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13 की उम्र में अमृतसर से पटना साहिब पैदल आए थे ये, 40 दिन का लगा था समय

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इसे तकदीर कहें, संयोग कहें या गुरु की अपार कृपा। प्रकाश पर्व में यों तो देश-विदेश से श्रद्धालु तख्त श्री हरिमंदिर साहिब पहुंच रहे हैं। श्रद्धा के दरबार में मत्था टेकने। श्रद्धालुओं की इसी भीड़ में नाहर सिंह जैसे लोग भी हैं जिन पर गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की खास नेमत है। सफेद दाढ़ी और सौम्य चेहरा। शांत चित्त और मीठी बोली। नाहर सिंह गुरु के उन भक्तों में हैं, जिन्हें पचास साल पहले 300वें प्रकाश पर्व में भी पटना साहिब में मत्था टेकने का सौभाग्य मिला था और अब वे 350वें प्रकाशोत्सव में भी गुरु के दर्शन के लिए आए हैं।

तब और अब के नाहर सिंह में उम्र का फर्क भी महसूस किया जा सकता है। अब उनकी लंबी झक सफेद दाढ़ी उन्हें भीड़ से थोड़ा अलग करती है। प्रकाश पर्व के लिए गुरु बाग में जुटे श्रद्धालुओं की भीड़ में नाहर सिंह से मुलाकात हो गई। बाबा विधि चंद्र संप्रदाय के टेंट के बाहर शांत बैठे नाहर सिंह के बारे में तब पता चला, जब एक संत ने बड़े गर्व से उनका परिचय कराया। नाहर सिंह वाकई खास हैं।
बताते हैं कि 300वें प्रकाश पर्व में शामिल होने का ऐसा जज्बा कि तब नाहर सिंह अमृतसर के तरनतारण से पैदल ही पटना साहिब चले आए थे। बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि तब नाहर सिंह विधि चंद्र संप्रदाय के मुखी संत बाबा स्वर्ण सिंह के साथ पटना साहिब आए थे। यह यात्रा चालीस दिनों की थी। नाहर कहते हैं तब मैं 13 साल का था और आज 63 का हूं। नाहर सिंह कहते हैं अमृतसर से यूपी आने में बीस दिन और वहां से पटना साहिब आने में बीस दिन और लगे थे। सब के सब पैदल ही चले आए थे। उम्र कम थी तो थकान भी महसूस नहीं हुई। अमृतसर से चले तो रास्ते में कई श्रद्धालुओं ने हमारा स्वागत भी किया था। हां, इस बार गाड़ी से आया हूं जी।

पचास साल पहले का प्रकाशोत्सव कैसा रहा होगा? यह जानने की जिज्ञासा भी हुई। नाहर सिंह ने कहा तब पटनासाहिब गांव की तरह था। तख्त श्री हरिमंदिर साहेब से सीधे गुरु का बाग चले आते थे। इतने घर और घुमावदार रास्ते नहीं थे उस वक्त। हां, गतका(तलवारबाजी) तब भी गांधी मैदान में ही खेला गया था। सामने बैठे मुखी बाबा अवतार सिंह के हाथों में कपड़े की माला देख कर मेरे जेहन में एक सवाल कौंध रहा था। सीधे पूछना उचित नहीं लगा तो नाहर सिंह से पूछा बैठा। नाहर सिंह ने बताया-ऊन की माला है जी।

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