THE BIHARI

7 Must Read Books focused on Bihar and Bhojpuri

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1. Bhojpuri Lok Geeton Mein Swadhinta Andolan

मानव की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि सभी चेतनाओं का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप लोक-गीतों में समाहित रहता है । दरअसल ये लोकगीत हमारे वे महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिनमें साधारण से साधारण घटना को आम लोगों ने लोक-गीतों के अन्दाज में सहजता से दर्ज किया है । अवधी, भोजपुरी, ब्रज, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, मगधी आदि लोक-गीतों में राष्ट्रीय, साहित्यिक, -धार्मिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक तत्त्व अनेकानेक परतों में परम्परागत रूप से विद्यमान है । इन लोक-गीतों के पीछे जो मार्मिक अनुभूतियाँ एवं सजीवता भरी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है । भारतीय इतिहास लेखन की परम्परा में लोक एवं लोक-गीत अभी हाल तक अनुपस्थित रहे है । चाहे उपनिवेशवादी इतिहासकार हों, राष्ट्रवादी इतिहासकार हों, मार्क्सवादी इतिहासकार हों या उपाश्रयी इतिहासकार सबके लेखन से यह प्राय: अछूता ही रहा है । इधर इतिहासकारों का एक वर्ग लोक-गीतों, लोक-परम्पराओं एवं लोक-संस्कृति को अपने अध्ययन एवं लेखन का केन्द्र बना रहा है, जिससे भारतीय इतिहास के अनेक अछूते तथ्य सामने आ रहे है । स्वाधीनता संग्राम की समग्र तस्वीर लोक-गीतों, लोक-कथाओं, लोक-मुहावरों आदि के अध्ययन के बिना नहीं तैयार की जा सकती । अवधी, भोजपुरी, मैथिली, बुन्देली, ब्रज, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी आदि लोक-गीतों में इसकी जो विभिन्न छवियाँ है इनके द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम का एक समानान्तर इतिहास लिखा जा सकता है । इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने यही प्रयत्न करते हुए लोक-गीतों के आलोक में भारतीय स्वाधीनता संग्राम को नये परिप्रेक्ष्‍य में समझने की सफल कोशिश की है ।


2. Bihar: Ek Khoj

बिहार भारत का एक प्राचीन एवं उज्ज्वल संस्कृतिवाला राज्य है। प्राचीन दुनिया में सबसे पहले लोकतंत्र व्यवस्था वैशाली में स्थापित थी। सारी दुनिया को ज्ञान का आलोक देनेवाला बिहार ही है, जहाँ नालंदा जैसे विश्‍वविद्यालय स्थापित थे और जहाँ दुनिया भर के ज्ञान-पिपासु अपनी ज्ञान-तृषा शांत करने आया करते थे। खनिज-संपदा में बिहार की बराबरी कोई राज्य नहीं कर सकता। सांस्कृतिक-संपन्नता की दृष्‍टि से बिहार का कोई सानी नहीं। यहाँ अनेक भाषा-बोलियाँ प्रचलन में हैं। बिहार विषम चरित्रवाला राज्य है, जहाँ ऐसे 241 समुदाय हैं, जिनके गोत्र या विजातीय विभाजन मौजूद हैं। बिहार में 89 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है, जिनका मुख्य पेशा खेती-बाड़ी है। यहाँ पर सर्वाधिक मेले आयोजित होते हैं, कुछ मेले तो अंतरराष्‍ट्रीय और राष्‍ट्रीय ख्याति प्राप्‍त कर चुके हैं। हिंदुस्तान में गंगा-जमुनी संस्कृति की नींव रखनेवाले अकबर ने 1580 में इस भू-भाग को ‘सूबा बिहार’ नाम दिया। अंग्रेजी शासन में लंबे संघर्ष के बाद 22 मार्च, 1912 को बिहार को भारत के अलग प्रांत का दरजा मिला। बाद में विकास की दृष्‍टि से बिहार के भाग को झारखंड नाम से अलग राज्य बना दिया गया। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक ही नहीं संपूर्ण रूप में जानने-समझने के लिए ‘बिहार एक खोज’ अपने आप में एक संपूर्ण पुस्तक है।


3. Colonial and Contemporary Bihar and Jharkhand

Since colonial times Bihar and Jharkhand have been the arena of diverse social and political struggles. The formation of the state of Jharkhand, which was earlier a part of Bihar and known as Chotanagpur, has been the result of such movements, some of which have not only created a democratic space in these regions, but also brought about a paradigm shift in Indian politics. This book tries to capture the complexities of some of these diverse movements. The ‘articulation’ of backward castes and tribal protests have been problematized by the emergence of internal hierarchies, differentiations and contestations. The predicament of ethnic identity and culture in the face of unrestrained globalizing forces in the tribal belt is also a matter of concern. Bihar and Jharkhand also have a rich popular/subaltern culture, which has been overshadowed and eclipsed in most of the scholarly work on this region. This book highlights how popular culture and oral cultural traditions emerged as a site for multiple articulations – articulation of marginalization, as well as resistance and subversion. This collection of essays will appeal to those interested in social history, political and cultural studies and the world of the poor and the marginalized.


4. Story and Destiny of Bihar

“I have become a fan of this man. One should just meet him to know…” This is what Nitish Kumar had sai about his now bitter foe Narendra Modi after NDA’s 2004 defeat. “I feel like tying my PWD minister on an empty tractor trolley and run the vehicle at a speed of 60km per hourto make him realise how people suffer when they travel on these roads”, says Lalu, conceding the terrible conditionof Bihar roads. Ruled or Misruled, Story and Destiny of Bihar by The Indian Express’ Assistant Editor SANTOSH SINGH offers a 360 degree journey of Bihar politics since Independence, especially since the Congress’ downfall in 1990. An out and out reporter’s book, it tells an interesting and tumultuous journey of the post-1990 legends of Bihar politics – Nitish Kumar, Lalu Prasad, Ram Vilas Paswan and Jitan Ram Manjhi with the legendary clash between Nitish Kumar and Narendra Modi – with the untold version on the 2010 dinner cancellation and Nitish’s ambition, providing the third angle. Right from revealing JP’s dilemma between Lalu and Nitish to socialist leader Karpoori Thakur out-thinking the Congress with his simplicity. From Jagannath Mishra making a confession on his controversial 1982 Anti-Press Bill to the numerous tales of vernaculariszation of politics and giving a voice to the poor by Lalu, the writer also traces the story of the making of the Ranbir Sena at the height of caste wars. The stories of repair, hope and construction under Nitish Kumar, disillusionment and new political realignment after the 2013 NDA split, Nitish and Lalu coming together again after two decades and Nitish almost walking out of the Lalu alliance again are just as captivating. Jitan Ram Manjhi, who makes startling revelations on how he played a dummy for Nitish and Ram Vilas Paswan, also concedes the real truth of his Godhra stand.


5. Bihar Shatabdi Ke 100 Nayak

बिहार अति प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक एवं राजनीतिक पुनर्जागरण के प्रस्फुटन का पावन स्थल रहा है। सदियों से भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बिहार की अपनी अलग पहचान रही है। आधुनिक बिहार के निर्माण को एक सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन सौ वर्ष़ों में बिहार की धरती प्राचीन युग की तरह अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक क्रांति, बदलाव और पुनःस्थापन की गवाह बनी। इस दौरान यहाँ अनेक विभूतियों ने जन्म लिया जिनके ज्ञान, त्याग, समर्पण, बुद्धि, बल, तप, संघर्ष और नेतृत्व का लाभ बिहार के साथ-साथ भारत समेत पूरी दुनिया को मिला। पिछले सौ वर्ष़ों के इतिहास में बिहार की माटी में पैदा हुए, पले और बड़े हुए वैसे लोगों की फेहरिश्त बहुत लंबी है, जिनके योगदान से देश और दुनिया की चमक निखरी, वर्तमान गौरवशाली हुआ और भविष्य की लौ सुरक्षित और सुनहरी हुई। विभिन्न क्षेत्रों में योगदान करनेवाले ऐसी विभूतियों में से सौ लोगों को चुनना कठिन दौर से गुजरना है। ऐसे महान् लोगों के जीवन उनके कृतित्व और योगदान को महज दो-तीन पन्नों में समेटना और भी दुरूह कार्य था।


6.Traversing Bihar (TISS)

This is a volume we are co-publishing with TISS. The volume is on the socio-economic-political conditions of contemporary Bihar. It tries to find answers to questions such as:

  • Whether Nitish Kumar’s model of development is devoid of social justice?
  • Is this re-elitisation of politics?
  • Why did the development state, symbolised by vikaspurush Nitish Kumar, retract on its promises of tenancy reforms?
  • Is the restoration of bureaucracy not responsible for raising the scale of corruption?
  • Did restoration of law and order and the model of development carry an inherent inclination to satisfy middle class sense of security and sensibilities?

7. Bihar Mein Samajik Parivartan

त्रिवेणी संघ बिहार में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़नेवाला पहला संगठन है। बिहार के पिछड़े समुदायों ने उसे बड़े ही धैर्य और परिश्रम के साथ सींचा तथा उसे अपनी लड़ाई का हथियार बनाया। त्रिवेणी संघ का गठन बिहार में पिछड़ी जातियों के बीच चले ‘जनेऊ आंदोलन’ का संगठनात्मक प्रतिफल था। साथ ही यह सत्ता में उनकी दावेदारी की लड़ाई का पहला प्रयास भी था। सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई आज स्थायित्व ग्रहण कर चुकी है और नए द्वंद्व उभरकर सामने आ रहे हैं। त्रिवेणी संघ के गठन, उसके प्रभाव, विस्तार एवं संघर्ष का अध्ययन और आकलन नहीं के बराबर हुआ है। त्रिवेणी संघ के विषय में प्रामाणिक तथ्यों की जानकारी के साथ इस पुस्तक में उसके इतिहास, उसके उत्थान और पतन की पूरी प्रक्रिया को प्रस्तुत किया गया है। सामाजिक परिवर्तन के दस्तावेज में त्रिवेणी संघ, लेजिस्लेटिव सिल और विधानसभा में हुई आरक्षण पर बहस को दस्तावेज के रूप में शामिल किया गया है। ‘जनेऊ आंदोलन’ पर एक अप्रकाशित कविता ‘गोप चरितम्’ इसका महत्त्वपूर्ण भाग है। सामाजिक परिवर्तन हेतु चल रहे विभिन्न आंदोलनों का दिग्दर्शन कराते हुए विकासोन्मुख बिहार के बारे में आशावाद जगाती एक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी पुस्तक।

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