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सीक्रेट सुपर स्टार: मैं कौन हूँ? लापता क़ौम की तलाश

एक कमज़ोर औरत की जंग ऐसी ही होती है। वह अपने सपनों को ज़ख़्मी कर, अपनी आँखों में जंगल उगा सकती है, ख़ुद को उसमें भटक जाने दे सकती है, मगर अपनी संतान को नहीं...

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यह फिल्म सिर्फ माँ बेटी के संबंधों की नहीं, यह सपनों की ख़ातिर एक अपनों से की जाने वाली अहिंसक लड़ाई है। हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देती यह फ़िल्म।

वह लड़की नहीं, सपना है, तहख़ाने में पलने वाली हर लड़की की आँखों में टिमटिमाता है। उचित माहौल और अवसर न मिलने पर अक्सर दम तोड़ जाता है।

इस फिल्म में कौन है सुपर स्टार? घरेलू हिंसा झेलती हुई जवान माँ या गायिका बनने का सपना देखने वाली किशोर उम्र बेटी? किसकी फ़िल्म है? प्रोड्यूसर आमिर खान की या निर्देशक अद्वैत चंदन की? माँ-बेटी के संबंधों की, स्त्री यातना की, पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी समाज की, या किसी एक समुदाय की? या वर्षों से अपनी पहचान ढूँढ रही स्त्री की जो पूछती है- मैं कौन हूँ, मैं चाँद हूँ या दाग हूँ, मैं राख हूँ या आग हूं…!

यह किसी एक कौम या किसी एक परिवार की गाथा नहीं, बल्कि पिछड़े, दकियानूसी, अहंकारी मर्दवादी परिवार, समाज की लड़की के सपनों पर प्रतिबंधों का खुलासा है। बंद समाज की प्रतिभाशाली लड़की वह आवेग होती है जिसे कोई रोक नहीं सकता, कोई उसके सपनों पर पहरा नहीं बिठा सकता। पानी-सा आवेग है, सारी काराएँ तोड़ कर बाहर निकल आती है इच्छाएँ। वह लड़की नहीं, सपना है, तहख़ाने में पलने वाली हर लड़की की आँखों में टिमटिमाता है। उचित माहौल और अवसर न मिलने पर अक्सर दम तोड़ जाता है।

इंसिया ( जायरा वसीम) नए ज़माने की लड़की है, वह अपने सपनों को किसी भी क़ीमत पर पाना चाहती है। आततायी पिता के द्वारा सताई गई एक मासूम माँ (मेहर विज) है जो बेटी के सपने में साथ देती है, ख़ुद लाख सितम सह कर वह अपने बेटे को अपने पति जैसा नहीं बनाना चाहती कि वह किसी दूसरी औरत की ज़िंदगी नर्क बना दे और न अपनी बेटी को अपने जैसी पीड़ित औरत में बदलते हुए देखना चाहती है जो ज़िंदगी भर कैदखाने में रहे, पराधीन सपनेहु सुख नाहि…को किसी आपदा की तरह झेले।

एक कमज़ोर औरत की जंग ऐसी ही होती है। वह अपने सपनों को ज़ख़्मी कर, अपनी आँखों में जंगल उगा सकती है, ख़ुद को उसमें भटक जाने दे सकती है, मगर अपनी संतान को नहीं। यह फिल्म सिर्फ माँ बेटी के संबंधों की नहीं, यह सपनों की ख़ातिर एक अपनों से की जाने वाली अहिंसक लड़ाई है। हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देती यह फ़िल्म। आर्थिक सुरक्षा के भय से अपने लिए कंफर्ट ज़ोन चुन लेने वाली और तड़पने वाली औरतों को साहस और रास्ता देने वाली फ़िल्म भी है। मत सोचो कि आगे क्या होगा। अपने सपनों पर भरोसा करके निकल पड़ो, रास्ता हो जाएगा।

यह यथार्थवादी फ़िल्म है जो फ़िल्मी नहीं होती कहीं से। यह फिल्म एक साथ कई बिंदुओं को छूती है। फिल्म अवॉर्ड के चयन पर सीधा हमला बोलती है और अंत में एक सेटर गायिका का हृदय परिवर्तन दिखाती है। उसका ज़मीर जाग जाता है और वह अपना पुरस्कार उस गायिका को देती है जो सचमुच उस पुरस्कार की हक़दार थी। फिल्म में छवियों पर भी बात की गई है। पब्लिक ओपिनियन कई बार किसी की बहुत खराब इमेज बना देती है और इस हद तक बदनाम कि व्यक्ति का घर टूट जाए। उसे फ़िल्म इंडस्ट्री में काम मिलना बंद हो जाए। ऐसा व्यक्ति अपनी बाहरी हरकतों से बुरा लगता है, उसकी आत्मा , कथित अच्छे लोगों से ज़्यादा उदार, साफ़ सुथरी होती है। ऐसे लोग मदद के लिए तब खड़े होते हैं जब दुनिया खिलाफ खड़ी हो जाती है।

गुजरात का मुस्लिम समुदाय हो या देश के किसी भी भाग के। उनके जीवन में बहुत अंतर्विरोध है। खाड़ी देशों में कमाने गए पुरुष पेट्रो डॉलर उगाहते ज़रूर हैं लेकिन उनके विचार वही संकीर्ण रहते हैं। स्त्रियों के मामले में उनके विचारों में वही पिछड़ापन है। हालाँकि शहरों में रहने वाले बदल रहे हैं। लेकिन बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी है, बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है स्त्रियों को। उनकी अंदरूनी दुनिया के उसी संघर्ष और बदलाव की गाथा है यह फ़िल्म।

शुरुआत में यह फ़िल्म बहुत तनाव में रखती है। बहुत मुश्किल होता है ख़ुद को संभाले रखना। लगता है, मासूम लड़की के सपने कभी पूरे न होंगे, उसकी माँ हमेशा आततायी पति के हाथों पिटती रहेगी। घर के दमघोंटू माहौल में माँ बेटी के संबंध दोस्ताना बनते हैं। यहाँ तक कि बेटी अपनी माँ का तलाक़ करवाने पर आमादा हो जाती है। उसे अपनी माँ की रिहाई चाहिए। और माँ को आर्थिक सुरक्षा की चिंता है। पिता नहीं चाहते थे कि घर में बेटी पैदा हो। घरवाले अबॉर्शन करवाने पर आमादा थे कि माँ घर से भाग गई ताकि बेटी को गर्भ में न मार दे घरवाले।

बाद में बेटी लेकर लौटी – इस शर्त के साथ कि अगली बेटी हुई तो कोख में मार देगी. सौभाग्य उसका कि बेटा पैदा हुआ. पिता को सिर्फ़ बेटे से लगाव है. बेटी की तरफ़ वात्सल्य भरी निगाह से देखता तक नहीं. कोई इन्सान इतना मशीनी, इतना जड़ कैसे हो सकता है? कोई इन्सान हँसना कैसे भूल सकता है? मानवीय संवेदनाओं से परे कैसे जा सकता है? घर में एक बूढ़ी खाला हैं- अंत में वे भी कहती हैं – ‘मैंने भी औरत में पैदा होकर क्या पा लिया ! जहालत भरी ज़िंदगी।’

पिछड़े समाज में स्त्रियों की हालत पर एक सख़्त टिप्पणी की तरह है यह फ़िल्म। यह सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय नहीं, समूची पितृसत्ता का प्रतीक है उसका पिता. किसी समुदाय से जोड़ कर न देखें फ़िल्म की कथा को। ‘मैं कौन हूँ... इस नाम से ईमेल आई डी बनाने वाली लड़की उस औरत का प्रतिनिधि चेहरा है जो वर्षों से अपना चेहरा, अपनी पहचान तलाश रही है। अस्मितामूलक समाज में स्त्री की पहचान गौण होती है। नयी पीढ़ी में लड़कियाँ अपनी उसी अस्मिता को खोज रही हैं, जिसे दबा दिया गया था, इज़्ज़त के नाम पर।

उसका पिता अपनी बेटी को इसलिए नहीं पढ़ा रहा कि बेटी को लेकर उसका कोई उँचा सपना है या उसका करियर बनाना है. बल्कि पितृसत्ता की सोच ये है कि लड़की को पढ़ाओ ताकि उसे अच्छा घर-वर मिल सके और वह आने वाली संततियों को शिक्षित कर सकें. इतिहासकार चारु गुप्ता के सिद्धांतों पर यहाँ पिता खरा उतरता है और इस मनोवृत्ति की पुष्टि करता है कि स्त्रियों के लिए शिक्षा के द्वार किन स्वार्थों के तहत खोले गए। सीक्रेट सुपर स्टार वह माँ है, जो पिंजरे के सारे द्वार तोड़ कर, अपना दांपत्य दाँव पर लगा कर, समाज से बैर मोल ले कर अपनी बेटी के साथ सपनों की ऊँची छलाँग लगा जाती है। और हाँ….कई बार सपनों का पासवर्ड ‘चिंतन‘ ( सिया का स्कूल फ़्रेंड जो उससे प्यार करता है और हेल्प भी) भी हो सकता है जो कच्ची उम्र में मिल जाता है।

लेखक 


गीता श्री

प्रसिद्ध महिला पत्रकार, साहित्यकार। रामनाथ गोयनका पुरस्कार, ग्रासरूट बेस्ट फीचर अवार्ड, मातृश्री अवार्ड, राष्ट्रीय कला समीक्षा सम्मान (अभिनव रंगमंडल), यूएनएफपीए-लाडली मीडिया अवार्ड, नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया मीडिया फेलोशिप, इनफोचेंज मीडिया फेलोशिप, आधी आबादी वीमेन अचीवर्स अवार्ड, एस.राधाकृष्णन स्मृति राष्ट्रीय मीडिया सम्मान, अंतरराष्ट्रीय सृजन गाथा सम्मान (थाईलैंड द्वारा), भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार (भारत सरकार द्वारा)

 

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