ती, भाई-बहनों के झगड़े और स्कूल में मचाए धमाल का जिक्र करता है तो मुझे बड़ा रोमांच होता है. इसके साथ थोड़ा अफसोस भी होता है कि हाय! यह सबकुछ मेरे हिस्से में क्यों नहीं आया. मेरी यादों के खजाने में जो यादें हैं, वो अपनी नरमी से गुदगुदाने वाली नहीं बल्कि अपनी रुखाई से चुभने वाली हैं. यहां तक कि कभी बचपन को याद करने का भी मन नहीं करता.

पापा के आर्मी में होने के कारण मेरा बचपन अलग-अलग शहरों के मिलिट्री क्वाटर्स में बीता. मेरे परिवार में दादा-दादी, मम्मी-पापा और भाई-बहन हैं. मैं घर की सातवीं यानी सबसे छोटी सदस्य हूं. बेशक, मैं पापा की लाड़ली बेटी थी लेकिन वो ज्यादातर वक्त ड्यूटी पर ही रहते थे. मेरी बहन मुझसे करीब पांच साल बड़ी है और उससे कभी इतनी बात ही नहीं हुई कि हमारी उम्र का फासला खत्म हो पाता. मम्मी, घर के काम-काज और पापा के हिस्से की भी जिम्मेदारियां निभाने में इतनी बिजी रहती थीं कि उनके पास कभी मेरे लिए टाइम ही नहीं होता था. लेकिन यह सब तो हर तीसरे घर की कहानी है. मेरे साथ खास यह था कि घर में एक सदस्य ऐसा भी था जो मुझे सख्त नापसंद करता था, और वो थीं मेरी दादी.

मैं दादी की आंखों की किरकिरी की तरह थी. एक तो घर की दूसरी लड़की, ऊपर से काली और उसके ऊपर से दुबली-पतली-लंबी, किसी सींक की तरह. कुल मिलाकर दादी को मेरा रूप-रंग-काया, या शायद मेरा अस्तित्व ही नापसंद था. दादी मुझे हर बात के लिए टोकती रहती थीं और मेरी हालत ये थी मम्मी और दीदी से उनकी शिकायत करना तो दूर, किसी साधारण बात के लिए भी बात करना मुश्किल होता था. तिस पर मम्मी ने मुझे हमेशा से यह सीख दी थी कि तुम सबसे छोटी हो, कभी किसी से बदतमीजी से या तेज आवाज में बात मत करना. इन सबका असर यह हुआ कि मैं दब्बू होती चली गई. सिर झुकाए, उस घर में होकर भी न रहने वाली लड़की बन गई. मेरे घर पर आने वाले ज्यादातर रिश्तेदारों को मेरा नाम भी नहीं पता होता था क्योंकि मैं उनसे मिलती ही नहीं थी. अब भी मेरा स्वभाव बहुत हद तक वैसा ही है, मैं ज्यादा लोगों से घुलती-मिलती नहीं हूं.

सबसे ज्यादा दिक्कत मुझे अपने रंग से थी. मैं उन शब्दों और आवाजों पर अटक जाती जहां काला या सांवला आता था. तिस पर कोढ़ में खाज यह कि न सिर्फ घर में बल्कि स्कूल में भी अपने रंग के कारण मुझे कई बार भेदभाव सहना पड़ा था. वह किस्सा मुझे बहुत अच्छे से याद है कि जब मैं कानपुर के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ती थी. स्कूल में एनुअल फंक्शन की तैयारी चल रही थी. मेरी क्लास के सारे बच्चे किसी न किसी प्रोग्राम में हिस्सा ले रहे थे. मुझे म्यूजिक और डांस बचपन से ही पसंद हैं. शायद इसीलिए शर्मीले स्वभाव के बावजूद स्टेज पर परफॉर्म करने की मेरी इच्छा हिलोरें मारती रहती थी.

कई सालों से मैं किसी प्रोग्राम में हिस्सा लेने की कोशिश कर रही थी लेकिन कभी सलेक्शन ही नहीं होता था. उस साल मुझे वजह समझ आई कि आखिर हर बार मेरे साथ ऐसा क्यों होता है. वजह यह थी कि चयनकर्ताओं को मैं पसंद ही नहीं आती थी. अक्सर देखने को मिलता कि मेन लीड किसी गोरी, खूबसूरत और क्यूट सी दिखने वाली लड़की को चुना जाता. बावजूद इसके मैंने हार नहीं मानी. कई तरह से कोशिश की लेकिन हर साल की तरह इस बार भी मुझे कोरस में पीछे, तीस बच्चों के साथ, हाथ में गुब्बारा थामकर खड़ा रहने का रोल मिला. यह रोल कुछ ऐसा था कि उस जगह पर मैं होऊं या कोई और, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला था. उस दिन मुझे पहली बार अपनी योग्यताओं पर शक हुआ, लगा कहीं दादी का मुझे बेकार समझना सच तो नहीं है! मैं बड़ी देर तक अपने आस-पास खड़ी लड़कियों को देखकर कुछ-कुछ सोचती रही.

इसके अगले साल पापा का फिर ट्रांसफर हुआ और हम लखनऊ आ गए. लखनऊ आते ही मेरा स्कूल और दोस्त एक बार फिर बदल गए. नए स्कूल में खास यह था कि यहां पर स्पोर्ट्स को बहुत महत्व दिया जाता था और खूब खेला भी जाता था. यह मेरे लिए मुंह मांगी मुराद जैसा साबित हुआ. जाने किस चीज ने मुझे इस बात का इशारा दिया कि यहां पर मेरी योग्यता को मेरे रंग-रूप पर नहीं आंका जाएगा. मैंने अलग-अलग खेलों में हिस्सा लेना शुरू किया. बाद में बॉस्केट बॉल मुझे जम गया. इसके लिए मैं कई घंटे प्रैक्टिस किया करती थी. मुझे ना तो इस बात का डर था कि ज्यादा धूप में मेरा रंग काला पड़ जाएगा और ना ही चोट लगने का, क्योंकि सांवली होने के साथ-साथ मैं हल्की और फुर्तीली भी थी. इसका कमाल यह हुआ कि नौवीं पहुंचने पर मुझे स्कूल की तरफ से क्लस्टर लेवल के लिए सलेक्ट किया गया और बारहवीं आते-आते मैं अपनी स्कूल की स्पोर्ट्स कैप्टन भी बन गई. इन चीजों ने मुझे वो आत्मविश्वास दिया जो मुझे आज तक आगे बढ़ा रहा है. अब मैं साहस और हिम्मत का काम समझे जाने वाले पेशे में हूं.

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