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शेफ : जिसे न व्यंजन बढ़िया पकाना आया, न मनोरंजन!

फिल्म समीक्षा: ‘शेफ’ की एक अच्छी बात उसकी सांस्कृतिक विविधता है, जहां नायक अगर चांदनी चौक का है तो नायिका मलयाली है और फिल्म अपना ज्यादातर वक्त कोच्चि में बिताती है

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यह फिल्म समीक्षा हमारे सिटिजन जर्नलिस्ट अनुराग ने लिखी है.

र्देशक : राजा कृष्णा मेनन

लेखक : रितेश शाह, सुरेश नायर, राजा कृष्णा मेनन

कलाकार : सैफ अली खान, पद्मप्रिया जानकीरमन, स्वर कांबले, चंदन रॉय सान्याल, दिनेश प्रभाकर, राम गोपाल बजाज, शोभिता धूलिपाला, मिलिंद सोमण


‘आयरन मैन’ और ‘जंगल बुक’ जैसी विशाल फिल्में बनाने वाले अमेरिकी निर्देशक जॉन फावरो की 2014 में आई ‘शेफ’ एक छोटी-सी और प्यारी-सी फिल्म थी. कॉमेडी ड्रामा का आवरण ओढ़कर इसने पिता-बेटे के बीच के रिश्ते की कहानी कही थी और टेक नए तरह के स्वाद की खोज में निकले पिता और फूड ट्रक की ली थी. सबसे प्यारी बात थी कि जितना ध्यान फिल्म ने मानवीय रिश्तों पर दिया था उतनी ही मोहब्बत से फिल्म में भोजन पकाया गया था. एक सामान्य चीज सैंडविच बनाने से लेकर पास्ता, क्यूबन सैंडविच तक के लिए सामग्री जुटाने और उसे इत्मिनान-एहतियात से बनाने वाले शेफ का पूरा पैशन फिल्म ने पुरजोर तरीके से दिखाया था. ऐसा कर खुद को उन चंद फिल्मों में शामिल भी किया था जो सिर्फ भोजन पर बात नहीं करतीं, बल्कि उसे बनाने में भी भरपूर कलात्मकता दिखाती हैं.

सैफ वाली ‘शेफ’ के साथ दिक्कत यह है कि उसमें सैफ अली खान लगते तो पूरे शेफ हैं, लेकिन कोच्चि से लेकर दिल्ली तक का सफर करने के बावजूद फिल्म नए स्वाद और जायकों को उस मोहब्बत से फिल्मा नहीं पाती जिसने अंग्रेजी फिल्म ‘शेफ’ को दिलचस्प बनाया था. सैफ का किरदार रोशन कालरा छोले भटूरे से लेकर तमाम तरह के देसी जायकों की बात मन लगाकर करता है और जब खाना बनाता है तब भी बेहद प्यार के साथ पास्ता से लेकर गूंथे हुए मैदा से पेश आता है. लेकिन जब खुद के अंदर के शेफ को दोबारा खोजकर नयी डिश बनाता है तो दो लेटी हुई रोटियों के बीच पनीर या कीमा भरकर खिंचने वाला चीज भर डाल देता है. रोटी और पिज्जा को मिलाकर इस डिश का अनोखा नाम रख देता है और आपको अभी नहीं पता, लेकिन यहां तक आने के लिए फिल्म में नायक को कई पापड़ बेलते हुए दिखाया जाता है और कोच्चि, गोवा व दिल्ली जैसे शहरों को इस जुगाड़ डिश का दीवाना बताया जाता है!

‘शेफ’ लेकिन, सिर्फ व्यंजन साधारण पकाती तो कोई बात नहीं थी. वो मनोरंजन भी बढ़िया नहीं पका पाती और इसकी सबसे बड़ी वजह उसका लेखन है. राजा कृष्णा मेनन की पिछली फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ के लिए जिन रितेश शाह और सुरेश नायर की जोड़ी ने कमाल की मौलिक पटकथा लिखी थी, वही जोड़ी एक मौलिक अंग्रेजी फिल्म का सुघड़ हिंदी रूपांतरण करने में असफल सिद्ध हुई है. शायद यह इसलिए है कि हिंदी की ‘शेफ’ अंग्रेजी की ‘शेफ’ का आधिकारिक रूपांतरण तो है लेकिन सीधा-सीधा रीमेक नहीं. राजा कृष्णा मेनन ने मूल कहानी और उसके प्लॉट स्ट्रक्चर को लेकर खुद का एक मौलिक परिवेश चुना है और अपने किरदारों को वही यात्रा एक अलग रास्ते से कराने की कोशिश की है.

इसी कोशिश में फिल्म भटकी है और इंटरवल के बाद बहुत सारी जगह बहुत ज्यादा भटकी है. कहानी के अनुसार जब न्यूयॉर्क के मशहूर शेफ रोशन कालरा के खाने में पुराना वाला जादू नहीं बचता, और नौकरी भी, तो वो खुद को दोबारा तलाशने के लिए कोच्चि चला आता है. यहां उसका बेटा और पूर्व पत्नी रहते हैं और इनके साथ रिश्तों को सुधारने की कोशिशों के दौरान वो एक फूड ट्रक शुरू कर खुद का हुनर भी दोबारा खोजता है.

लेकिन ऐसी फील-गुड कहानी का न सिर्फ क्रियान्वयन ऊबड़-खाबड़ और बेहद धीमा है बल्कि फिल्म आत्ममुग्धता का शिकार होकर खुद को जरूरत से ज्यादा लंबा भी कर लेती है. बेवजह ही एक जगह रघु दीक्षित वाला सीक्वेंस डाला जाता है (जोकि एक जबरदस्त इंडी गायक हैं) और सैफ के गिटार-प्रेम को दर्शाने के लिए एक गीत बजाया जाता है. फूड ट्रक चलाने के लिए एक अकड़ू ड्राइवर को रखा जाता है (दिनेश प्रभाकर), जो हमेशा अपनी चलाता है, लेकिन उसका ट्रैक न हंसी पैदा करता है न मतलब. गांजा मारते हुए, एक बार फिर काबिल अभिनय करने वाले चंदन रॉय सान्याल और सैफ, अकबर व ताजमहल पर चुटकुलेबाजी करते हैं और यह पूरी तरह से एक बेमतलब का सीन लगता है.

साथ ही, एक कबाड़ ट्रक के लिए गरीब नहीं लगने वाले सैफ को अपनी भूतपूर्व मलयाली पत्नी के प्रेमी (अति सुंदर मिलिंद सोमण!) की क्यों जरूरत पड़ती है, फिल्म इसको भी वैसे नहीं समझा पाती जैसे अंग्रेजी फिल्म ‘शेफ’ ने समझाया था.

‘शेफ’ तब-तब जीवंत जरूर हो उठती है जब बाप और बेटा मिलकर जायकों की बात करते हैं. सैफ का किरदार तरह-तरह के व्यंजनों के बहाने अपने जीवन के शुरुआती संघर्षों की दास्तान अपने अनभिज्ञ बेटे अरमान को सुनाता है (स्वर कांबले, उम्दा अभिनय करते हुए), और उन जगहों के मुख्तलिफ फूड का उसे स्वाद चखाता है जहां बचपन में घर से भागने के बाद वो रहा था.

बाप-बेटे के बीच के रिश्ते की गर्माहट इन्हीं दृश्यों के दौरान महसूस होती है और यही ‘शेफ’ के सर्वश्रेष्ठ हिस्से भी होते हैं. लेकिन बाप-बेटे द्वारा फूड ट्रक का काम शुरू करने के बाद जहां फिल्म को रफ्तार तेज पकड़नी थी – ठीक ओरिजनल फिल्म की तरह – वहीं फिल्म अपनी धीमी रफ्तार से समझौता नहीं करती और बिना कोई रोमांच पैदा किए सपाट चलते-चलते महाउबाऊ फिल्मी क्लामेक्स पर खत्म होती है.

‘शेफ’की एक अच्छी बात उसकी सांस्कृतिक विविधता भी है. नायक अगर चांदनी चौक का है तो नायिका मलयाली है और फिल्म अपना ज्यादातर वक्त कोच्चि में बिताती है. खूबसूरत नजारों के अलावा वहां के रहन-सहन-भोजन को भी विश्वसनीय तरीके से फिल्माती है और भले ही इससे फिल्म की गुणवत्ता नहीं सुधरती लेकिन फिल्म ज्यादा रियलिस्टिक नजर आती है. तेलुगू और मलयालम फिल्मों की अभिनेत्री पद्मप्रिया जानकीरमन इसी परिवेश का हिस्सा बनकर दर्शकों को मिलती हैं और कुछ इमोशनल दृश्यों को छोड़कर कमाल का प्रभाव छोड़ती हैं. उनके जैसी सहज-सुंदर अभिनेत्रियों का हिंदी फिल्मों में अकाल है, ‘शेफ’ देखकर यह बात फिर याद आती है.

सैफ अली खान को देखकर याद आता है कि करियर के इस दौर में वे अब सच में हटकर काम करना चाहते हैं. अपनी बढ़ती उम्र को उन्होंने भी गले लगा लिया है इसलिए स्क्रीन पर आपको ‘हम-तुम’ जैसी फिल्मों की लीग वाला वह लूजर हीरो नहीं नजर आता जिस तरह के रोल वे हमेशा करते रहे हैं. बल्कि एक परिपक्व किरदार नजर आता है जो हीरो नहीं आम आदमी की तरह जीता है, और अपने पैशन के साथ-साथ बरसों बाद मिले अपने बेटे के साथ घुलने-मिलने की तमाम कोशिशें करता दिखता है.

रोशन कालरा बनकर सैफ न सिर्फ ऐसे ट्रिकी किरदार को सहजता से अपने नैचुरल अभिनय के सहारे साधते हैं बल्कि एक मास्टर शेफ की नफासत को भी गहरे उतरकर पकड़ते हैं. चाहे पास्ता को बाउल में डालने का जहीन अंदाज हो, भुने हुए टमाटर को छीलना हो या फिर कायदे से मैदा गूंथने के बाद उसे कपड़े से ढांकना, सैफ को खाना बनाते हुए देखना अच्छा लगता है!

आप सिर्फ इन्हीं सैफ अली खान के लिए ‘शेफ’ देख सकते हैं. लेकिन जब कई जगहों पर बोर हों, जोकि होंगे ही, तो ‘कच्चा पापड़, पक्का पापड़’ की तर्ज पर हमारे बनाए इस टंग-ट्विस्टर के सहारे समय काटने की कोशिश कीजिएगा. वो जल्दी कटेगा.

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