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सत्याग्रह के 100 साल : पूर्णिया के 33 फ्रीडम फाइटर्स किये गए सम्मानित

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बिहार में पूर्णिया जिले के चारों अनुमंडल में कुल 33 स्वतंत्रता सेनानी को चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में सम्मानित किया गया. शहर में चार स्वतंत्रता सेनानी को उनके घरों में जाकर सम्मानित किया गया. जिला पदाधिकारी पंकज कुमार पाल ने स्वतंत्रता सेनानी स्व0डॉ हरविजय सिंह की पत्नी मोस0 दमयन्ती सिंह को सुबह 11 बजकर 15 मिनट में उनके घर जाकर प्रशस्तिपत्र. गांधी की टोपी एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया एवं आशीर्वाद लिया और पुर्नियावासियों के लिए दुआएं मांगी.

हमारी  टीम सभी स्वतंत्रता सेनानी के घर जाकर उनसे सीधी बात की. सर पर गांधी टोपी, हाथों में तिरंगा, जुबान पर इंकलाब जिंदाबाद और आंखों में देश की आजादी की खुशी एवं नये भारत का सपना लिए जब चारों स्वतंत्रता सेनानी से बात की तो दर्द और खुशी इनके आंखों में साफ-साफ दिखाई दे रहे थे. चेहरे का उतार-चढ़ाव इनकी सारी कहानियां बयां कर रही थी. जेल से लेकर आजादी तक की कहानी बयां करते-करते इनके आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े. किन-किन परिस्थितियों को झेलकर इनलोगों ने देश को जो आजादी दिलाई. उन्हें आज पूरा राष्ट्र सलाम और सम्मान करता है.

83 वर्ष की दमयंती सिंह को आज भी अपने पति की जेल यात्रा और अंग्रेजों की जुल्म की कहानी उनकी आंखों में साफ झलकती है. दमयंती देवी कहती हैं कि आज हमलोग खुले आसमान में सांस ले रहे हैं, उनके पीछे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की बहुत सारी कुर्बानियां है तब जाकर आज हमलोग खुले में सांस ले रहे है. उन्होंने जिलाधिकारी पंकज कुमार पाल को जिले में कुटीर उद्योग को बढ़ाने की अपील की. 88 वर्षीय सीता देवी जो कि कान से थोड़ा कम सुनती है.

अंग्रेजों की जुल्म और इंकलाब का जुनून आज भी इनकी आंखों से साफ झलकता है.आज भी सीता देवी का देश के प्रति प्रेम और भावना को राष्ट्र सलाम करता है. प्रणीति दास को आज भी अपने पिताजी पर गर्व महसूस हो रहा है. आज भी उनके आंखों में पिताजी का चेहरा और उनकी देश भक्ति की बातें उनके चेहरे से साफ दिखाई पड़ती है. बातों ही बातों में अपने पिताजी के संघर्ष को याद कर कहती है कि आजादी के बाद हमलोग जब पूर्णिया आये तो मेरे पिताजी के सामने परिवार को पालने की जिम्मेवारी थी. लेकिन पिताजी ने हिम्मत नही हारे और बस में कंडक्टर की नौकरी शुरू की और हमलोगों को पढ़ाया-लिखाया और एक नई जिंदगी दी.

बेलौरी में उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक के मैनेजर तरुण बोस की भी कहानी कुछ इसी तरह की है.इनके पिताजी सालों जेल में रहने के बाद भी अंग्रेजों ने इनका पीछा नही छोड़ा.जब देश आजाद हुआ तो ये बंगाल छोड़ बिहार आये.तरुण बोस कहते है कि मेरे पिताजी देश की आजादी में उन करोड़ों देशवासियों की उम्मीद बन गये थे. जिनका आज उन्हें सम्मान मिला.

जिसे पाकर मेरे पिताजी की आत्मा को बहुत शांति मिली.ये बातें कहते-कहते तरुण रो पड़े. उन्होंने कहा कि जो कष्ट की जिंदगी उन्होंने बिताए उनका आज फल मिला. इन सम्मान समारोह में जिला पदाधिकारी पंकज कुमार पाल.उप विकास आयुक्त रामशंकर.सदर एस डी ओ रविन्द्र नाथ.डी सी एल आर रवि प्रकाश.जिला शिक्षा पदाधिकारी मिथलेश कुमार एवं अन्य पदाधिकारी शामिल थे.

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