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दिल्ली ही नहीं पटना पर भी है खतरा, खराब एयर क्वालिटी लेवल में पटना देश में चौथे स्थान पर

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देश की राजधानी नयी दिल्ली में प्रदूषण की इमरजेंसी देख कर यदि आपको यह लग रहा है कि बिहार के शहरों के हालात ठीक हैं तो आप गलतफहमी में हैं. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के ताजा आंकड़े यह कह रहे हैं कि देश भर में सबसे ज्यादा प्रदूषित टॉप फाइव शहरों में पटना और मुजफ्फरपुर भी शामिल हैं. इस सूची में पहले नंबर पर वाराणसी आ गया है जहां एयर क्वालिटी लेवल 491 पहुंच गया है. दिल्ली दूसरे नंबर पर है वहां का एयर क्वालिटी 468 पर है और लखनऊ तीसरे स्थान पर 462 अंकों के साथ मौजूद है. पटना चौथे नंबर पर है जिसकी एयर क्वालिटी इंडेक्स 428 है और मुजफ्फरपुर इस पर कदमताल करते हुए 409 नंबर पर मौजूद है.

एयर क्वालिटी इंडेक्स के 100 तक का लेवल ही बेहतर  : एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार यदि लेवल 0 से 50 के बीच है तब यह अच्छा है. 51-100 के बीच आप संतुष्ट होने की स्थिति में रह सकते हैं, 101-200 के

लेवल में हल्का प्रदूषित इलाका है. खराब 201-300 के बीच की स्थिति है, बदतर 301-400 के बीच और 401 से 500 के बीच की स्थिति बदतरीन वाली है. यानी स्पष्ट है कि पटना और मुजफ्फरपुर दोनों का एयर क्वालिटी इंडेक्स का लेवल 400 से ऊपर है.

 

पहली बार नाइट्रोजन का भी लेवल ऑल टाइम हाई 

इसके साथ ही नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड का लेवल भी ऑल टाइम हाई पहुंच गया है. यह पिछले साल की तुलना में 80 से बढ़ कर 122 हो गया है. नवंबर के महीने में ही नाइट्रोजन डाइ आक्साइड जिसे बोलचाल की भाषा में नॉक्स कहते हैं वह भी काफी बढ़ने लगा है. गाड़ियों के धुएं के कारण यह स्थिति आयी है कि नॉक्स का लेवल पिछले साल लो था वह लेवल नवंबर महीने में 122.82 माइक्रो ग्राम क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया है. सांस रोग के विशेषज्ञ कहते हैं कि यह लेवल यदि जारी रहा तो सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. महीनों तक रहा तो रोगियों को लंग कैंसर हो सकता है.

कहते हैं विशेषज्ञ 
स्मॉग से दमा, कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं

टीबी एवं चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉक्टर दिवाकर तेजस्वी ने बताया कि हवा की खराब गुणवत्ता का असर पटना में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.  इसके कारण दमा, कैंसर और सांस की बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. डॉक्टरों के मुताबिक स्मॉग का बच्चों और सांस  की बीमारी के मरीजों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. स्मॉग में छिपे  केमिकल के कण अस्थमा के अटैक की आशंका को और ज्यादा बढ़ा देंगे. इसके अलावा  कई लोगों को आंखों में जलन और सांस लेने में तकलीफ भी हाेती है.  ब्रोंकाइटिस यानी फेफड़े से संबंधित बीमारी के मामले बढ़ जाते हैं. यही  नहीं स्मॉग के चलते फेफड़ों की क्षमता भी कम हो सकती है जिससे खिलाड़ियों  को तकलीफ होती है. डॉक्टरों के मुताबिक दिल के मरीजों को भी स्मॉग से खतरा  है.

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