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Google Doodle : “वी शांताराम” हिंदी सिनेमा का सबसे संतुलित फॉर्मूला देने वाले निर्देशक

उनकी फिल्म दो आंखें बारह हाथ को फिल्मी गीत से बढ़कर प्रार्थना का दर्जा मिला हुआ है

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आज दुनिया भर के सिनेमा के जानकार ये मानेंगे कि सिनेमा के तीन आधार होते हैं- कला, तकनीकी और पैसा. निस्संदेह, वर्तमान कला विधाओं में सिनेमा सबसे महंगी कला है. ऐसे में हम जिस रूप में आज भारतीय सिनेमा को देखते हैं, वो वी. शांताराम की देन है. क्योंकि इन तीनों का ही सबसे संतुलित रूप सबसे पहले हमें शांताराम के ही सिनेमा में देखने को मिलता है.

कजरे में तूने अबीर दिया डाल

वी. शांताराम की फिल्मों में सिनेमा के पहले आधार कला की बात करें तो उनकी फिल्मों ‘नवरंग’ के ‘जा रे हट नटखट…’, ‘पड़ोसी’ का ‘काका-अब्बा बड़े खिलाड़ी…’ और ‘दो आंखें बारह हाथ’ का ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम…’ गीत, उनमें कलाकारों का नृत्य और अभिनय और उनका फिल्मांकन भुलाये नहीं भूलने वाले कला के नमूने हैं. वी. शांताराम कला को लेकर इतने संजीदा थे कि जब श्रीराम लागू को उनके साथ काम करने का मौका मिला तो वह खुश होने के बजाए डर गये. वजह थी कि वी. शांताराम अपने एक्टर्स को छोटी से छोटी एक्टिंग की हिदायत दिया करते थे और श्रीराम लागू खुद अच्छे एक्टर थे. पर श्रीराम लागू का डर तब काफूर हो गया जब वी. शांताराम ने उनसे मिलते ही कहा, ‘मैं एक्टिंग के बारे में अपने एक्टर्स को छोटी से छोटी हिदायत देता हूं क्योंकि उनमें से ज्यादातर एक्टिंग सीखे नहीं होते. मैं तुमसे चाहूंगा कि तुम अपने किरदार को अपनी तरह से निभाओ.’

गया अंधेराहुआ उजाराचमका-चमका सुबह का तारा 

सिनेमा के दूसरे आधार तकनीक को लेकर वी. शांताराम इतने जुनूनी थे कि वह इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. भारत में सिनेमा की कई तकनीकों को सबसे पहले अपनी फिल्मों में प्रयोग करने का श्रेय उन्हें जाता है. उन्होंने 1931 में आई अपनी फिल्म ‘चंद्रसेना’ की शूटिंग में भारत में पहली बार ट्रॉली कैमरे का प्रयोग किया था. इसे साइकिल के पहियों और लकड़ी के तख्तों से जोड़कर बनाया गया था. मानें तो भारत की पहली कलर फिल्म भी वी. शांताराम ने ही बनाई थी.

सैरन्ध्री (1933) नाम की इस फिल्म के पोस्टप्रोडक्शन में तकनीकी गड़बड़ी के चलते इसके कलर चले गये, जिसके चलते ‘किसान कन्या’ भारत की पहली कलर फिल्म बन गई. अपनी फिल्म ‘अमृत मंथन’ (1934) में उन्होंने पहली बार ‘टेलीफोटो लेंस’ का प्रयोग किया था. जिससे बार-बार कैमरे की जगह बदलने की जरूरत कम हुई. 1935 में आई फिल्म ‘जम्बूकाका’ में वी. शांताराम ने ही पहली बार ‘एनिमेशन’ का प्रयोग किया था. 1936 में आई उनकी फिल्म ‘अमृत मंथन’ में उन्होंने पहली बार ‘बैक प्रोजेक्शन’ का प्रयोग किया था.

अपने हैं दोनों जहां

आखिरी बात पैसे की. अपने गुरू बाबूराव पेंटर के साथ फिल्में बनाने की शुरुआत करने वाले वी. शांताराम सिनेमा जैसी मंहगी आर्ट में पैसे का महत्व बखूबी जानते थे. ऐसे में प्रभात स्टूडियो शुरू करने की बात रही हो या राजकमल कलामंदिर की, शांताराम समझते थे कि पैसा किसी सिनेमा के लिए कितना जरूरी है. पैसे की समझ ही थी जो वी. शांताराम कई नई-नई तकनीकों को भारत में ला सके और इस बात में भी उन्हें ही पहला होने का श्रेय मिला कि जिस डायरेक्टर की फिल्में सबसे पहले विदेशों में दिखाई गईं वह भी वी. शांताराम ही रहे. चीन में दंगल की ये धूम शायद संभव नहीं हो पाती अगर वी. शांताराम की फिल्मों ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ और ‘शकुंतला’ ने भारतीय सिनेमा के लिए दुनिया के दरवाजे न खोल दिये होते.

पत्थर पे कर शायरीतुझको हमारा सलाम

पर अगर वी. शांताराम इतने ही होते तो भला उन्हें एक डायरेक्टर नहीं बल्कि ‘फिल्ममेकिंग की संस्था’ क्यों कहा जाता? क्योंकि कई फिल्मकारों ने इतना कारनामा किया है. इससे खास जो बातें वी. शांताराम के अंदर थीं, वह थीं परंपरा का हाथ पकड़े हुये प्रगतिशीलता की बात करना, सारे हुनर जो अच्छे सिनेमा को चाहिये, वह उनमें होना. चाहे वो एक्टिंग हो, डायरेक्शन या एडिटिंग. जीवन भर आदर्शों से प्रेरित सिनेमा बनाने वाले वी. शांताराम की खास बात ये थी कि उनके किरदार तुलसीदासकृत रामचरितमानस का पाठ करते हुए भी सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देते थे. दहेज के खिलाफ, औरतों के हकों के लिए वी. शांताराम का सिनेमा आवाज उठाता था. वह भी एक ऐसे वक्त में जब इन्हें लेकर समाज जबरदस्त रुढ़िवादी सोच में जकड़ा हुआ था.

ऐ मालिक तेरे बंदे हम

जिन्होंने वी. शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ फिल्म देखी है उसके आखिरी सीन को भूल नहीं सकते, जब भरत व्यास के लिखे और वसंत देसाई के संगीत से सजे गीत ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ को अदाकारा संध्या के साथ कैदी बने अन्य अभिनेता गा रहे हैं. 100 साल में भारतीय सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध गीतों में कहीं बहुत ऊपर जगह पाने वाला ये गीत किसी की जिंदगी के लिए नहीं बल्कि शांतिपूर्ण मौत के लिए गाया जा रहा है. गीत में वो जादू है कि इसे सुनकर आदर्शों को अपनाने की तड़प किसी में भी जाग जाती है. वहीं ‘नवरंग’ और ‘झनक-झनक पायल बाजे’ में मादकता और आकर्षण से भरे हुये अदाकारा संध्या के नृत्य भी हैं.

वी. शांताराम ने दोनों ही तरह के गीत बेजोड़ ढंग से फिल्माये हैं. फिर आदमी (मराठी में मानूस), जिसे कुछ सिने-आलोचक उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी मानते हैं (फिल्म एक पुलिस वाले और वेश्या के संबंधों पर आधारित थी), में जिस तरह से अंधेरे और छाया का इस्तेमाल सिनेमा में फील क्रिएट करने के लिए किया गया है आज भी दर्शकों को प्रभावित करता है. तकनीक ने हमेशा वी. शांताराम की फिल्म में एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया है. वी. शांताराम इस बात को समझते थे कि दर्शकों पर अपनी फिल्म का प्रभाव डालने में तकनीक का कितना महत्वपूर्ण रोल हो सकता है. भारतीय सिनेमा में ये बात समझने वाले वह सबसे पहले लोगों में से थे.

ये कौन चित्रकार हैये कौन चित्रकार?

राजाराम वानकुद्रे शांताराम यानि वी. शांताराम का जन्म कोल्हापुर में 1901 में हुआ था. उस समय तक लूमियर ब्रदर्स सिनेमा की शुरुआत कर चुके थे. वी. शांताराम ने जीवन के अनुभवों से कितना कुछ, कितनी तेजी से सीखा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी कोई खास औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 12 साल की उम्र में, रेलवे में एक ट्रेनी के तौर पर की थी और इसके बाद वह चर्चित बाल गंधर्व की नाटक मंडली में पर्दा संचालन का काम करने लगे. सिनेमा से वी. शांताराम का पहला जुड़ाव बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी के जरिए हुआ. वह बाबूराव ही थे, जिन्होंने शांताराम को सिनेमा की बेसिक जानकारी दी और उन्हें अपनी फिल्म सवकारी पाश(1925) में एक युवा किसान का रोल दिया.

बेजोड़ प्रतिभा के धनी शांताराम ने तेजी से सिनेमा की बारीकियां सीखीं और मात्र दो साल बाद खुद नेताजी पालकर (1927) नाम की फिल्म बनाई. इसके बाद उन्होंने वीजी. दामले, केआर. धाईबेर, एस. फत्तेलाल और एसबी. कुलकर्णी के साथ मिलकर प्रभात कंपनी की शुरुआत की. शांताराम ने अपने गुरु बाबूराव को तो छोड़ दिया था पर उनकी स्टाइल को नहीं छोड़ा और कई पौराणिक फिल्में या ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित फिल्में बनाईं.

सैंया जाओजाओमोसे न बोलो

चालीस के दशक में उनकी जर्मनी की यात्रा ने उन्हें दूसरे विषयों पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने अमृत मंथन (1934) बनाई. बौद्ध थीम पर आधारित इस फिल्म के एक दृश्य में एक पुजारी की दाहिनी आंख का क्लोज-अप सीन था. इस सीन में सामने घटित हो रही सारी चीज़ें उसी आंख में दिखाई गई थीं. उस वक्त लोगों के लिए स्क्रीन पर ये बिल्कुल नया अनुभव था. प्रभात स्टूडियो में वी. शांताराम की जिन तीन फिल्मों ने सबसे ज्यादा तारीफ पाई और आज भी सराही जाती है, वे हैं- दुनिया न माने (कुंकू- मराठी, 1937), आदमी (मानूस- मराठी, 1939) और पड़ोसी (शेजारी- मराठी, 1941). पर प्रभात स्टूडियो में विवाद शुरू हो गया था. चार लोगों की मेहनत का नतीजा ये स्टूडियो केवल वी. शांताराम के साथ जुड़कर रह गया था. दूसरे इससे असंतुष्ट थे.

जिससे बढ़े विवाद के चलते शांताराम ने प्रभात स्टूडियो छोड़ दिया. प्रभात के साथ ही उनका पुणे भी छूट गया और वह मुंबई आ गये. जहां पर उन्होंने 1942 में राजकमल कलामंदिर की शुरुआत की. वैसे बताते चलें कि भारतीय फिल्म एंव टेलीविजन इंस्टीट्यूट, पुणे आज इसी स्टूडियो में हैं. वहां उस वक्त की यादों को संजोये रखने वाला एक संग्रहालय भी है. यहां उन्होंने पहली फिल्म शकुंतला बनाई जो 1947 में कनाडाई राष्ट्रीय प्रदर्शनी में दिखाई गयी. ऐसे ही शांताराम की मराठी फिल्म ‘अमर भूपाली’ होनाजी बाला के जीवन पर आधारित थी. टेक्नीकलर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ मेलोड्रामा थी, जो बॉक्स ऑफिस पर बहुत जबरदस्त हिट रही. दर्शकों ने इसके डांस और गानों को बहुत पसंद किया.

आ के न जाये कभी ऐसी बहार हो

इसके दो साल बाद 1957 में आई दो आंखें बारह हाथ. इसके जरिए वी. शांताराम ने फिर से अपने सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्मों की ओर वापसी की. किरदारों का रूप-स्वरूप, इस फिल्म में प्रयोग की गई ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी, कुछ हत्यारों को सुधारने के एक जेलर के प्रयासों की असली कहानी को पूरे मन से फिल्माया गया था. फिल्म ने राष्ट्रपति से साल की बेस्ट फीचर फिल्म का गोल्ड मेडल तो पाया ही साथ ही उसे बर्लिन फिल्म फेस्टिवल का सिल्वर बियर अवॉर्ड भी मिला. इसके अलावा इस फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म की कैटेगरी में सैमुअल गोल्डविन अवॉर्ड भी मिला था.

इसके बाद आई नवरंग. आलोचकों ने इसे उलझी-घुमावदार कहानी कहकर नकार दिया पर दर्शकों ने इसे बहुत पसंद किया. फिल्म का गीत-संगीत हिंदी सिनेमा में अमर हो चुका है. उनकी आखिरी फिल्म पिंजरा थी. जो जोसफ वॉन स्टेनबर्ग के 1930 के क्लासिक नॉवेल द ब्लू एंजेल पर आधारित थी. शांताराम ने इस फिल्म में कैबरे को तमाशा से बदल दिया था. उनकी आखिरी फिल्म झांझर, 1986 थी. इसके साथ ही वी. शांताराम के करीब 70 साल के करियर का अंत हो गया.

इंसान का दु:ख पहचानकरके अपना सब बर्बाद

दुनिया न माने में वी. शांताराम ने एक ऐसा विषय को फिल्म की कहानी बनाया था जो उस वक्त के हिसाब से बेहद चुनौतीपूर्ण था. इस फिल्म में एक लड़की, उम्र में अपने से कई गुना बड़े आदमी के साथ शादी हो जाने के बावजूद शादी निभाने से मना कर देती है. अंतत: उस आदमी को उसे अपनी बेटी मानना पड़ता है और उससे शादी खत्म करनी पड़ती है. केवल विषयों के चयन में ही नहीं बल्कि फिल्म के दूसरे विभागों में भी शांताराम की फिल्मों में आप फिल्म के उद्देश्य से इतर कुछ भी नहीं पायेंगे. बैकग्राउंड स्कोर हो या गीत-संगीत सभी का चयन वी. शांताराम काफी तसल्ली से करते थे. शांताराम ने बेहद स्मार्टनेस से सिनेमा रचा. पड़ोसी इसका एक अच्छा उदाहरण है. देश में जब हिंदू-मुस्लिम विवाद अपने चरम पर जा रहा था. शांताराम ने उसे ही आधार बनाकर पड़ोसी बनाई. इस फिल्म में एक मुस्लिम का किरदार एक हिंदू और हिंदू का किरदार एक मुस्लिम कलाकार ने निभाया था.

आधा है चंद्रमारात आधी

वी. शांताराम: द मैन हू चेंज्ड इंडियन सिनेमा नाम से वी. शांताराम की जीवनी उनकी बेटी मधुरा पंडित जसराज ने लिखी है. मधुरा की शादी मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज से हुई है. अपनी किताब में उन्होंने एक वाकये का जिक्र किया है, जब एक रोज दादा साहेब फाल्के ने वी. शांताराम को मिलने के लिए बुलाया. इस तरह का न्यौता पाकर जाहिर है युवा शांताराम खुश हुए होंगे पर जब शांताराम वहां पहुंचे तो उन्हें गहरा धक्का लगा. दादा साहेब फटे-पुराने गद्दे पर लेटे हुए थे. फाल्के ने उन्हें बताया कि उन्हें दवाओं और घर चलाने के लिए कुछ पैसों की जरूरत है. तबसे हर महीने कुछ पैसा वी. शांताराम उनके यहां भेजते रहे.

सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला/ चलते-चलते

वी शांताराम की जीवनी में उनकी बेटी मधुरा ने एक और किस्से का जिक्र किया है. 1938 में वी. शांताराम ‘आदमी’ फिल्म बना रहे थे, जो एक वेश्या और एक पुलिस वाले के प्रेम की कहानी थी. इस फिल्म के रिसर्च के दौरान वह पहचान छिपाकर वेश्याओं से मिलते और बातचीत करते थे. एक दिन उन्होंने एक वेश्या से पूछा, तुमने आखिरी फिल्म कौन सी देखी है? उसने जवाब दिया, दुनिया न माने. ये शांताराम की ही आखिरी फिल्म थी. शांताराम ने उसके इस जवाब पर शरीर के अंग विशेष की गाली देते हुए कहा, वो (गाली) शांताराम ‘साली’ बहुत अच्छी फिल्में बनाता है.

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